प्रमुख समितियां : Pramukh Samitiyan

प्रमुख समितियां : Pramukh Samitiyan – लकड़ावाला, सुरेश तेंदुलकर, सी. रंगराजन समिति, लोकलेखा, प्राक्कलन समिति, लोक उपक्रम समिति।

लकड़वाला समिति –

  • अध्यक्ष – प्रो. डी. टी. लकड़ावाला
  • गठन – 1989
  • उद्देश्य – देश में निर्धनता की माप
  • रिपोर्ट प्रस्तुत की – 1993 में

योजना आयोग ने देश में निर्धनता की माप करने के उद्देश्य से 1989 ई. में प्रो. डी. टी. लकड़ावाला की अध्यक्षता में इस समिति का गठन किया था। 4 साल के कार्य के बाद इस समिति ने अपनी रिपोर्ट 1993 में प्रस्तुत की। समिति ने मूल्य स्तर के आधार पर प्रत्येक राज्य में अलग-अलग निर्धनता रेखा का निर्धारण किया। अर्थात् हर राज्य की निर्धनता रेखा अलग-अलग होगी। इसके अनुसार 35 गरीबी रेखाएं बताई गईं, जिनकी संख्या शुरु में 28 थी।

समिति ने हर राज्य में गाँव व शहरी निर्धनता हेतु अलग-अलग मूल्य सूचकांकों का निर्धारण किया। कृषि श्रमिकों के लिए समिति ने ‘उपभोक्ता मूल्य सूचकांक’ का सुझाव दिया। समिति ने शहरी क्षेत्र में निर्धनता रेखा के लिए औद्योगिक श्रमिकों के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक और शहरी भिन्न कर्मचारियों हेतु उपभोक्ता मूल्य सूचकांक सुझाया। समिति के सुझाव के परिणामस्वरूप कोई विशिष्ट अथवा निर्धारित निर्धनता रेखा नहीं रही। इसके स्थान पर राज्य विशिष्ट निर्धनता रेखा हुई। जिनके एक राष्ट्रीय निर्धनता रेखा का निर्धारण किया जा सका।

सुरेश तेंदुलकर समिति –

  • अध्यक्ष – सुरेश तेंदुलकर
  • गठन – 2004 में
  • रिपोर्ट प्रस्तुत की – 2009 में
  • उद्देश्य – यह जांच करना कि भारत की गरीबी वास्तव में गिर रही है या नहीं।

योजना आयोग ने 2004 ई. में भारत के अर्थशास्त्री सुरेश तेंदुलकर की अध्यक्षता में इस समिति का गठन किया। इस समिति ने अपनी रिपोर्ट 2009 ई. में प्रस्तुत की। इस समिति का गठन मुख्य रूप से यह पता करने के लिए किया गया था कि भारत की गरीबी वास्तव में कर हो रही है कि नहीं। साथ ही नई गरीबी रेखा और गरीबी के संबंध में अनुमान प्रस्तुत करना था। इस समिति ने जीने के लिए अदा की जाने वाली कीमत (Cost of Living Index) की बात की। इस समिति ने गरीबी रेखा का निर्धारण उपभोक्ताओं द्वारा लिए जाने वाले खाद्यान्न के अतिरिक्त कुछ अन्य बुनियादी आवश्यकताओं के आधार पर किया। ये आवश्यकताएं थीं – शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छ वातावरण, बुनियादी संरचना, महिलाओं की काम तथा लाभ तक पहुँच के आधार पर किया।

इस समिति ने ग्रामीण व शहरी दोनों उपभोक्ताओं हेतु एक ही उपभोक्ता बास्केट का उपभोग किया। समिति ने गरीबी रेखा के निर्धारण हेतु जीवन निर्वाह लागत सूचकांक यानी ‘प्रति व्यक्ति उपभोक्ता व्यय’ को आधार बनाया। अध्ययन के बाद समिति की रिपोर्ट के अनुसार शहरी जनसंख्या का 25.7% और ग्रामीण जनसंख्या का 41.8% गरीबी रेखा से नीचे था। वहीं संपूर्ण भारत के स्तर पर देखा जाए तो 37.2% जनसंख्या गरीबी रेखा के नीचे थी।

