भारतीय इतिहास की प्रमुख संधियां

भारतीय इतिहास में अब तक अनगिनत युद्ध हो चुके हैं। युद्ध के बाद संधि भी होती रही है। भारतीय इतिहास की प्रमुख संधियां निम्नलिखित हैं –

पुरंदर की संधि (22 जून 1665 ई.) –

पुरंदर की संधि क्षत्रपति शिवाजी और कछवाहा राजा जयसिंह के मध्य हुई थी। इस संधि के समय मनूची भी वहाँ उपस्थित था।

  • अधिक जानकारी के लिए शिवाजी वाली पोस्ट देखें।
पाण्डिचेरी की संधि (1755 ई.) –

पाण्डिचेरी संधि अंग्रेज और फ्रांसीसियों के बीच हुई। इसके बारे में अधिक जानकरी के लिए कर्नाटक युद्ध वाली पोस्ट देखें।

अलीनगर की संधि (9फरवरी 1757 ई.)-

अलीनगर की संधि लार्ड क्लाइव और बंगाल के नबाव सिराजुद्दौला के बीच हुई। इसी के तहत अंग्रेजों को सिक्के ढालने व स्थलों को दुर्गीकृत करने की अनुमति प्राप्त हुई।

इलाहाबाद की संधि (12 अगस्त 1765)-

यह इलाहाबाद की पहली संधि थी। इलाहाबाद की संधि अंग्रेजों और मुगल बादशाह शाहआलम द्वितीय के बीच हुई। इलाहाबाद की संधि पर क्लाइल, शाहआलम द्वितीय, और बंगाल के नबाव नज्मउद्दौला के हस्ताक्षर हैं। इसके तहत मुगल बादशाह ने बंगाल, बिहार, उड़ीसा की दीवानी अंग्रेजों को सौंप दी। साथ ही उत्तरी सरकार की जागीर अंग्रेजों को प्राप्त हुई। कड़ा और इलाहाबाद अवध के नबाव से लेकर मुगलों को दे दिए गए। मुगल बादशाह की पेंशन 26 लाख रुपये वार्षिक बांध दी गई।

इस संधि के बारे में इतिहासकार गुलाम हुसैन ने कहा, ”इस संधि की शर्तों को तय करने में उतना ही समय लगा, जितना एक गधे को खरीदने में।”

इलाहाबाद की संधि (16 अगस्त 1765)-

यह इलाहाबाद की दूसरी संधि थी। यह संधि क्लाइव और अवध के नबाव शुजा उद्दौला के बीच हुई। कड़ा और इलाहाबाद को छोड़कर अवध का राज्य नबाव को बापस मिल गया। अवध ने अंग्रेजों को 50 लाख रुपये और चुनार का दुर्ग दे दिया। कंपनी को अवध में करमुक्त व्यापार करने की अनुमति प्राप्त हुई। नबाव के खर्जे पर एक ब्रिटिश सेना अवध में रखना तय हुआ। गाजीपुर और वाराणसी में बलवंत सिंह को अधिकार दिए गए। बलवंत सिंह अंग्रेजों के संरक्षण में कार्य करेगा। परंतु यह अवध के अधीन राजा माना जाएगा।

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मद्रास की संधि (4 अप्रैल 1769 ई.)

4 अप्रैल 1769 ई. को हैदर अली अंग्रेजों के बीच मद्रास की संधि हुई। इस संधि की शर्तें हैदर अली के पक्ष में थीं। इसके बारे में अधिक जानकरी के लिए आंग्ल-मैसूर युद्ध वाली पोस्ट देखें।

बनारस की संधि (1773 ई.)

बनारस की संधि वारेन हेंस्टिंग्स और अवध के नबाव शुजा उद्दौला के बीच हुई थी। हेंस्टिंग्स ने इलाहाबाद और कड़ा के जिले 50 लाख रुपये में नबाव को बेच दिए। नबाव ने कंपनी से रुहेलाओं के विरुद्ध सहातया का वचन लिया। इसके लिए नबाव कंपनी को 40 लाख रुपये देगा।

इसी से प्रभावित होकर नबाव ने 1774 ई. में रुहेलखंड पर आक्रमण कर दिया। अप्रैल 1774 ई. में मीसपुर कटरा के स्थान पर एक निर्णायक युद्ध में रुहेला सरदार हाफिज रहमत खाँ को मार डाला। रुहेलखंड को अवध में मिला लिया और 20 हजार रुहेलाओं को देश निकाला दिया।

सूरत की संधि – 7 मार्च 1775 ई.

