भारतीय संसद : लोकसभा और राज्यसभा

भारतीय संसद : लोकसभा और राज्यसभा ( Indian Parliament Loksabha and Rajyasabha ) – भारत में संसदीय लोकतंत्र की व्यवस्था की गई है। जो कि ब्रिटिश संसदीय व्यवस्था पर आधारित है। चूंकि भारत लंबे समय तक ब्रिटेन का उपनिवेश रहा, इसलिए उसका प्रभाव इस पर लाजमी है। भारत की केंद्रीय व्यवस्थापिका को संसद के नाम से जाना जाता है।

seventeenth loksabha

संसद का गठन –

भारतीय संसद के तीन अंग – लोकसभा, राज्यसभा, और राष्ट्रपति हैं। संसद के दो सदन हैं। उच्च सदन को राज्यसभा और निम्न सदन को लोकसभा के नाम से जाना जाता है। लोकसभा को जनता का सदन भी कहा जाता है। क्योंकि इसके सदस्य सीधे जनता द्वारा निर्वाचित होते हैं। राष्ट्रपति किसी सदन का सदस्य नहीं होता। परंतु वह भारतीय संसद का अभिन्न अंग है। दोनो सदनों द्वारा पारित विधेयक राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद ही विधि बनता है। राष्ट्रपति अभिभाषण के लिए ही सदन में प्रवेश करता है। नवनिर्वाचित लोकसभा के प्रथम सत्र के प्रारंभ में और वर्ष के पहले सत्र के प्रारंभ में राष्ट्रपति द्वारा दोनो सदनों में सम्मिलित अभिभाषण दिया जाता है।

राज्यसभा की संरचना –

यह भारतीय संसद का उच्च सदन है। यह एक स्थाई सदन है, अतः इसे भंग नहीं किया जा सकता। इसके सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्ष का होता है। इसके एक तिहाई सदस्यों का कार्यकाल हर दो साल में पूर्ण होता है। इसके लिए हर दो साल में निर्वाचन होते हैं। यह एक केंद्रीय संस्था है, यह राज्यों के स्थानीय हितों का प्रतिनिधित्व नहीं करती। राज्यसभा में सदस्यों की अधिकतम संख्या 250 हो सकती है। इनमें 238 सदस्य राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों से होते हैं। 12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा नामनिर्दिष्ट किये जाते हैं। ये 12 सदस्य कला, विज्ञान, साहित्य, समाजसेवा के क्षेत्र से आते हैं। लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 के अनुसार यह नियम बनाया गया था कि जिस राज्यसभा सीट के लिए व्यक्ति निर्वाचित होना चाहता है, उसे उस राज्य का सामान्य निवासी होना अनिवार्य है। परंतु साल 2003 में संशोधन कर इस नियम को बदल दिया गया।

लोकसभा की संरचना –

यह भारतीय संसद का निम्न एवं अस्थाई सदन है। इसे जनता का सदन भी कहा जाता है। क्योंकि इसके सदस्य सीधे जनता द्वारा चुने जाते हैं। इसका कार्यकाल 5 वर्ष का होता है। इससे पहले भी इसे भंग किया जा सकता है। केंद्रीय मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से इसी के प्रति उत्तरदायी होती है। संविधान के अनुच्छेद 331 के अनुसार राष्ट्रपति लोकसभा में अधिकतम 2 आंग्ल-भारतीयों के नाम निर्दिष्ट कर सकता है। अनुच्छेद 326 के अनुसार लोकसभा में वयस्क मताधिकार की व्यवस्था है। अर्थात 18 वर्ष से अधिक आयु का कोई भी भारतीय नागरिक लोकसभा निर्वाचन में मतदान के लिए अर्ह है। 1988 से पहले मतदाता की निम्नतम आयु सीमा 21 वर्ष थी। लोकसभा में अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई है। किंतु धर्म के आधार पर कोई आरक्षण नहीं है।

राज्यवार लोकसभा सीटों की संख्या

राज्यलोकसभा सीटेंराज्यसभा सीटें
उत्तर प्रदेश8031
महाराष्ट्र4819
प. बंगाल4116
बिहार4016
तमिलनाडु3918
मध्यप्रदेश2911
कर्नाटक2812
गुजरात2611
राजस्थान2510
आंध्र प्रदेश2511
ओडिशा2110
केरल209
तेलंगाना177
असम147
झारखण्ड146
पंजाब137
छत्तीसगढ़115
हरियाणा105
उत्तराखण्ड53
हिमाचल प्रदेश43
मनिपुर21
गोवा21
अरुणाचल21
मेघालय21
त्रिपुरा21
मिजोरम11
नागालैंड11
सिक्किम11