सी. रंगराजन समिति –

  • गठन – 2012 में
  • अध्यक्ष – सी. रंगराजन
  • रिपोर्ट प्रस्तुत की – जुलाई 2014 में

योजना आयोग ने 2012 में सी. रंगराजन की अध्यक्षता में इस समिति का गठन किया। आयोग ने इसे तेंदुलकर समिति की जगह गठित किया था। सी. रंगराजन समिति ने अपनी रिपोर्ट जिलाई 2014 में प्रस्तुत की। इस समिति ने तेंदुलकर समिति के आकलन के तरीकों को खारिज किया। रंगराजन समिति की रिपोर्ट के अनुसार 2011-12 में 29.5 प्रतिशत लोग गरीब थे। जब्कि तेंदुलकर समिति ने गरीबों की संख्या 21.9 प्रतिशत बताई थी। इसमें शहरी जनसंख्या के 26.4 प्रतिशत और ग्रामीण जनसंख्या का 30.09 प्रतिशत गरीबी रेखा से नीचे थी।

संसद की प्रमुख समितियां Pramukh Samitiyan

लोकलेखा समिति –

  • सदस्य संख्या – 22
  • अध्यक्ष – विपक्ष का सदस्य

यह एक संसदीय समिति है। यह समिति मुख्य रूप से केंद्र सरकार के विनियोग लेखाओं पर नियंत्रण एवं महालेखा परीक्षक के प्रतिवेदन की समीक्षा करती है। समिति यह समाधान करती है कि जिस राशि का आवंटन हुआ है, क्या उसका प्रयोग उसी के लिए किया जा रहा है। जिसके लिए उस राशि को उपलब्ध किया गया है। इस समिति में कुल 22 सदस्य होते हैं। इनमें 15 सदस्य लोकसभा से होते हैं। इनका चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व के आधार पर एकल संक्रमणीय मत पद्यति से होता है। बाकी 7 सदस्य राज्यसभा से नामनिर्दिष्ट किये जाते हैं।

कोई मंत्री इस समिति का सदस्य निर्वाचित नहीं हो सकता है। यदि कोई व्यक्ति समिति का सदस्य बनने के बाद मंत्री बनता है। तो मंत्री बनने की तिथि से वह समिति का सदस्य नहीं रहेगा। सदस्यों की अवधि 1 वर्ष की होती है। इस समिति का अध्यक्ष विपक्ष का कोई सदस्य होता है। अध्यक्ष को दूसरे वर्ष फिर से भी चुना जा सकता है।

प्राक्कलन समिति –

  • सदस्य संख्या – 30 (अधिकतम)

इसका गठन सरकार द्वारा प्रस्तावित व्यय की समीक्षा करने के लिए किया गया है। यह समिति सरकार की आर्थिक नीतियां बनाती है। इन नीतियों के क्रियान्वयन हेतु संसद के समक्ष मांग प्रस्तुत करती है। लोकलेख समिति का गठन लोकसभा में बजट प्रस्तुत किये जाने के बाद किया जाता है। प्रकरणों की जांच करने के संबंध में यह समिति सुझाव देती है। इस समिति के सदस्यों का चयन आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्यति से एकल संक्रमणीय मत के द्वारा किया जाता है।

कोई मंत्री इस समिति का सदस्य नहीं हो सकता। समिति का सदस्य बनने के बाद यदि कोई मंत्री बनता है। तो मंत्री बनने के बाद समिति से उसकी सदस्यता समाप्त हो जाएगी। इसके सदस्य अधिकतम 1 वर्ष के लिए चुने जाते हैं। समिति साल भर कार्य करती है और अपने प्रतिवेदन संसद के समक्ष रखती है। प्राक्कलन समिति के प्रतिवेदन पर संसद में बहस नहीं होगी। सरकार की अनुदान मांगें इस समिति के प्रतिवेदन की प्रतीक्षा नहीं करती। यह समिति उपयोगी सुझाव देती है। आगामी वित्त वर्ष में सरकार को बढ़ा-चढ़ाकर मांग करने से रोकती है।

