समानार्थक या समानार्थी शब्दों में अन्तर

समानार्थक या समानार्थी शब्दहिन्दी भाषा में बहुत से ऐसे शब्द हैं जिनके अर्थ लगभग समान बैठते हैं। परंतु ऐसे शब्दों के अर्थों में जरा सी असमानता होती है। सामान्य या कम पढ़े लिखे व्यक्ति के लिए इन शब्दों में अन्तर कर पाना मुश्किल होता है। लेकिन हिन्दी भाषा का गहन अध्ययन करने पर इन बारीकियों की समझ आ जाती है। बहुत से शब्द जिनका एक ही पर्याय निकलता है वे पर्यायवाची कहलाते हैं। परंतु किसी शब्द के बहुत से पर्यायवाची शब्दों के अर्थों में भी थोड़ा अन्तर होता है। परंतु यह सामान्य जन के लिए समझना थोड़ा मुश्किल होता है। इसलिए उन शब्दों के अर्थ को लोग समान ही समझते हैं।

शब्दअर्थ
हत्याछिपकर किसी को मार डालना।
वधखुले आम किसी को मार डालना।
मनुष्यमानव जाति के स्त्री व पुरुष दोनों प्राणी।
पुरुषमानव जाति का पुरुष (नर) प्राणी।
मौनबोलने का गुण होने पर भी शान्त रहना।
मूकगूंगा होना अर्थात बोल पाने में अक्षम होना।
अस्त्रफेंक कर चलाया जाने वाला हथियार। जैसे - तीर, भाला, बम इत्यादि।
शस्त्रहाथ में थामकर चलाया जाने वाला हथियार। जैसे - तलवार, बन्दूक, रायफल इत्यादि।
अध्यक्षकिसी संस्था हेतु किसी सभा इत्यादि का प्रमुख या प्रधान।
सभापतिकुछ समय के लिए किसी सभा का प्रधान या प्रमुख।
अनुजछोटा भाई।
अग्रजबड़ा भाई।
भाईछोटे व बड़े दोनो अर्थों में।
अगमजहाँ न पहुँचा जा सके।
दुर्गमजहाँ पहुँच पाना कठिन हो।
अधरनीचे का ओंठ।
ओंठनीचे व ऊपर दोनों होंठ
अनवनआपस में किसी की न बनना।
खटपटकिसी बात या विषय पर न लड़ना।
व्ययखर्च करना।
अपव्ययफिजूल खर्च करना।
अनुग्रहप्रसन्न होकर किसी पर कृपा करना।
अनुकम्पादुःखी देखकर किसी पर दया करना।
अज्ञजिसे थोड़ा ज्ञान हो।
अभिज्ञअनेक विषयों का ज्ञाता।
विज्ञकिसी विशेष विषय का ज्ञाता।
अनभिज्ञजिसे बिल्कुल भी ज्ञान न हो।
अज्ञेयजो समझ में न आ सके।
अज्ञातजिसकी जानकारी किसी को न हो।
अनुमतिइजाजत।
आज्ञाहुक्म।
अर्पणकिसी बड़े को कुछ देना।
प्रदानबड़े द्वारा किसी छोटे को कुछ देना।
अनुरागस्त्री पुरुष का आपसी प्रेम।
वात्सल्यबड़ों का छोटों के प्रति स्नेह।
ममतामाता का पुत्र के प्रति प्रेम।
उपद्रवीअपने व्यवहार द्वारा वातावरण में विषमता फैलाने वाला।
उच्छृंखलसामाजिक मर्यादाओं का उल्लंघन करने वाला।
उद्दण्डजिसे दण्ड का भय न हो।
अभिमानखुद को दूसरों से श्रेष्ठ समझना।
अहंकारझूठा घमण्ड।
आधिमानसिक व्यथा।
व्याधिशारीरिक व्यथा।
राजाकिसी देश का स्वामी।
सम्राटराजाओं का राजा।
आवासरहने का कोई भी स्थान।
गृहपरिवार से सम्बन्ध रखने वाला निवास स्थान।
आलयचार दीवारी खिचीं हों, वह घर।
सौधसीमेंट या चूने से बना हुआ विशाल भवन।
अभिलाषाकोई विशेष इच्छा।
इच्छाकिसी भी वस्तु के लिए सामान्य इच्छा।
अद्भुतविस्मयजनक।
अनुपमजिसकी उपमा किसी से न की जा सके।
अपूर्वजिसका पूर्व अनुभव न किया गया हो।
आत्माहर जीव के अन्दर उपस्थित चेतन तत्व।
अन्तःकरणविवेक शक्ति।
उद्योगकार्य करने के लिए निर्मित वस्तु विशेष
उद्यमकार्य करने के लिए तत्पर भाव होना।
पापनैतिक नियमों के विरुद्ध किया गया कार्य
अपराधकानूनों का उल्लंघन करना।
ईर्ष्याकिसी के उत्थान को देखकर जलना।
द्वेषघृणा या शत्रुतावश किसी के विरोध का स्थाई भाव।
स्पर्द्धाकिसी क्षेत्र में आपसी प्रतियोगिता का भाव।
अनुसंधानतथ्यों द्वारा संबंधित संदर्भ की गहरी छानबीन।
अन्वेषणपहले से उपस्थित किसी देश या वस्तु की खोज करना।
आविष्कारकिसी ऐसी वस्तु का सृजन करना जो पहले से न हो।
अधर्मधर्म के विरुद्ध किया गया आचरण।
अन्यायविधि विरुद्ध कार्य।
अनुरोधबराबर के व्यक्ति से की गई प्रार्थना।
प्रार्थनाबड़ों से की गई प्रार्थना।
आलोचनागुण दोषों का विवेचन।
समीक्षाभली भांति विविचन। व्यक्ति की आलोचना हो सकती है, विवेचन नहीं।
उत्साहरुचि पूर्वक कार्य करना।
साहसकठिनाई में भी कार्य करने की इच्छा।
कार्यकाम
कर्तव्यफर्ज
स्वतंत्रकिसी दूसरे का आश्रय स्वीकार न हो, स्वाधीन होना
स्वच्छन्दमनमाना आचरण करने वाला
संविदाकिसी शर्त के आधार पर किया गया समझौता
करारदूसरे द्वारा किसी प्रस्ताव को स्वीकार कर लेना।
कष्टकठिनाई, दुख
व्यथाशरीर के किसी अंग में होने वाली तकलीफ
करुणादुखी को देखकर हृदय का द्रवीभूत हो जाना।
कृपाकिसी की सहायता करने की सामान्य इच्छा।
दयादुसरों के दुखों को दूर करने हेतु उद्यत होना
खेदगलती करने के बाद दुःख प्रकट करना
शोककिसी की मृत्यु पर दुखी होना
उम्रकिसी विशेष समय की अवस्था
आयुजन्म से मृत्यु तक का पूरा समय
अवस्थाजीवन का बीता हुआ भाग
क्षुद्रनगण्य, मामूली
तुच्छमहत्वहीन, उपेक्षणीय
लोभअधिक से अधिक पाने की इच्छा
लालसाकिसी वस्तु को पाने की इच्छा
तृष्णाकभी पूरा न होने वाला लोभ
परिणयविवाह
प्रणयपति और पत्नी का प्रेम
नमस्कारबराबर वालों से किया गया अभिवादन शब्द
प्रणामबड़ों के प्रति आदर व्यक्त करना
सन्तोषजितना मिले उसी में खुश रहना
तृप्तिइच्छा का समाप्त होना
पर्यटनकिसी विशेष उद्देश्य से घूमने जाना
भ्रमणसैर सपाटा करना, घूमना
कुसुमगंध वाला फूल
पुष्पगंध का होना आवश्यक नहीं
ज्ञानकिसी विषय अथवा वस्तु की जानकारी
विवेकअच्छे या बुरे की पहचान
निद्रासोना
तंद्राऊँघना