अब तक गठित लोकसभाओं का कार्यकाल –

लोकसभागठनविघटन
पहली लोकसभा13 मई 19524 अप्रैल 1957
दूसरी लोकसभा10 मई 195731 मार्च 1962
तीसरी लोकसभा16 अप्रैल 19623 मार्च 1967
चौथी लोकसभा16 मार्च 196727 दिसंबर 1970
पांचवीं लोकसभा19 मार्च 197118 जनवरी 1977
छठी लोकसभा25 मार्च 197722 अगस्त 1979
सातवीं लोकसभा21 जनवरी 198031 दिसंबर 1984
आठवीं लोकसभा15 जनवरी 198527 नवंबर 1987
नौवीं लोकसभा18 दिसंबर 198913 मार्च 1991
दसवीं लोकसभा9 जुलाई 199115 मई 1996
ग्यारहवीं लोकसभा22 मई 19964 दिसंबर 1997
बारहवीं लोकसभा23 मार्च 199826 अप्रैल 1999
तेरहवीं लोकसभा20 अक्टूबर 19994 फरवरी 2004
चौदहवीं लोकसभा2 जून 200418 मई 2009
पंद्रहवीं लोकसभा1 जून 200918 मई 2014
सोलहवीं लोकसभा4 जून 201422 मई 2019
सत्रहवीं लोकसभा24 मई 2019वर्तमान

संसदीय लोकतंत्र के आधारिक तत्व –

  • जनता का प्रतिनिधित्व
  • उत्तरदायित्वपूर्ण सरकार
  • मंत्रिपरिषद का विधानमण्डल के प्रति उत्तरदायी होना

मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होती है।

अनुच्छेद 75(3) के अनुसार मंत्रिपरिषद् तभी तक पद पर रहती है जब तक उसे लोकसभा में बहुमत का समर्थन प्राप्त हो।

अनुच्छेद 84 में संसद की सदस्यता संबंधी अर्हताएं वर्णित हैं।

संसद सदस्य होने के लिए निरर्हताओं का वर्णन संविधान के अनुच्छेद 102 में किया गया है।

संसद की दोहरी सदस्यता –

यदि कोई व्यक्ति संसद के दोनों सदनों का सदस्य बन जाता है तो उसे 10 दिन के अंदर किसी एक सदन की सदस्यता चुननी होगी। ऐसा न करने पर उसे सभी सदस्यताओं से अमान्य घोषित कर दिया जाएगा। ऐसा लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 68 और 69 के तहत होगा। संसद के साथ ही यदि कोई व्यक्ति राज्य विधानमण्डल का भी सदस्य बन जाता है। तो राज्य विधानमंडल से त्यागपत्र न देने की स्थिति में 14 दिन के बाद संसद में उसका पद रिक्त हो जाएगा

अनुच्छेद 85 –

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 85 राष्ट्रपति की संसदीय शक्ति से संबंधित है। यह राष्ट्रपति को संसद के प्रत्येक सदन को आहूत करने व सत्रावसान करने का अधिकार देता है। यह राष्ट्रपति को लोकसभा का विघटन करने का अधिकार देता है। इसी अनुच्छेद के अनुसार संसद के सत्र की अंतिम बैठक और अगले सत्र की प्रथम बैठक के बीच 6 माह से अधिक का समय नहीं होगा। अर्थात साल में संसद के कम से कम दो अधिवेशन होना अनिवार्य है।