लोक उपक्रम समिति –

  • सदस्य संख्या – 22
  • सदस्यता अवधि – 1 वर्ष

यह समिति लोकसभा के नियमों में विनिर्दिष्ट सरकार उपक्रमों के प्रतिवेदन व लेखाओं की जांच करती है। समिति सरकारी कंपनी के लेखाओं की भी जांच करती है। जिसके लेखा कंपनी अधिनियम के अधीन सदन के पटल पर रखे जाते हैं। यह समिति सरकारी उपक्रमों के संबंध में नियंत्रण एवं महालेखा परीक्षक के प्रतिवेदनों की जांच करती है। यह समिति ये भी देखती है कि सरकारी उपक्रम समुचित व्यापारिक सिद्धांतों व विवेकपूर्ण वाणिज्यिक प्रादर्शों के अनुरूप कार्य कर रहें हैं अथवा नहीं। इसके अतिरिक्त अध्यक्ष द्वारा भी समिति को कुछ विषय निर्दिष्ट किये जाते हैं। इनकी जांच भी समिति द्वारा की जाती है।

इस समिति के सदस्यों की संख्या 22 से अधिक नहीं हो सकती। इनमें 15 सदस्य लोकसभा से होते हैं। इनका चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व के आधार पर एकल संक्रमणीय मत पद्यति से होता है। बाकी 7 सदस्य राज्यसभा द्वारा नामनिर्दिष्ट किये जाते हैं। इन सदस्यों की कालावधि 1 वर्ष से अधिक नहीं होती। इस समिति में भी मंत्री सदस्य नहीं बन सकते। सदस्य बनने के बाद मंत्री बनने पर समिति की सदस्यता समाप्त हो जाएगी।

अधीनस्थ विधान समिति –

  • सदस्य – 15

यह राज्यसभा की समिति है। यह समिति किसी अधीनस्थ प्राधिकारी को प्रत्यायोजित विधायी कृत्यों के अनुसरण में बनाए गए प्रत्येक नियम, विनियम, उपवधि आदि की समीक्षा करती है। जिन्हें संसद के समक्ष रखे जाने की अपेक्षा है। इस समिति के सदस्यों की संख्या 15 होती है। ये सभी राज्यसभा के सभापति द्वारा नामनिर्दिष्ट किये जाते हैं। आकस्मिक रिक्तियां भी सभा द्वारा ही भरी जाती हैं। इसके कोरम (गणपूर्ति) के लिए 5 सदस्य होना अनिवार्य है। यह समिति नई समिति के गठन तक कार्य करती है। समय-समय पर समिति द्वारा अपने प्रतिवेदन प्रस्तुत किये जाते हैं। समिति किसी नियम, विनियम आदि के निरसित करने, संशोधन करने संबंधी सुझाव भी सभापति के समक्ष रखती है। प्रमुख समितियां Pramukh Samitiyan.

भारतीय संसद : लोकसभा और राज्यसभा

भारतीय संसद : लोकसभा और राज्यसभा ( Indian Parliament Loksabha and Rajyasabha ) – भारत में संसदीय लोकतंत्र की व्यवस्था की गई है। जो कि ब्रिटिश संसदीय व्यवस्था पर आधारित है। चूंकि भारत लंबे समय तक ब्रिटेन का उपनिवेश रहा, इसलिए उसका प्रभाव इस पर लाजमी है। भारत की केंद्रीय व्यवस्थापिका को संसद के नाम से जाना जाता है।

seventeenth loksabha

संसद का गठन –

भारतीय संसद के तीन अंग – लोकसभा, राज्यसभा, और राष्ट्रपति हैं। संसद के दो सदन हैं। उच्च सदन को राज्यसभा और निम्न सदन को लोकसभा के नाम से जाना जाता है। लोकसभा को जनता का सदन भी कहा जाता है। क्योंकि इसके सदस्य सीधे जनता द्वारा निर्वाचित होते हैं। राष्ट्रपति किसी सदन का सदस्य नहीं होता। परंतु वह भारतीय संसद का अभिन्न अंग है। दोनो सदनों द्वारा पारित विधेयक राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद ही विधि बनता है। राष्ट्रपति अभिभाषण के लिए ही सदन में प्रवेश करता है। नवनिर्वाचित लोकसभा के प्रथम सत्र के प्रारंभ में और वर्ष के पहले सत्र के प्रारंभ में राष्ट्रपति द्वारा दोनो सदनों में सम्मिलित अभिभाषण दिया जाता है।