सामान्य हिन्दी – General Hindi

सामान्य हिन्दी – General Hindi

हिन्दी भाषा –

भाषा का अर्थ – मनुष्य की सार्थक व्यक्त्त वाणी को सामान्यतः भाषा कहा जाता है। भाषा शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के ‘भाष्’ धातु से हुई है। जिसका अर्थ ‘वाणी को व्यक्त करना’ होता है। इसके माध्यम से व्यक्ति के भावों, विचारों व भावनाओं की अभिव्यक्ति होती है। सार्थक शब्दों के समूह या संकेत को भाषा कहते हैं। यह संकेत स्पष्ट होना चाहिए। भाषा मनुष्य के जटिल मनोभावों को व्यक्त करती है। लेकिन सिर्फ संकेतों को ही भाषा नहीं कहा जा सकता। क्योंकि संकेतों को सभी नहीं समझ पाते। संकेतों के अर्थ क्षेत्रीयता के आधार पर भी बदलते रहते हैं। निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि भाषा को सार्थक व स्पष्ट होना चाहिए।

भाषा की परिभाषा –

बहुत से भाषाविदों ने भाषा की अपनी-अपनी परिभाषाएं दी हैं। परंतु उन सभी परिभाषाओं में कोई न कोई त्रुटि रह जाती है। वैसे भाषा की कोई सटीक परिभाषा देना साधारण कार्य नहीं है। आचार्य देवेंद्रनाथ शर्मा के अनुसार ‘उच्चरित ध्वनि संकेतों की सहायता से भाव या विचार की पूर्ण अथवा जिसकी सहायता से मनुष्य परस्पर विचार विनिमय या सहयोग करते हैं, उस यादृच्छिक, रुढ़ ध्वनि संकेत की प्रणाली को भाषा कहते हैं।’ भाषा की परिभाषा के लिए ये तीन बिन्दु ही विचारणीय हैं। पहला भाषा ध्वनि संकेत है। दूसरा यह यादृच्छिक है। तीसरा यह रूढ़ है।

भाषा की प्रकृति –

इसके अपने गुण अथवा स्वभाव को भाषा की प्रकृति कहते हैं। यह सागर की तरह अनवरत है। जो सदियों से बहती व चलती आ रही है। हर भाषा के अपने गुण, आंतरिक प्रकृति व अवगुण होते हैं। भाषा एक सामाजिक शक्ति है जो सिर्फ मनुष्यों को ही प्राप्त होती है। मनुष्य भाषा को अपने पूर्वजों से सीखता है। वह इसका विकास भी करता है। भाषा परम्परागत व अर्जित दोनो ही है। भाषा के दो रूप (कथिक व लिखित) हैं। देश-काल परिस्थितियों के अनुसार भाषा कई रूप में विभक्त है। इसी कारण संसार में अनेक भाषाएं प्रचलित हैं।

भाषा की उत्पत्ति –

भाषा वाक्यों से बनती है। वाक्य शब्दों से और शब्द ध्वनियों से बनते हैं। इस प्रकार ध्वनि, शब्द, वाक्य ही भाषा के मूल अंग हैं। व्याकरण में इन्हीं के अंग व प्रत्यंगों का विवेचन व अध्ययन किया जाता है।

भाषा के विविध रूप –

दुनिया भर में भाषा के तीन रूप देखने को मिलते हैं। ये हैं बोलियां, परिनिष्ठ भाषा, राष्ट्रभाषा। भाषा के जिस रूप का प्रयोग साधारण जनता अपने समूहों व घरों में करती है, बोली कहलाती है। किसी भी देश में अनेक बोलियां प्रचलित होती हैं, जो कि क्षेत्रीयता की प्रतीक हैं। भारत जैसे विस्तृत देश में 600 से अधिक बोलियां प्रचलन में हैं। जैसे – भोजपुरी, अवधी, कन्नौजी, बुंदेली, बघेली, हरयाणवी, राजस्थानी, ब्रजभाषा, मगही इत्यादि।