इस संधि की कुल 16 शर्तें थीं। यह संधि रघुनाथराव और बम्बई सरकार के मध्य हुई थी। इसके बारे में अधिक जानकरी के लिए आंग्ल मराठा युद्ध वाली पोस्ट देखें।

फैजाबाद की संधि (1775 ई.)-

फैजाबाद की संधि अवध के नबाव आसफुद्दौला और वारेन हेंस्टिंग्स के बीच हुई। इस संधि के तहत बनारस पर अंग्रेजों की सत्ता को स्वीकार कर लिया गया। वारेन हेंस्टिंगस ने अवध की वेगमों की सम्पत्ति की सुरक्षा की गारंटी ली। हालांकि बाद में हेंस्टिंग्स ने इसके विपरीत कार्य किया। हेंस्टिंग्स ने 1781 ई. जॉन मिडल्टन को बेगमों से धन बसूलने का आदेश दे दिया। इंग्लैंड के बर्क ने हेंस्टिंग्स पर अभियोग चलाया उसका एक कारण अवध की बेगमों से बदसलूकी भी था।

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पुरंदर की संधि (1 मार्च 1776 ई.)

वारेन हेंस्टिंग्स ने कर्नल अप्टन को पूना दरबार में भेजा और मराठों से पुरंदर की संधि की। इसके बारे में अधिक जानकारी के लिए आंग्ल मराठा युद्ध वाली पोस्ट देखें।

बड़गाँव की संधि – 1779 ई.

यह संधि अंग्रेजों के लिए बेहद अपमानजनक थी। इसके तहत 1773 ई. में बम्बई सरकार द्वारा जीती गई सारी भूमि लौटानी पड़ी। सिंधिया को भड़ौच के राजस्व का एक हिस्सा मिलेगा। बंगाल से पहुंचने वाली फौज को हटा लिया जाएगा।

सालबाई की संधि (17 मार्च 1782)-

यह संधि सिंधिया की मध्यस्थता से अंग्रेज व मराठों के बीच हुई। इसके बारे में अधिक जानकरी के लिए आंग्ल मराठा युद्ध वाली पोस्ट देखें।

मंगलौर की संधि ( मार्च 1784 ई.)-

मंगलौर की संधि टीपू सुल्तान और लार्ड मैकार्टनी के बीच हुई थी। इसके बारे में अधिक जानकरी के लिए आंग्ल-मैसूर युद्ध वाली पोस्ट देखें।

श्रीरंगपट्टम की संधि (1792 ई.) –

इस संधि के तहत टीपू सुल्तान को अपना आधा राज्य गवाना पड़ा। इसके बारे में अधिक जानकरी के लिए आंग्ल मैसूर युद्ध वाली पोस्ट देखें।

बसीन की संधि –

बसीन की संधि अंग्रेजों और पेशवा बाजीराव द्वितीय के बीच हुई। इसके बारे में अधिक जानकारी के लिए आंग्ल मराठा युद्ध वाली पोस्ट देखें।

देवगाँव की संधि (17 दिसंबर 1803) –

यह संधि अंग्रेजों और भोसले के बीच हुई थी। इसके बारे में अधिक जानकरी के लिए आंग्ल मराठा युद्ध वाली पोस्ट देखें।

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सुर्जी-अर्जनगाँव की संधि (30 दिसंबर 1803) –

यह संधि अंग्रेजों और सिंधिया के बीच हुई। इसके बारे में अधिक जानकरी के लिए आंग्ल मराठा युद्ध वाली पोस्ट देखें।

अमृतसर की संधि –

यह संधि 25 अप्रैल 1809 ई. को अंग्रेजों और रणजीत सिंह के बीच हुई थी। इस पर रणजीत सिंह और चार्ल्स मेटकॉफ के हस्ताक्षर हैं।

पूना की संधि (13 जून 1817 ई.) –

एलफिंस्टन ने बाजीराव द्वितीय की मर्जी के बिना उससे इस संधि पर हस्ताक्षर करवा लिए। इसके बारे में अधिक जानकरी के लिए आंग्ल मराठा युद्ध वाली पोस्ट देखें।

ग्वालियर की संधि (5 नवंबर 1817 ई.) –

यह संधि दौलतराव सिंधिया और अंग्रेजों के बीच हुई। इसके बारे में अधिक जानकारी के लिए आंग्ल मराठा युद्ध वाली पोस्ट देखें।

मंदसौर की संधि (6 जनवरी 1818 ई.) –

यह संधि होल्कर और अंग्रेजों के बीच हुई। इस संधि पर हस्ताक्षर करने के लिए होल्कर को विवश किया गया। इसके बारे में अधिक जानकारी के लिए आंग्ल मराठा युद्ध वाली पोस्ट देखें।

लाहौर की संधि –

लाहौर की संधि 9 मार्च 1846 ई. को सिखों व अंग्रेजों के बीच हुई।

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