राज्यसभा की संरचना –

यह भारतीय संसद का उच्च सदन है। यह एक स्थाई सदन है, अतः इसे भंग नहीं किया जा सकता। इसके सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्ष का होता है। इसके एक तिहाई सदस्यों का कार्यकाल हर दो साल में पूर्ण होता है। इसके लिए हर दो साल में निर्वाचन होते हैं। यह एक केंद्रीय संस्था है, यह राज्यों के स्थानीय हितों का प्रतिनिधित्व नहीं करती। राज्यसभा में सदस्यों की अधिकतम संख्या 250 हो सकती है। इनमें 238 सदस्य राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों से होते हैं। 12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा नामनिर्दिष्ट किये जाते हैं। ये 12 सदस्य कला, विज्ञान, साहित्य, समाजसेवा के क्षेत्र से आते हैं। लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 के अनुसार यह नियम बनाया गया था कि जिस राज्यसभा सीट के लिए व्यक्ति निर्वाचित होना चाहता है, उसे उस राज्य का सामान्य निवासी होना अनिवार्य है। परंतु साल 2003 में संशोधन कर इस नियम को बदल दिया गया।

लोकसभा की संरचना –

यह भारतीय संसद का निम्न एवं अस्थाई सदन है। इसे जनता का सदन भी कहा जाता है। क्योंकि इसके सदस्य सीधे जनता द्वारा चुने जाते हैं। इसका कार्यकाल 5 वर्ष का होता है। इससे पहले भी इसे भंग किया जा सकता है। केंद्रीय मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से इसी के प्रति उत्तरदायी होती है। संविधान के अनुच्छेद 331 के अनुसार राष्ट्रपति लोकसभा में अधिकतम 2 आंग्ल-भारतीयों के नाम निर्दिष्ट कर सकता है। अनुच्छेद 326 के अनुसार लोकसभा में वयस्क मताधिकार की व्यवस्था है। अर्थात 18 वर्ष से अधिक आयु का कोई भी भारतीय नागरिक लोकसभा निर्वाचन में मतदान के लिए अर्ह है। 1988 से पहले मतदाता की निम्नतम आयु सीमा 21 वर्ष थी। लोकसभा में अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई है। किंतु धर्म के आधार पर कोई आरक्षण नहीं है।

राज्यवार लोकसभा सीटों की संख्या

राज्यलोकसभा सीटेंराज्यसभा सीटें
उत्तर प्रदेश8031
महाराष्ट्र4819
प. बंगाल4116
बिहार4016
तमिलनाडु3918
मध्यप्रदेश2911
कर्नाटक2812
गुजरात2611
राजस्थान2510
आंध्र प्रदेश2511
ओडिशा2110
केरल209
तेलंगाना177
असम147
झारखण्ड146
पंजाब137
छत्तीसगढ़115
हरियाणा105
उत्तराखण्ड53
हिमाचल प्रदेश43
मनिपुर21
गोवा21
अरुणाचल21
मेघालय21
त्रिपुरा21
मिजोरम11
नागालैंड11
सिक्किम11

संसदीय लोकतंत्र के आधारिक तत्व –

  • जनता का प्रतिनिधित्व
  • उत्तरदायित्वपूर्ण सरकार
  • मंत्रिपरिषद का विधानमण्डल के प्रति उत्तरदायी होना

मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होती है।

अनुच्छेद 75(3) के अनुसार मंत्रिपरिषद् तभी तक पद पर रहती है जब तक उसे लोकसभा में बहुमत का समर्थन प्राप्त हो।

अनुच्छेद 84 में संसद की सदस्यता संबंधी अर्हताएं वर्णित हैं।

संसद सदस्य होने के लिए निरर्हताओं का वर्णन संविधान के अनुच्छेद 102 में किया गया है।

संसद की दोहरी सदस्यता –

यदि कोई व्यक्ति संसद के दोनों सदनों का सदस्य बन जाता है तो उसे 10 दिन के अंदर किसी एक सदन की सदस्यता चुननी होगी। ऐसा न करने पर उसे सभी सदस्यताओं से अमान्य घोषित कर दिया जाएगा। ऐसा लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 68 और 69 के तहत होगा। संसद के साथ ही यदि कोई व्यक्ति राज्य विधानमण्डल का भी सदस्य बन जाता है। तो राज्य विधानमंडल से त्यागपत्र न देने की स्थिति में 14 दिन के बाद संसद में उसका पद रिक्त हो जाएगा