परिनिष्ठित भाषा –

यह व्याकरण से नियंत्रित होती है। जब किसी बोली को व्याकरण से परिष्कृत किया जाता है, तो वह परिनिष्ठ भाषा बन जाती है। इसका प्रयोग शिक्षा, शासन व साहित्य में किया जाता है। खड़ीबोली पहले बोली थी, आज परिनिष्ठ भाषा है। जब भाषा व्यापक शक्ति ग्रहण कर लेती है, तब आगे चलकर राजनीतिक व सामाजिक शक्ति के साथ राजभाषा या राष्ट्रभाषा का स्थान लेती है।

हिन्दी भाषा की उत्पत्ति –

इसकी उत्पत्ति भारत की प्राचीनतम भाषा संस्कृत से हुई है। संस्कृत का प्राचीनतम रूप ऋग्वेद में मिलता है। संस्कृत 3500 साल पुरानी भाषा है। इसकी उत्पत्ति 1500 ई. पू. आर्यों द्वारा की गई थी। संस्कृत से हिन्दी का विकास क्रम इस प्रकार है – वैदिक संस्कृत – लौकिक संस्कृत – पालि – प्राकृत – अपभ्रंष – अवहट्ट – पुरानी हिन्दी, हिन्दी।

‘पालि’ भारत की पहली देशभाषा है। इसे सबसे पुरानी प्राकृत भी कहा जाता है। भगवान बुद्ध ने इसी भाषा में जनसाधारण को उपदेश दिए। सिंहल (श्रीलंका) के लोग पालि को मागधी कहते हैं। क्योंकि पालि की सृष्टि मगध में हुई। इसमें तद्भव शब्दों का प्रयोग अधिक हुआ है। इसके बाद प्राकृत उत्तर भारत में पहली सदी से 5वीं सदी के अंत तक व्यावहारिक रही। भाषाविदों ने प्राकृत के 5 प्रमुख भेद स्वीकार किये हैं – शौरसेनी, अर्द्धमागधी, मागधी, पैशाची, महाराष्ट्री। मध्यदेश पहले संस्कृत का केंद्र था जो बाद में हिन्दी का प्रमुख गढ़ बन गया। महाराष्ट्री प्राकृत से मराठी का विकास हुआ। इसके बाद 500 ई. से 1000 ई. तक के काल को अपभ्रंश काल कहा जाता है। इसमें वे ही ध्वनियां थी, जो प्राकृत में थीं। इस समय भाषा अधिक सरल हो गई। जहाँ संस्कृत, पालि, प्राकृत संयोगात्मक थीं। वहीं अपभ्रंश वियोगात्मक हो गई। हिन्दी, बंग्ला, उर्दू, पंजाबी, गुजराती, मराठी इत्यादि भाषाओं की उत्पत्ति इसी से हुई। उत्तर भारत में अपभ्रंश के सात भेद(रूप) प्रचलित थे, जिसने आधुनिक भाषाओं को जन्म दिया।

  • अपभ्रंश – आधुनिक भारतीय भाषाएं
  • शौरसेनी अपभ्रंश – राजस्थानी, पश्चिमी हिन्दी, खड़ीबोली, ब्रजभाषा
  • मागधी अपभ्रंश – बंगाली, बिहारी, असमिया, उड़िया
  • अर्द्ध मागधी – अवधी, बघेली, पूर्वी हिन्दी, छत्तीसगढ़ी
  • पैशाची अपभ्रंश – पंजाबी, लहँदा
  • महाराष्ट्री अपभ्रंश – मराठी
  • खस अपभ्रंश – कुमायूंनी, गढ़वाली, पहाड़ी
  • ब्राचड अपभ्रंश – सिन्धी

1100 ई. के आसपास अपभ्रंश का काल समाप्त हो गया। इसके बाद आधुनिक भाषाओं का समय आ गया। 14वीं शताब्दी से आधुनिक भाषाओं का समय स्पष्ट रूप से सामने आ गया।

हिन्दी का संक्षिप्त परिचय –

हिन्दी, हिन्दू, हिन्दुस्तान – ये शब्द संस्कृत के न होकर फारसी के हैं।

हिन्दी भाषा का जन्म तो उत्तर भारत में हुआ। परंतु उसका नामकरण ईरानियों व भारतीय मुसलमानों ने किया। वस्तुतः हिन्दी किसी धर्म/सम्प्रदाय की भाषा न होकर जनसामान्य की भाषा है। इस पर सबका अधिकार है। ईरानियों के प्राचीनतम धार्मिक ग्रंथ ‘अवेस्ता’ में हिन्दी, हिन्दू आदि शब्द मिलते हैं। प्रारंभ में हिन्दी शब्द से देश का बोध होता था। मध्यकालीन फारसी व अऱबी साहित्य में ‘जबान-ए-हिन्दी’ शब्द का प्रयोग मिलता है। 16वीं और 17वीं सदी के दक्षिण के मुस्लिम कवियों (दक्खिनी हिन्दी के कवि) ने भी हिन्दी शब्द का व्यापक प्रयोग किया। वर्तमान में हिन्दी के क्षेत्र को दो भागों (पूर्वी हिन्दी व पश्चिमी हिन्दी) में बांटा गया है।

हिन्दी का क्षेत्र –

विश्व में बोली जाने वाली भाषाओं में हिन्दीभाषियों की संख्या तीसरे स्थान पर है। भारत के बाहर श्रीलंका, बर्मा, मॉरिशस, ट्रिनिडाड, फिजी, मलाया, सूरीनाम, पूर्वी अफ्रीका आदि में भी हिन्दी बोली जाती है।