बजट सत्र –

भारतीय संविधान में बजट शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है। इसके स्थान पर ‘वार्षिक वित्तीय विवरण’ शब्द प्रयोग में लाया गया है। बजट सत्र फरवरी माह के तीसरे सप्ताह में प्रारंभ होता है। यह वर्ष का पहला अधिवेशन होता है। इस वजह से संसद के दोनो सदन समवेत होते हैं। इसमें राष्ट्रपति का अभिभाषण होता है। अभिभाषण के दो-चार दिन बाद ही रेल बजट प्रस्तुत किया जाता था। इसके दो तीन दिन बाद सरकार लोकसभा के समक्ष आर्थिक सर्वेक्षण रखती है। यह राष्ट्र की अर्थव्यवस्था का सर्वेक्षण होता है। फरवरी माह के अंतिम दिन बजट प्रस्तुत किया जाता है। पहले बजट प्रस्तुत करने का समय सांय 5 बजे का था। परंतु साल 2001 से इसे दिन के 11 बजे प्रस्तुत किया जाने लगा। बजट प्रस्तुत होने के बाद सदन द्वारा राष्ट्रपति के अभिभाषण के लिए धन्यवाद प्रस्ताव पारित किया जाता है।

वर्षा सत्र –

यह सत्र सामान्यतः जुलाई के तीसरे सप्ताह में शुरु होता है। इस समय हमारे देश में वर्षा ऋतु होने के कारण इसे वर्षा सत्र कहा जाता है। इस सत्र में मुख्यतः विधायी कार्य अर्थात अधिनियम पारित होने के कार्य होते हैं।

शीत सत्र –

यह नवंबर माह के दूसरे या तीसरे सप्ताह में प्रारंभ होता है। यह दिसंबर के तीसरे सप्ताह में समाप्त होता है। इस सत्र में भी अधिकतर विधायी कार्यों की ओर ध्यान दिया जाता है।

स्थगन –

किसी बैठक के कार्य के निलबंन को स्थगन की संज्ञा दी गई है। किसी बैठक का स्थगन उसकी अध्यक्षता करने वाले अधिकारी द्वारा किया जाता है। स्थगन कुछ मिनटों से लेकर कुछ दिनों तक का हो सकता है। सदन में गंभीर स्थिति उत्पन्न होने पर अध्यक्ष सदन को कुछ समय के लिए स्थगित कर देता है। स्थगन के साथ ही सदन के दोबारा शुरु होने का समय भी बताया जाता है। परंतु जब स्थगन के साथ सदन के शुरु होने का समय न बताया जाए, तब कहा जाता है कि सदन अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दिया गया है। अंग्रेजी में इसे ‘साइन डाइ’ कहा जाता है। इसका अर्थ होता है ‘आगामी बैठक का दिन तय किये बिना’। सामान्यतः सदन के अंतिम दिन का स्थगन अनिश्चित काल का स्थगन होता है।

सदन का सत्रावसान –

सदन का सत्रावसान राष्ट्रपति द्वारा किया जाता है। यह कार्य राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद की सलाह पर करता है। यह सदन के अनिश्चित काल के स्थगन के बाद किया जाता है। सत्रावसान से सत्र समाप्त हो जाता है।

लोकसभा का वघटन –

लोकसभा के विघटन की शक्ति राष्ट्रपति में निहित है। कुछ परिस्थितियों को छोड़कर राष्ट्रपति यह कार्य भी मंत्रिपरिषद की सलाह पर करता है। राज्यसभा एक स्थाई सदन है अतः इसका विघटन नहीं किया जा सकता। संसद के केवल निम्न सदन (लोकसभा) का ही विघटन किया जाता है। विघटन किसी लोकसभा के कार्यकाल का अंत होता है। इसके बाद निर्वाचन करा कर नई लोकसभा गठित की जाती है।

सत्र किसे कहते हैं ?

वह कालावधि जो अधिवेशन की तारीख से लेकर उसके सत्रावसान या विघटन तक होती है, सत्र कहलाती है। सदन के सत्रावसान और अगले सत्र के प्रारंभ के बीच की कालावधि विश्रांतिकाल कहलाती है।

सत्र प्रारंभ होने के बाद का हर दिन अधिवेशन होता है। यह अधिवेशन दो कालों में विभक्त होता है। पहला भोजनावकाश से पहले का और भोजनावकाश के बाद का। मंत्रणा समिति की सलाह पर हर बैठक में कामकाज के लिए समय आबंटित किया जाता है। सदन की कार्यवाही शुरु होने के पहले घंटे को प्रश्नकाल कहा जाता है। इसमें प्रश्नों के उत्तर दिये जाते हैं।