अनुच्छेद 85 –

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 85 राष्ट्रपति की संसदीय शक्ति से संबंधित है। यह राष्ट्रपति को संसद के प्रत्येक सदन को आहूत करने व सत्रावसान करने का अधिकार देता है। यह राष्ट्रपति को लोकसभा का विघटन करने का अधिकार देता है। इसी अनुच्छेद के अनुसार संसद के सत्र की अंतिम बैठक और अगले सत्र की प्रथम बैठक के बीच 6 माह से अधिक का समय नहीं होगा। अर्थात साल में संसद के कम से कम दो अधिवेशन होना अनिवार्य है।

बजट सत्र –

भारतीय संविधान में बजट शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है। इसके स्थान पर ‘वार्षिक वित्तीय विवरण’ शब्द प्रयोग में लाया गया है। बजट सत्र फरवरी माह के तीसरे सप्ताह में प्रारंभ होता है। यह वर्ष का पहला अधिवेशन होता है। इस वजह से संसद के दोनो सदन समवेत होते हैं। इसमें राष्ट्रपति का अभिभाषण होता है। अभिभाषण के दो-चार दिन बाद ही रेल बजट प्रस्तुत किया जाता था। इसके दो तीन दिन बाद सरकार लोकसभा के समक्ष आर्थिक सर्वेक्षण रखती है। यह राष्ट्र की अर्थव्यवस्था का सर्वेक्षण होता है। फरवरी माह के अंतिम दिन बजट प्रस्तुत किया जाता है। पहले बजट प्रस्तुत करने का समय सांय 5 बजे का था। परंतु साल 2001 से इसे दिन के 11 बजे प्रस्तुत किया जाने लगा। बजट प्रस्तुत होने के बाद सदन द्वारा राष्ट्रपति के अभिभाषण के लिए धन्यवाद प्रस्ताव पारित किया जाता है।

वर्षा सत्र –

यह सत्र सामान्यतः जुलाई के तीसरे सप्ताह में शुरु होता है। इस समय हमारे देश में वर्षा ऋतु होने के कारण इसे वर्षा सत्र कहा जाता है। इस सत्र में मुख्यतः विधायी कार्य अर्थात अधिनियम पारित होने के कार्य होते हैं।

शीत सत्र –

यह नवंबर माह के दूसरे या तीसरे सप्ताह में प्रारंभ होता है। यह दिसंबर के तीसरे सप्ताह में समाप्त होता है। इस सत्र में भी अधिकतर विधायी कार्यों की ओर ध्यान दिया जाता है।

स्थगन –

किसी बैठक के कार्य के निलबंन को स्थगन की संज्ञा दी गई है। किसी बैठक का स्थगन उसकी अध्यक्षता करने वाले अधिकारी द्वारा किया जाता है। स्थगन कुछ मिनटों से लेकर कुछ दिनों तक का हो सकता है। सदन में गंभीर स्थिति उत्पन्न होने पर अध्यक्ष सदन को कुछ समय के लिए स्थगित कर देता है। स्थगन के साथ ही सदन के दोबारा शुरु होने का समय भी बताया जाता है। परंतु जब स्थगन के साथ सदन के शुरु होने का समय न बताया जाए, तब कहा जाता है कि सदन अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दिया गया है। अंग्रेजी में इसे ‘साइन डाइ’ कहा जाता है। इसका अर्थ होता है ‘आगामी बैठक का दिन तय किये बिना’। सामान्यतः सदन के अंतिम दिन का स्थगन अनिश्चित काल का स्थगन होता है।

सदन का सत्रावसान –

सदन का सत्रावसान राष्ट्रपति द्वारा किया जाता है। यह कार्य राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद की सलाह पर करता है। यह सदन के अनिश्चित काल के स्थगन के बाद किया जाता है। सत्रावसान से सत्र समाप्त हो जाता है।

लोकसभा का वघटन –

लोकसभा के विघटन की शक्ति राष्ट्रपति में निहित है। कुछ परिस्थितियों को छोड़कर राष्ट्रपति यह कार्य भी मंत्रिपरिषद की सलाह पर करता है। राज्यसभा एक स्थाई सदन है अतः इसका विघटन नहीं किया जा सकता। संसद के केवल निम्न सदन (लोकसभा) का ही विघटन किया जाता है। विघटन किसी लोकसभा के कार्यकाल का अंत होता है। इसके बाद निर्वाचन करा कर नई लोकसभा गठित की जाती है।

सत्र किसे कहते हैं ?