हिन्दी की विभक्तियां –

हिन्दी में कुल आठ विभक्तियां है। जो कि इस प्रकार हैं – ने, को, से, के, का, में, पर, के लिए। हिन्दी में विभक्तियों का प्रयोग क्रिया की सरलता, स्पष्टता, सुनिष्चय के लिए किया जाता है। हिन्दी ने संस्कृत व्याकरण को सरल बनाया है।

हिन्दी के सर्वनाम –

मैं, मुझे, तुम, तू, तुम्हारा, ये, वह, कोई, कौन, कहाँ इत्यादि हिन्दी के सर्वनाम हैं। इन पर प्राकृत व अपभ्रंशों का प्रभाव है। क्योंकि ये वहीं से विखण्डित होकर बने हैं। हिन्दी में स्त्रीलिंग व पुल्लिंग के आधार पर सर्वनाम का स्वरूप नहीं बदलता।

हिन्दी के अव्यय –

हिन्दी के कुछ अव्यय संस्कृत से आए हैं तो कुछ अपने हैं। जब-तब, जहाँ-तहाँ, इधर-उधर हिन्दी के अपने अव्यय हैं। इनके स्थान पर संस्कृत के अव्यय यदा-कदा, यत्र-तत्र, इतस्ततः हिन्दी में कम ही प्रयोग होते हैं।

ध्वनि और वर्ण –

ये शब्दों की आधारशिला हैं। इसके बिना शब्द की कल्पना नहीं की जा सकती। ध्वनि के लिखित रूप को वर्ण कहते हैं। वर्ण को ध्वनिचिह्न भी कहते हैं। ध्वनि बोलने व सुनने में आती है और वर्ण लिखने व देखने में आते हैं।

वह मूल ध्वनि जिसके खण्ड न किये जा सकें, वर्ण कहलाती हैं। जैसे – अ, ई, क, ग, र, प व, च, ल, न, म इत्यादि। रानी शब्द की दो ध्वनियां हैं ‘रा’ और ‘नी’। इनके भी चार खण्ड हैं – र् + आ, न् + ई। इससे अधिक इनके टुकड़े नहीं किये जा सकते। इसलिए इन्हें ही मूल ध्वनियां या वर्ण या अक्षर कहते हैं। संक्षेप में कहा जाए तो वर्ण वह छोटी से छोटी ध्वनि है जिसके टुकड़े नहीं किये जा सकते।

इन्हीं इकाइयों को मिलाकर शब्दसमूह और वाक्यों की रचना होती है। वर्ण और उच्चारण को एक दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता।

वर्णमाला –

सभी वर्णों के व्यवस्थित क्रम को संयुक्त रूप से वर्णमाला कहा जाता है। मूलतः हिन्दी वर्णमाला में 52 वर्ण हैं। ये स्वर और व्यंजनों के दो भाग से मिलकर बनी है। स्वरों की संख्या 11 और व्यंजनों की संख्या 41 है।

स्वर –

वे वर्ण जिनका उच्चारण बिना अवरोध के होता है, वर्ण कहलाते हैं। इनके उच्चारण में भीतर से निकलती वायु मुख से निर्बाध रूप से निकलती है। इनके उच्चारण में कंठ व तालु का प्रयोग होता है, जीभ और होंठ का नहीं। इनके उच्चारण में किसी दूसरे वर्ण की सहायता की आवश्यकता नहीं पड़ती। ये स्वतंत्र हैं। हिन्दी वर्णमाला में स्वरों की संख्या 11 है जिनका वर्गीकरण तीन भागों में किया गया है –

  • हृस्व स्वर – अ, इ, उ, ऋ।
  • दीर्घ स्वर – आ, ई, ऊ।
  • संयुक्त स्वर – ए, ऐ, ओ, औ।

मात्रा –

जब स्वरों का प्रयोग व्यंजन के साथ में होता है तो स्वरों का स्वरूप बदल जाता है। स्वरों के बदले हुए इसी स्वरूप को मात्रा कहते हैं। मात्राएं तीन प्रकार की हैं हृस्व, दीर्घ, प्लुत। दीर्घ में हृस्व से दोगुना और प्लुत में तीन गुना समय लगता है। प्लुत का प्रयोग संस्कृत में होता है हिन्दी में नहीं। मात्राएं स्वरों से ही बनती हैं, व्यंजनों से नहीं। व्यंजनों को स्वरों के सहारे ही बोला जाता है। छन्दशास्त्र में हृस्व मात्रा को लघु और दीर्घ मात्रा को गुरु कहा जाता है। हृस्व स्वर मूल या एकमात्रिक कहलाते हैं। इनकी उत्पत्ति दूसरे स्वरों से नहीं होती। जैसे – अ, इ, उ, ऋ। दीर्घ स्वर किसी मूल (हृस्व) स्वर को उसी स्वर के साथ मिलाने से जो स्वर बनता ही उसे दीर्घ स्वर कहा जाता है। जैसे आ(अ+अ), ई(इ+इ), ऊ(उ+उ), ए(अ+इ), ऐ(अ+ए), ओ (अ+उ), औ (अ+ओ)। इनके उच्चारण में दो मात्राओं का समय लगता है। इन्हें द्विमात्रिक स्वर कहते हैं। प्लुत स्वर के उच्चारण में तीन गुना समय लगता है। इसके लिए 3 का अंक लगाया जाता है। जैसे ओ3म्। इसे त्रिमात्रिक स्वर भी कहते हैं। हिन्दी में साधारणतः प्लुत का प्रयोग नहीं होता।

अनुनासिक, निरनुनासिक –

वे स्वर जिनका उच्चारण नाक व मुँह से होता है और उच्चारण में लघुता रहती है, अनुनासिक कहलाते हैं। जैसे – आँख, आँगन, आँवला, दाँत, आंगन। केवल मुँह से बोले जाने वाले स्वर वर्णों को निरनुनासिक कहा जाता है।