लोकसभा अध्यक्ष –

संविधान के अनुच्छेद 93 में लोकसभाध्यक्ष और उपाध्यक्ष का उल्लेख किया गया है। लोकसभा अपने सदस्यों में से ही एक को अध्यक्ष व एक को उपाध्यक्ष चुनती है। प्रत्येक आम चुनाव के बाद राष्ट्रपति द्वारा नियत समय पर लोकसभा अध्यक्ष का चुनाव करवाया जाता है। इसके बाद अध्यक्ष द्वारा उपाध्यक्ष का चुनाव कराया जाता है। लोकसभा के विघटन पर अध्यक्ष अपना पद रिक्त नहीं करता है। वह विघटन के पश्चात होने वाले लोकसभा के पहले अधिवेशन के ठीक पूर्व तक लोकसभा का अध्यक्ष रहता है। परंतु कुछ परिस्थितियों में लोकसभा अध्यक्ष व उपाध्यक्ष का पद रिक्त हो सकता है। ये परिस्थितियां निम्नलिखित हैं –

– जब वह लोकसभा का सदस्य न रहे।

– स्वयं के द्वारा दिये गए त्यागपत्र के माध्यम से। अध्यक्ष अपना त्यागपत्र उपाध्यक्ष को और उपाध्यक्ष अपना त्यागपत्र अध्यक्ष को संवोदित करता है।

– लोकसभा सदस्यों के तत्कालीन बहुमत से पारित संकल्प द्वारा हटाए जाने पर।

लोकसभा अध्यक्ष का पद से हटाया जाना –

अध्यक्ष को हटाए जाने के संकल्प को प्रस्तावित किये जाने की सूचना 14 दिन पहले दी जानी चाहिए। अध्यक्ष उस वक्त पीठासीन नहीं होगा जब उसे हटाने के संकल्प पर विचार चल रहा हो। परंतु उसे सभा में बोलने और कार्यवाही में अन्यथा भाग लेने का अधिकार होगा। उसे संकल्प पर प्रथमतः मत देने का अधिकार होगा। परंतु मत बराबर होने पर वह निर्णायक मत नहीं दे सकता (अनुच्छेद – 96)। अध्यक्ष को सामान्य बहुमत से नहीं हटाया जा सकता। बरन लोकसभा के समस्त सदस्यों के बहुमत से हटाया जा सकता है।

पीठासीन अधिकारी –

अध्यक्ष लोकसभा का पीठासीन अधिकारी होता है। उसकी अनुपस्थिति या पद रिक्त होने पर उपाध्यक्ष लोकसभा का पीठासीन अधिकारी होता है। लोकसभा अपने प्रक्रिया के नियम-9 के अनुसार अधिकतम 10 सदस्यों की एक सूची बनाती है। अध्यक्ष और उपाध्यक्ष दोनों की अनुपस्थिति में इनमें से किसी को पीठासीन किया जाता है। पीठासीन होने पर उसे वही शक्तियां प्राप्त होती हैं, जो अध्यक्ष को। तात्कालिक अध्यक्ष – नवगठित लोकसभा की पहली बैठक के संचालन हेतु ज्येष्ठता के आधार पर एक सदस्य को अस्थाई अध्यक्ष बनाया जाता है। स्थाई अध्यक्ष के चुनाव तक ये अध्यक्ष का कार्य करता है। ये सदन के नवनिर्वाचित सदस्यों को शपथ दिलाता है।

लोकसभा अध्यक्ष के कार्य –

लोकसभा अध्यक्ष लोकसभा का मुख्य अधिकारी होता है। इसकी सहायता के लिए लोकसभा सचिवालय होता है। अध्यक्ष लोकसभा की बैठकों में पीठासीन होता है। ये लोकसभा के कार्यों को नियंत्रित करता है। सदन की गरिमा व विशेषाधिकार बनाए रखने के लिए उत्तरदायी है। अध्यक्ष का वेतन भारत की सिंचित निधि पर भारित होता है। संसद में इस पर मतदान नहीं होता। अनुच्छेद 100 के अनुसार अध्यक्ष प्रथमतः मत नहीं देगा। परंतु दोनो पक्षों में मत बराबर रहने पर अध्यक्ष निर्णायत मत दे सकता है।