वह कालावधि जो अधिवेशन की तारीख से लेकर उसके सत्रावसान या विघटन तक होती है, सत्र कहलाती है। सदन के सत्रावसान और अगले सत्र के प्रारंभ के बीच की कालावधि विश्रांतिकाल कहलाती है।

सत्र प्रारंभ होने के बाद का हर दिन अधिवेशन होता है। यह अधिवेशन दो कालों में विभक्त होता है। पहला भोजनावकाश से पहले का और भोजनावकाश के बाद का। मंत्रणा समिति की सलाह पर हर बैठक में कामकाज के लिए समय आबंटित किया जाता है। सदन की कार्यवाही शुरु होने के पहले घंटे को प्रश्नकाल कहा जाता है। इसमें प्रश्नों के उत्तर दिये जाते हैं।

लोकसभा अध्यक्ष –

संविधान के अनुच्छेद 93 में लोकसभाध्यक्ष और उपाध्यक्ष का उल्लेख किया गया है। लोकसभा अपने सदस्यों में से ही एक को अध्यक्ष व एक को उपाध्यक्ष चुनती है। प्रत्येक आम चुनाव के बाद राष्ट्रपति द्वारा नियत समय पर लोकसभा अध्यक्ष का चुनाव करवाया जाता है। इसके बाद अध्यक्ष द्वारा उपाध्यक्ष का चुनाव कराया जाता है। लोकसभा के विघटन पर अध्यक्ष अपना पद रिक्त नहीं करता है। वह विघटन के पश्चात होने वाले लोकसभा के पहले अधिवेशन के ठीक पूर्व तक लोकसभा का अध्यक्ष रहता है। परंतु कुछ परिस्थितियों में लोकसभा अध्यक्ष व उपाध्यक्ष का पद रिक्त हो सकता है। ये परिस्थितियां निम्नलिखित हैं –

– जब वह लोकसभा का सदस्य न रहे।

– स्वयं के द्वारा दिये गए त्यागपत्र के माध्यम से। अध्यक्ष अपना त्यागपत्र उपाध्यक्ष को और उपाध्यक्ष अपना त्यागपत्र अध्यक्ष को संवोदित करता है।

– लोकसभा सदस्यों के तत्कालीन बहुमत से पारित संकल्प द्वारा हटाए जाने पर।

लोकसभा अध्यक्ष का पद से हटाया जाना –

अध्यक्ष को हटाए जाने के संकल्प को प्रस्तावित किये जाने की सूचना 14 दिन पहले दी जानी चाहिए। अध्यक्ष उस वक्त पीठासीन नहीं होगा जब उसे हटाने के संकल्प पर विचार चल रहा हो। परंतु उसे सभा में बोलने और कार्यवाही में अन्यथा भाग लेने का अधिकार होगा। उसे संकल्प पर प्रथमतः मत देने का अधिकार होगा। परंतु मत बराबर होने पर वह निर्णायक मत नहीं दे सकता (अनुच्छेद – 96)। अध्यक्ष को सामान्य बहुमत से नहीं हटाया जा सकता। बरन लोकसभा के समस्त सदस्यों के बहुमत से हटाया जा सकता है।

पीठासीन अधिकारी –

अध्यक्ष लोकसभा का पीठासीन अधिकारी होता है। उसकी अनुपस्थिति या पद रिक्त होने पर उपाध्यक्ष लोकसभा का पीठासीन अधिकारी होता है। लोकसभा अपने प्रक्रिया के नियम-9 के अनुसार अधिकतम 10 सदस्यों की एक सूची बनाती है। अध्यक्ष और उपाध्यक्ष दोनों की अनुपस्थिति में इनमें से किसी को पीठासीन किया जाता है। पीठासीन होने पर उसे वही शक्तियां प्राप्त होती हैं, जो अध्यक्ष को। तात्कालिक अध्यक्ष – नवगठित लोकसभा की पहली बैठक के संचालन हेतु ज्येष्ठता के आधार पर एक सदस्य को अस्थाई अध्यक्ष बनाया जाता है। स्थाई अध्यक्ष के चुनाव तक ये अध्यक्ष का कार्य करता है। ये सदन के नवनिर्वाचित सदस्यों को शपथ दिलाता है।