अनुस्वार और विसर्ग –

ये न तो स्वर हैं और न ही व्यंजन, किंतु ये स्वरों के सहारे चलते हैं। इनका प्रयोग स्वर व व्यंजन दोनों में किया जाता है। इसीलिए इन दोनों ध्वनियों को ‘अयोगवाह’ की संज्ञा दी गई है। अयोगवाह से तात्पर्य ‘योग न होने पर भी जो साथ रहे’।

अनुस्वार –

ये स्वर के बाद आने वाले व्यंजन हैं। जिसकी ध्वनि नाक से निकलती है।

विसर्ग –

ये भी स्वर के बाद आने वाले व्यंजन हैं। इसका उच्चारण ‘ह’ की तरह होता है। इसका प्रयोग संस्कृत में खूब होता है। हिन्दी में आज-कल इसका अभाव देखने को मिलता है। परंतु तत्सम शब्दों में यह प्रचलन में है। जैसे मनःकामना, प्रातःकाल, अतः, दुःख, स्वतः इत्यादि।

व्यंजन –

हिन्दी वर्णमाला के वे वर्ण जिनका उच्चारण स्वतंत्र रूप से नहीं किया जा सकता। इनका उच्चारण स्वरों की सहायता से किया जाता है। व्यंजनों के उच्चारण में भीतर से आती वायु मुख में कहीं न कहीं बाधित होती है। अर्थात स्वरों की भांति इनका उच्चारण अबाध (बाधारहित) नहीं होता। हिन्दी वर्णमाला में स्पर्श व्यंजन, अन्तःस्थ व्यंजन, ऊष्म व्यंजन, संयुक्त व्यंजन, द्विगुण व्यंजन होते हैं।

स्पर्श व्यंजन –

इनका उच्चारण कण्ठ, तालु, मूर्द्धा, दन्त, ओष्ठ से होता है। इसीलिए इन्हें स्पर्श व्यंजन कहा जाता है। इन्हें वर्गीय व्यंजन भी कहा जाता है। इन्हें 5 वर्गों में विभक्त किया गया है। इन्हें उच्चारण स्थान के आधार पर अलग-अलग वर्गों में रखा गया है।

  • क वर्ग (कण्ठ से) – क, ख, ग, घ, ङ
  • च वर्ग (तालु से) – च, छ, ज, झ, ञ
  • ट वर्ग (मूर्द्धा से) – ट, ठ, ड, ढ, ण
  • त वर्ग (दन्त से) – त, थ, द, ध, न
  • प वर्ग (ओष्ठ से) – प, फ, ब, भ, म

अन्तःस्थ व्यंजन –

इनकी संख्या चार है – य, र, ल, व। इनका उच्चारण जीभ, तालु, दाँत, ओठों के परस्पर सटने से होता है। परंतु कहीं भी पूर्ण स्पर्श नहीं होता। अतः ये चारो अन्तःस्थ व्यंजन अर्द्धस्वर कहलाते हैं।

ऊष्म व्यंजन –

इनका उच्चारण एक प्रकार की रगड़ (घर्षण) से उत्पन्न ऊष्म वायु से होता है। हिन्दी वर्णमाला में इनकी संख्या चार है – श, ष, स, ह।

अल्पप्राण और महाप्राण व्यंजन –

उच्चारण में वायु प्रक्षेप की दृष्टि से व्यंजनों का ये भेद किया गया है। जिसके उच्चारण में वायु पूर्व से उल्प मात्रा में निकले उसे अल्पप्राण व्यंजन कहते हैं। प्रत्येक वर्ग का पहला, तीसरा, पांचवां वर्ण अल्पप्राण व्यंजन होता है। अन्तःस्थ व्यंजन भी अल्पप्राण व्यंजन हैं।

महाप्राण व्यंजन के उच्चारण में श्वांस अधिक मात्रा में निकलती है। इसमें ‘हकार’ जैसी ध्वनि का विशेष महत्व है। प्रत्येक वर्ग का दूसरा व चौथा वर्ण और ऊष्म वर्ण महाप्राण की श्रेणी में आते हैं।

अघोष वर्ण – स्पर्श व्यंजनों के प्रत्येक वर्ण का पहला व दूसरा वर्ण और श, ष, स।

घोष वर्ण – प्रत्येक वर्ग का तीसरा, चौथा, पाँचवां वर्ण, य, र, ल, व, ह और सारे स्वर घोष वर्णों की श्रेणी में आते हैं।

हिन्दी के नए वर्ण –

हिन्दी वर्णमाला में पाँच नए व्यंजनों (क्ष, त्र, ज्ञ, ड़, ढ़) को जोड़ा गया है। इनमें क्ष (क्+ष), त्र (त्+र), ज्ञ (ज्+ञ) संयुक्त व्यंजन हैं। इन तीनों के खण्ड किये जा सकते हैं। अतः इनकी गिनती स्वतंत्र वर्णों में नहीं की जाती। ड और ढ के नीचे बिन्दु लगाकर दो नए वर्णों को वर्णमाला में जोड़ा गया है। ये द्विगुण व्यंजन कहलाते हैं।

पंचमाक्षर –

हिन्दी वर्णमाला में अनुनासिक वर्णों की संख्या पाँच – ङ,ञ,ण,न,म है। अपने वर्गों में स्थिति के आधार पर इन्हें पंचमाक्षर कहा जाता है।

उच्चारण स्थान के आधार पर वर्ण –

स्वर हो या व्यंजन सभी वर्ण मुँह के भिन्न-भिन्न भागों से बोले जाते हैं। मुख के 6 भाग हैं – कण्ठ, तालु, मूर्द्धा, दाँत, ओठ, नाक। हिन्दी के सभी वर्णों का उच्चारण इन्ही के माध्यम से होता है।