संसद : लोकसभा और राज्यसभा में गणपूर्ति या कोरम –

कोरम से तात्पर्य किसी सभा या संगठन की कार्यवाही शुरु करने की लिए नियत न्यूनतम सदस्य संख्या से है। लोकसभा के लिए यह कुल सदस्यों की 10 प्रतिशत संख्या तय की गई है। अर्थात लोकसभा की कार्यवाही तभी शुरु की जा सकती है जब उसके कुल सदस्यों का कम से कम 10 प्रतिशत हिस्सा उपस्थित हो।

संसद की संयुक्त बैठक –

संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक की अध्यक्षता लोकसभा अध्यक्ष द्वारा की जाती है।

लोकसभा उपाध्यक्ष –

अध्यक्ष के अनुपस्थित या पद रिक्त होने की स्थिति में उपाध्यक्ष पीठासीन होता है। यह लोकसभा का सदस्य होता है जिसे सदन द्वारा उपाध्यक्ष के रूप में चुना जाता है। इसका निर्वाचन अध्यक्ष के बाद होता है। 11वीं लोकसभा (1966 ई.) के पश्चात सभी दलों से स्वीकार किया कि लोकसभा उपाध्यक्ष विपक्षी दल से होगा। इससे पूर्व लोकसभा अध्यक्ष व उपाध्यक्ष दोनों ही सत्ताधारी पक्ष से होते थे। जब उपाध्यक्ष पीठासीन होता है तो उसे लोकसभा में प्रथमतः मत देने का अधिकार नहीं होता। परंतु मत बराबर रहने पर वह निर्णायक मत दे सकता है। उपाध्यक्ष अपना त्यागपत्र अध्यक्ष को संबोधित करता है। लोकसभा का सदस्य न रहने की स्थिति में उपाध्यक्ष का पद रिक्त माना जाता है। लोकसभा के समस्त सदस्यों के बहुमत से पारित संकल्प द्वारा भी उपाध्यक्ष को हटाया जा सकता है।

संसद : लोकसभा और राज्यसभा में विधेयकों के प्रकार –

संसद का प्रमुख कार्य होता है विधि बनाना। सामान्यतः विधेयकों को चार भागों में बांटा गया है –

1 – सामान्य विधेयक

2 – धन विधेयक

3 – वित्तीय विधेयक

4 – संविधान संशोधन विधेयक

संसद : लोकसभा और राज्यसभा की समितियां –

  • लोकलेखा समिति
  • प्राक्कलन समिति
  • लोक उपक्रम समिति
  • अनुसूचित जाति व जनजातियों के कल्याण संबंधी समिति
  • विभागों से संबद्ध स्थाई समितियां
  • अधीनस्थ विधान समिति

केंद्रशासित प्रदेशों में लोकसभा सीटों की संख्या –

केंद्रशासित प्रदेशलोकसभा सीटेंराज्यसभा सीटें
दिल्ली73
जम्मू-कश्मीर54
दमन-दीव और दादर व नागर हवेली2-
लद्दाख1-
चंडीगढ़1-
लक्षद्वीप1-
पदुच्चेरी11
अंडमान निकोबार द्वीप समूह1-

राज्य विधानमण्डल : विधानसभा और विधानपरिषद

राज्य विधानमण्डल : विधानसभा और विधानपरिषद – भारत में केंद्र एवं राज्य दोनों ही में संसदीय प्रणाली को अपनाया गया है। केंद्रीय विधानमण्डल में दो सदन हैं। संविधान में मूल रूप से यह व्यवस्था की गई थी कि जिन राज्यों की जनसंख्या अधिक है, उनके विधानमण्डल द्विसदनात्मक होंगे। इसके बाद कुछ राज्यों ने विधानपरिषद को अनावश्यक समझा। इनके अनुरोध पर संसद ने कानून बनाकर इसकी अनिवार्यता समाप्त कर दी।

2005 में संसद में आंध्रप्रदेश विधानपरिषद अधिनियम लाया गया। इसके तहत 4 अप्रैल 2007 को आंध्रप्रदेश के विधानपरिषद का पुनर्गठन किया गया। जिसे 1985 ई. में समाप्त कर दिया गया था। आंध्र प्रदेश विधानपरिषद का गठन 1957 ई. में किया गया था। पंजाब व पश्चिम बंगाल ने 1971 में अपनी विधान परिषदों का उत्सादन कर दिया था। संसद किसी राज्य के विधानपरिषद के उत्सादन या सृजन से संबंधित कानून बना सकती है। संविधान के अनुच्छेद 169 के अनुसार संसद किसी राज्य के विधानपरिषद के उत्सादन का उपबंध कर सकती है।