लोकसभा अध्यक्ष के कार्य –

लोकसभा अध्यक्ष लोकसभा का मुख्य अधिकारी होता है। इसकी सहायता के लिए लोकसभा सचिवालय होता है। अध्यक्ष लोकसभा की बैठकों में पीठासीन होता है। ये लोकसभा के कार्यों को नियंत्रित करता है। सदन की गरिमा व विशेषाधिकार बनाए रखने के लिए उत्तरदायी है। अध्यक्ष का वेतन भारत की सिंचित निधि पर भारित होता है। संसद में इस पर मतदान नहीं होता। अनुच्छेद 100 के अनुसार अध्यक्ष प्रथमतः मत नहीं देगा। परंतु दोनो पक्षों में मत बराबर रहने पर अध्यक्ष निर्णायत मत दे सकता है।

संसद : लोकसभा और राज्यसभा में गणपूर्ति या कोरम –

कोरम से तात्पर्य किसी सभा या संगठन की कार्यवाही शुरु करने की लिए नियत न्यूनतम सदस्य संख्या से है। लोकसभा के लिए यह कुल सदस्यों की 10 प्रतिशत संख्या तय की गई है। अर्थात लोकसभा की कार्यवाही तभी शुरु की जा सकती है जब उसके कुल सदस्यों का कम से कम 10 प्रतिशत हिस्सा उपस्थित हो।

संसद की संयुक्त बैठक –

संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक की अध्यक्षता लोकसभा अध्यक्ष द्वारा की जाती है।

लोकसभा उपाध्यक्ष –

अध्यक्ष के अनुपस्थित या पद रिक्त होने की स्थिति में उपाध्यक्ष पीठासीन होता है। यह लोकसभा का सदस्य होता है जिसे सदन द्वारा उपाध्यक्ष के रूप में चुना जाता है। इसका निर्वाचन अध्यक्ष के बाद होता है। 11वीं लोकसभा (1966 ई.) के पश्चात सभी दलों से स्वीकार किया कि लोकसभा उपाध्यक्ष विपक्षी दल से होगा। इससे पूर्व लोकसभा अध्यक्ष व उपाध्यक्ष दोनों ही सत्ताधारी पक्ष से होते थे। जब उपाध्यक्ष पीठासीन होता है तो उसे लोकसभा में प्रथमतः मत देने का अधिकार नहीं होता। परंतु मत बराबर रहने पर वह निर्णायक मत दे सकता है। उपाध्यक्ष अपना त्यागपत्र अध्यक्ष को संबोधित करता है। लोकसभा का सदस्य न रहने की स्थिति में उपाध्यक्ष का पद रिक्त माना जाता है। लोकसभा के समस्त सदस्यों के बहुमत से पारित संकल्प द्वारा भी उपाध्यक्ष को हटाया जा सकता है।

संसद : लोकसभा और राज्यसभा में विधेयकों के प्रकार –

संसद का प्रमुख कार्य होता है विधि बनाना। सामान्यतः विधेयकों को चार भागों में बांटा गया है –

1 – सामान्य विधेयक

2 – धन विधेयक

3 – वित्तीय विधेयक

4 – संविधान संशोधन विधेयक

संसद : लोकसभा और राज्यसभा की समितियां –

  • लोकलेखा समिति
  • प्राक्कलन समिति
  • लोक उपक्रम समिति
  • अनुसूचित जाति व जनजातियों के कल्याण संबंधी समिति
  • विभागों से संबद्ध स्थाई समितियां
  • अधीनस्थ विधान समिति

केंद्रशासित प्रदेशों में लोकसभा सीटों की संख्या –

केंद्रशासित प्रदेशलोकसभा सीटेंराज्यसभा सीटें
दिल्ली73
जम्मू-कश्मीर54
दमन-दीव और दादर व नागर हवेली2-
लद्दाख1-
चंडीगढ़1-
लक्षद्वीप1-
पदुच्चेरी11
अंडमान निकोबार द्वीप समूह1-
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