कण्ठव्य –

कण्ठ व निचली जीभ के स्पर्श से बोले जाते हैं। उदाहरण – अ, आ, क, ख, ग, घ, ङ, ह, विसर्ग।

तालव्य –

तालु व जीभ के स्पर्श से बोले जाते हैं। उदाहरण – इ, ई, च, छ, ज, झ, ञ, य, श।

मूर्द्धन्य –

मूर्द्धा व जीभ के स्पर्श से बोले जाते हैं। उदाहरण – ऋ, ट, ठ, ड, ढ, ण, र, ष।

दन्त्य –

दाँत व जीभ के स्पर्श से बोले जाते हैं। त, थ, द, ध, न, ल, स।

ओष्ठ्य –

दोनो ओठों के स्पर्श से बाले जाते हैं। उ, ऊ, प, फ, ब, भ, म।

कण्ठतालव्य –

कण्ठ व तालु में जीभ के स्पर्श से बोले जाते हैं। उदाहरण – ए, ऐ।

कण्ठोष्ठ्य –

कण्ठ द्वारा जीभ और ओठों के कुछ स्पर्श से बोले जाते हैं। उदाहरण ओ, औ।

दन्तोष्ठ्य –

दाँत से जीभ और होठों के कुछ योग से बोले जाते हैं। उदाहरण – व।

बलाघात (स्वराघात) –

शब्द बोलते वक्त उच्चारण की स्पष्टता के लिए जब किसी अक्षर पर विशेष बल दिया जाता है, तब इसे बलाघात या स्वराघात कहा जाता है। इस क्रिया में सामान्यतः यह बल किसी शब्द के पहले अक्षर पर लगाया जाता है।

सन्धि विच्छेद –

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दो वर्णों के मेल के फलस्वरूप होने वाले विकार को सन्धि कहते हैं। सन्धि संस्कृत का शब्द है। जब दो शब्द या पद पास होते हैं तो उच्चारण की सुलभता हेतु पहले शब्द के अन्तिम वर्ण और दूसरे शब्द के पहले वर्ण को मिलाकर एक कर दिया जाता है। दो वर्णों के मिलने से उत्पन्न इसी विकार को संधि कहा जाता है। इसे मेल को विखण्डित कर शब्दों को अलग-अलग कर देना सन्धि-विच्छेद कहलाता है। वर्णों के आधार पर सन्धि के तीन भेद हैं – स्वर सन्धि, व्यंजन सन्धि, विसर्ग सन्धि। स्वर सन्धि में दीर्घ सन्धि, गुण सन्धि, वृद्धि सन्धि, यण सन्धि, अयादि सन्धि आती हैं।

शुद्ध अशुद्ध वर्तनी –

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लेखन कला संबंधी नियमों को संयुक्त रूप से वर्तनी कहा जाता है। इसे हिज्जे भी कहा जाता है। केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय की वर्तनी समिति ने 1962 ई. में उपयोगी व सर्वमान्य निर्णय किये। तत्सम शब्दों में ‘ण’ का प्रयोग होता है, उनके तद्भव शब्दों में ण के स्थान पर ‘न’ आ जाता है। जैसे रण-रन, प्राण-प्रान, फण-फन, विष्णु-विष्नु इत्यादि। खड़ीबोली में बहुत से शब्दों में ‘ण’ के स्थान पर ‘न’ का प्रयोग होता है। लेकिन पंजाबी और राजस्थानी भाषा में ‘ण’ का ही प्रयोग होता है। लेकिन कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए। संस्कृत की जिन धातुओं में ण होता है। उनसे बने शब्दों में भी ण ही रहता है। ‘छ’ और ‘क्ष’ की अशुद्धियां – ‘छ’ एक स्वतंत्र व्यंजन है, वहीं ‘क्ष’ एक संयुक्त व्यंजन। ‘क्ष’ का अधिकतर प्रयोग संस्कृत में होता है। ‘ब’ और ‘व’ की अशुद्धियां – इस के संबंध में भी हिन्ही में बहुत सी अशुद्धियां होती हैं। परंतु इस संबंधी अशुद्धियों का अधिकांश कारण उच्चारण में अशुद्धि है। ‘ब’ के उच्चारण में दोनों होठ जुड़ जाते हैं। वहीं ‘व’ के उच्चारण में निचला होठ उपर के दांतों से टकराता है। ‘व’ के उच्चारण में दोनो होठ नहीं मिलते। संस्कृत में जहाँ ‘व’ वाले शब्दों की अधिकता है। वहीं ठेठ हिन्दी में ‘ब’ वाले शब्दों की अधिकता है।

श, श, स की अशुद्धियां –

ये तीनों भिन्न अक्षर हैं और इन तीनों के उच्चारण भी अलग-अलग हैं। यहाँ भी उच्चारण में की गई अशुद्धि से ही लेखन में अशुद्धियां होती हैं।

वर्तनी मे अशुद्धियों के प्रकार –

  • वर्ण संबंधी अशुद्धियां
  • लिंग संबंधी अशुद्धियां
  • सन्धि संबंधी अशुद्धियां
  • प्रत्यय संबंधी अशुद्धियां
  • समास संबंधी अशुद्धियां
  • हलन्त संबंधी अशुद्धियां
  • अनुस्वार और चंद्रबिन्दु संबंधी अशुद्धियां

विराम चिह्न –

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संज्ञा – कार्य और भेद

वह विकारी शब्द जो किसी विशेष वस्तु, भाव औव जीव के नाम का बोध कराता हो, संज्ञा कहलाता है। यहाँ वस्तु शब्द का प्रयोग व्यापक अर्थ में हुआ है। जो केवल वाणी और पदार्थ का वाचक नहीं, वरन् उसके धर्मों का भी सूचक है। साधारण अर्थ में ‘वस्तु’ शब्द का प्रयोग इस अर्थ में नहीं किया जाता है। वस्तु के अंतर्गत प्राणी, पदार्थ व धर्म आते हैं। इन्हीं के आधार पर संज्ञा के भेद किये गए हैं।