विधानमण्डल के सदस्य की अर्हताएं –

  • भारत का नागरिक हो। तीसरी अनुसूची में दिए गए प्रारूप के अनुसार शपथ लेना अनिवार्य है।
  • न्यूनतम आयु – विधानसभा हेतु 25 वर्ष और विधानपरिषद् हेतु 30 वर्ष।
  • राज्य के किसी विधानसभा क्षेत्र का मतदाता हो।

विधानमंडल की सदस्यता के लिए निरर्हताएं –

इनका वर्णन संविधान के अनुच्छेद 191 में किया गया है। यदि कोई सदस्य केंद्र या राज्य के अधीन कोई लाभ का पद अर्जित करता है तो वह निरर्ह होगा। बहुत से राज्यों ने नियम बनाकर ऐसे पदों की सूची तैयार की है जिनका धारक विधानमंडल का सदस्य होने से निरर्हित नहीं होगा।

यदि कोई सदस्य बिना अनुमति के 60 दिन तक सदन के अधिवेशनों में अनुपस्थित रहता है। तो अनुच्छेद 190(4) के अनुसार उसके स्थान को रिक्त घोषित किया जा सकता है। अनुच्छेद 192(2) के अनुसार सदस्य की निरर्हता के संबंध में राज्यपाल को निर्वाचन आयोग की राय के अनुसार कार्य करना पड़ेगा। कोई व्यक्ति एक ही समय में विधानसभा और विधानपरिषद् दोनों का सदस्य नहीं हो सकता। यदि कोई व्यक्ति दो या अधिक राज्यों के विधानमंडलों के लिए निर्वाचित होता है। तो अनुच्छेद 190(2) के अनुसार 10 दिन के अंदर एक के अतिरिक्त बाकी से त्यागपत्र देना होगा। अन्यथा उसके द्वारा अर्जित सभी पद रिक्त माने जाएंगे।

विधानसभा और विधानपरिषद से त्यागपत्र –

विधानपरिषद् सदस्य सभापति को अपना त्यागपत्र संबोधित करते हैं। विधानसभा सदस्य अपना त्यागपत्र विधानसभा अध्यक्ष को सौंपते हैं। वहीं यह त्यागपत्र सदस्य के हस्ताक्षर सहित होना अनिवार्य है। 1974 में संविधान के अनुच्छेद 190 का संशोधन इससे संबंधित है। इसके अनुसार सभाध्यक्ष या सभापति यह सुनिश्चित करेंगे कि त्यागपत्र स्वैच्छिक है अथवा किसी प्रपीड़न के अधीन नहीं दिया गया है। यह असली है अथवा कूटरचित नहीं है। पूर्ण रूप से संतुष्टि के बाद ही त्यागपत्र को स्वीकार किया जाएगा। दरअसल इस संशोधन का कारण गुजरात में 1974 में चिम्मनभाई सरकार के विरुद्ध नव निर्माण आंदोलन के दौरान कुछ सदस्यों पर दबाव डाल कर त्यागपत्र दिलवाए जाने की घटना है। भविष्य में इस प्रकार के कृत्य से बचने हेतु यह संशोधन किया गया।

विधानसभा निर्वाचन –

राज्य विधानसभाओं का निर्वाचन प्रत्यक्ष रूप से होता है। इसमें राज्य के मतदाता गुप्त मतदान के माध्यम से अपने प्रतिनिधि को चुनते हैं। इनका चुनाव वयस्क मताधिकार के आधार पर होता है।

विधानसभा सीटों की संख्या –

अनुच्छेद 170 के अनुसार विधानसभा सीटों की संख्या कम से कम 60 और अधिक से अधिक 500 हो सकती है। परंतु कुछ छोटे राज्यों की विधानसभा सीटों की न्यूनतम संख्या कम कर दी गई। सिक्किम, गोवा और अरुणाचल प्रदेश विधानसभा सीटों की न्यूनतम संख्या 30 है। भारत में उत्तर प्रदेश विधानसभा सबसे बड़ी है जिसमें कुल 403 सीटें हैं।