संज्ञा के भेद –

वस्तु व धर्म की दृष्टि से सामान्यतः संज्ञा के पांच भेद – जातिवाचक, व्यक्तिवाचक, भाववाचक, गुणवाचक, द्रव्यवाचक संज्ञा हैं। धर्म की दृष्टि से भाववाचक संज्ञा। वस्तु की दृष्टि से जातिवाचक, व्यक्तिवाचक, समूहवाचक, द्रव्यवाचक संज्ञाएं हैं।

व्यक्तिवाचक संज्ञा –

वह शब्द जिससे किसी एक वस्तु या व्यक्ति का बोध होता हो, उसे व्यक्तिवाचक संज्ञा कहते हैं। जैसे – किसी का नाम। उदाहरण – राम, श्याम, गंगा, यमुना, भारत, अमेरिका, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पाकिस्तान, नेपाल, भारतीय, पाकिस्तानी, अमेरिकी, नेपाली, प्रशांत महासागर, हिमालय, दिल्ली, ऋग्वेद, रामायण, महाभारत, जनवरी, फरवरी, मार्च, होली, दीपावली, रक्षाबंधन, दशहरा इत्यादि।

जातिवाचक संज्ञा –

वे संज्ञाएं जिनसे एक ही प्रकार की वस्तुओं अथवा व्यक्तियों का बोध होता हो, उन्हें जातिवाचक संज्ञाएं कहते हैं। जैसे – मनुष्य, पशु, घर, नदी, पहाड़, पवन, बहन, मंत्री, मछुआरा, अध्यापक, बिजली, तूफान, वर्षा, ज्वालामुखी, भूकंप, गाय, भैंस, कुत्ता, बकरी, घोड़ा, शेर, मकान, कुर्सी, मेज, पुस्तक, कलम, डब्बा, पक्षी इत्यादि।

समूहवाचक संज्ञा –

वह संज्ञा जिससे वस्तु या व्यक्ति के समूह का बोध होता हो, समूहवाचक संज्ञा कहलाती है। उदाहरण – सभा, दल, गिरोह, गुच्छा, कुंज, मण्डल इत्यादि।

द्रव्यवाचक संज्ञा –

जिस संज्ञा से नापतौल वाली वस्तु का बोध हो, उसे द्रव्यवाचक संज्ञा कहा जाता है। द्रव्यवाचक संज्ञा का सामान्यतः बहुवचन नहीं होता। उदाहरण – लोहा, ताँबा, सोना, चाँदी, दूध, पानी, तेल इत्यादि।

भाववाचक संज्ञा –

वह शब्द जिससे किसी व्यक्ति या वस्तु के गुण, धर्म, दशा या परिस्थिति का बोध होता हो, भाववाचक संज्ञा कहलाती है। उदाहरण – प्रेम, दर्द, उदासी, हंसी, लम्बाई, ऊँचाई, मोटाई, जवानी, बुढ़ापा, मिठास, तीखा, खट्टा इत्यादि। हर पदार्थ के गुण, धर्म होते है जिसे पदार्थ से अलग नहीं कर सकते हैं। इस संज्ञा का अनुभव इंद्रियों के माध्यम से किया जाता है। प्रायः इनका बहुवचन नहीं होता। भाववाचक संज्ञाओं का निर्माण जातिवाचक संज्ञा, सर्वनाम, क्रिया, विशेषण, व अव्यय में प्रत्यय लगाकर होता है।

संज्ञाओं का प्रयोग –

कभी-कभी जातिवाचक संज्ञाओं का प्रयोग व्यक्तिवाचक संज्ञा में किया जाता है। जैसे पुरी का जगन्नाथपुरी से, देवी का दुर्गा से, संवत् का विक्रम संवत से, गोस्वामी का तुलसीदास से, दाऊ का कृष्ण के बड़े भाई बलदेव से। बहुत सी योगरूढ़ संज्ञाएं जातिवाचक होते हुए भी व्यक्तिवाचक के अर्थ में प्रयोग में आती हैं। जैसे – गणेश, हनुमान, पीताम्बर, गोपाल, हिमालय।

कभी-कभी व्यक्तिवाचक संज्ञाओं का प्रयोग जातिवाचक संज्ञा के रूप में किया जाता है।

कभी-कभी भाववाचक संज्ञा का प्रयोग जातिवाचक संज्ञा के रूप में किया जाता है।

संज्ञा के रूपांतर –

संज्ञा विकारी शब्द है। संज्ञा के रूप लिंग, वचन, कारक चिह्नो के आधार पर बदल जाते हैं। लिंग के अनुसार नर का नारी, लड़का का लड़की, पुरुष का स्त्री हो जाता है। वचन के आधार पर लड़का का लड़के, लड़की का लड़कियाँ, कौवा का कौवे हो जाता है।

लिंग –

शब्द की जाति को लिंग कहते हैं। संज्ञा का वह रूप जिससे व्यक्ति अथवा वस्तु के नर या मादा होने का बोध होता है, उसे व्याकरण में लिंग कहा जाता है। ‘लिंग’ संस्कृत भाषा का शब्द है। इसका अर्थ होता है चिह्न या निशान, जो कि किसी संज्ञा का ही होता है। संस्कृत में लिंग के तीन भेद हैं – पुल्लिंग, स्त्रीलिंग, नपुंसकलिंग। वहीं हिन्दी में सिर्फ दो ही लिंग (पुल्लिंग, स्त्रीलिंग) होते हैं, इसमें नपुंसक लिंग नहीं होता। हिन्दी में लिंग की अभिव्यक्ति वाक्यों में होती है।