विधानसभा और विधानपरिषद में आरक्षण –

अनुच्छेद 332 के अनुसार राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई है। राज्यपाल विधानसभा में आंग्ल भारतीयों का प्रतिनिधित्व न होने पर अनुच्छेद 333 के अनुसार एक व्यक्ति का नाम निर्दिष्ट कर सकता है। अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण का प्रावधान मूलतः संविधान के प्रारंभ के 10 वर्ष के लिए किया गया था।

विधानसभा का कार्यकाल –

इसका कार्यकाल 5 वर्ष का होता है। परंतु इससे पूर्व भी इसके विघटन की शक्ति राज्यपाल में निहित है। हालांकि राज्यपाल की इस शक्ति का कई बार दुरुपयोग भी हुआ। 1977 में केंद्र की जनता पार्टी की सरकार ने 9 राज्यों की कांग्रेस सरकारों को त्यागपत्र देने, विधानसभा को विघटित कर पुनर्निर्वाचन कराने को कहा। 1980 में सत्ता में आने के बाद कांग्रेस सरकार ने भी यही किया। ऐसे 9 राज्यों की विधानसभाएं भंग कर दी जहाँ कांग्रेस की सरकार नहीं थी। 1992 में ऐसी चार विधानसभाएं विघटित कर दी गई जहाँ भारतीय जनता पार्टी का बहुमत था।

विधानसभा और विधानपरिषद में विधेयक –

सामान्य विधेयक को विधानमंडल के किसी भी सदन में प्रस्तुत किया जा सकता है। एक सदन से पारित होने के बाद दूसरे सदन को भेज दिया जाता है। दोनों सदनों से पारित होने के बाद इसे राज्यपाल के हस्ताक्षर के लिए भेजा जाता है। राज्यपाल के हस्ताक्षर के बाद ही कोई विधेयक कानून बनता है। धन विधेयक को सिर्फ विधानसभा में ही लाया जा सकता है।

विधान परिषद् –

यह राज्य विधानमण्डल का स्थाई सदन है। इसका विघटन नहीं किया जा सकता। परंतु इसे समाप्त किया जा सकता है। इसके सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्ष होता है। इसके एक तिहाई सदस्य हर साल सेवानिवृत्त और निर्वाचित होते रहते हैं। किसी सदस्य की मृत्यु या त्यागपत्र से रिक्त स्थान को भरने के लिए आकस्मिक रिक्ति को भरने के लिए निर्वाचित सदस्य उस सदस्य के शेष कार्यकाल तक ही परिषद् का सदस्य रहेगा न कि 6 वर्ष के लिए। अनुच्छेद 171 के अनुसार विधान परिषद् की न्यूनतम सदस्य संख्या 40 निर्धारित की गई है। यह संख्या राज्य विधानसभा की सदस्य संख्या के एक तिहाई से अधिक नहीं होनी चाहिए। यह अनुच्छेद संसद को विधानपरिषद् की संरचना के लिए उपबंध करने का अधिकार देता है।

वर्तमान में किन राज्यों में विधान परिषद हैं ?

वर्तमान में कुल 6 राज्यों में विधान परिषद हैं –

उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक।

विधान परिषद् का गठन –

  • एक तिहाई सदस्य – नगरपालिकाओं, जिला बोर्डों, और अन्य स्थानीय प्राधिकारियों के सदस्यों से मिलकर बने निर्वाचक मण्डल द्वारा निर्वाचित किये जाते हैं।
  • एक तिहाई सदस्य – राज्य विधानसभा के निर्वाचित सदस्यों द्वारा ऐसे व्यक्तियों में से चुने जाते हैं, जो सभा के सदस्य न हों।
  • 1/6 सदस्य – राज्यपाल द्वारा निर्दिष्ट किये जाते हैं। राज्यपाल इन्हें कला, विज्ञान, साहित्य, समाज सेवा, सहकारी आंदोलन में किये गए योगदान के आधार पर चुनता है।
  • 1/12 सदस्य – तीन वर्ष से स्नातक हो चुके मतदाताओं द्वारा निर्वाचित किये जाते हैं।
  • 1/12 सदस्य – शिक्षकों के निर्वाचन मण्डल द्वारा निर्वाचित होते हैं। माध्यमिक शिक्षा से ऊपर के संस्थानों में 3 साल से अधिक से पढ़ा रहे शिक्षक इसके लिए पात्र होंगे।
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