संस्कृत के पुल्लिंग शब्द –

पालन, पोषण, शस्त्र, चित्र, क्षेत्र, नेत्र, पात्र, चरित्र, दमन, वचन, गमन, नयन, हरण, जलज, स्वेदज, पिण्डज, सरोज, सतीत्व, बहूत्व, कृत्य, नृत्य, गौरव, लाघव, माधुर्य, संसार, विस्तार, विकार, उपाय, अध्याय, समुदाय, मोह, दोष, स्पर्श, चरित, गणित, फलित, गीत, मत, स्वागत, विकास, उल्लास, पाक, क्रोध।

संस्कृत के स्त्रीलिंग शब्द –

दया, कृपा, माया, क्षमा, शोभा, लज्जा, प्रार्थना, वेदना, रचना, घटना, प्रस्तावना, रेणु, वायु, आयु, जानु, रज्जु, धातु, मृत्यु, वस्तु, ऋतु, तालु, मधु, अश्रु, हेतु, सेतु, मेरु, रीति, गति, महिमा, गरिमा, कलिमा, लालिमा, मति, हानि, ग्लानि, रिद्धि, सिद्धि, बुद्धि, हानि, प्रभुता, नम्रता, सुन्दरता, लघुता, जड़ता, निधि, विधि, परिधि, रुचि, अग्नि, छवि, राशि, पाणि, अद्रि, आदि, बलि, जलधि, वारि।

तत्सम पुल्लिंग शब्द –

चित्र, पत्र, धर्म, वित्त, पात्र, आक्रमण, मित्र, गोत्र, व्याख्यान, दमन, गमन, गगन, श्रवण, लालन, पालन, पोषण, शोषण, जलज, मलयज, सतीत्व, उरोज, स्त्रीत्व, आक्रमण, कृत्य, कार्य, वीर्य, माधुर्य, विराम, पक्ष, वनिमय, विसर्जन, आवास, विधेयक, दोष, धन, पृष्ठ, नियम, स्वाध्याय, उपहार, विस्तार, प्रसार, अध्याय, विवाह, सार, उपादान, प्रचार, प्रतिवेदन, विहार, प्रकार, लोक, प्रहार, कर्म, सुख, अवमान, अनुमान, आकलन, आभार, विघटन, वाद, दुख, शंख, ग्रंथ, पर्यवेक्षण, नख, श्रम, स्वर्ग, दातव्य, विक्रम, मुख, शिख, परिवहन, क्रोध, बोध, छात्रावास, समाज, स्वास्थ्य, मोद, लोभ, ह्रास, मास, तुषार, प्रश्न, उत्तर, तुहिन, नृत्य, आश्चर्य, निगम, उत्पादन, न्याय, काष्ठ, संघ, छत्र, सौभाग्य, कष्ट, विधान, प्रहर, मेघ, अंकन, अंजन, अंकुश, अन्तर्धान, अंचल, अकाल, अक्षर, उपकरण, अंश, बहुमत, अम्बुज, अपराध, निमंत्रण, नियंत्रण, आमंत्रण, कवच, कल्याण, सार, साधन, तत्व, निर्माण, दण्ड, काव्य, परिहार, कलश, प्रवेश, अनुच्छेद, शिविर, संकल्प, गण, गज, कायाकल्प, ग्राम, चन्द्र, गृह, न्याय, प्रभाव, क्षण, प्रशिक्षण, चन्दन, सरोवर, छन्द, अलंकार, परिमाण, संशोधन, संस्करण, प्रस्ताव, परिमार्जन, यवन, वचन, मर्म, सोमवार, मंगलवार, निबन्ध, नाटक, शनिवार, रूप, मार्ग, संदेश, राजयोग, रूपक, राष्ट्र, प्रांत, स्वदेश, सर्प, सागर, देश, नगर।

तत्सम स्त्रीलिंग शब्द –

प्रस्तावना, वेदना, मंत्रणा, केलि, इच्छा, अनुज्ञा, अवस्था, रेणु, शताब्दी, प्रार्थना, अग्नि, सभा, पूर्ति, सीमा, पूर्णिमा, शोभा, क्षमा, वस्तु, घटना, लज्जा, अभिव्यक्ति, लक्ष्मी, कृपा, संविदा, कौमुदी, गोष्ठी, दया, माया, विकृति, रज्जु, आराधना, जाति, निधि, सिद्धि, सूचना, मण्डली, योग्यता, परिस्थिति, रुचि, आयु, विमति, वृत्ति, कालिमा, गरिमा, महिमा, प्रतिकृति, जड़ता, कुण्डलिनी, मान्यता, सम्पदा, प्रभुता, सुंदरता, सेना, विज्ञप्ति, रचना, लालिमा, अभियुक्ति, उपासना, नारी, मृत्यु, ऋतु, आज्ञा, अनुभूति, भाषा, क्षति, चित्तवृत्ति, नियुक्ति, वायु, समिति, अक्षमता, ईर्ष्या, प्रतिभूति, आशा, निराषा, अभिलाषा, काया, कला, अरुणिमा, याचना, संहिता, कुण्डली, निवृत्ति, नागरिकता, रक्षा, चपला, व्याख्या, गणना, अनुज्ञप्ति, घोषणा, आजीविका, नगरपालिका, धात्री, गवेषणा, नदी, इच्छा, सहायता, संस्था, शिक्षा, स्थापना, अनुमति, सेवा, उपलब्धि, विधि, रीति, शक्ति, कृति, प्रतिलिपि, युक्ति, हानि, स्थिति, विमति, आवृत्ति, श्री, शांति, सम्पत्ति, संधि, समिति, कटि, छवि, सुसंगति।

हिन्दी के उभयलिंग शब्द –

वे शब्द जो एक अर्थ में पुल्लिंग और दूसरे अर्थ में स्त्रीलिंग होते हैं। वे शब्द उभयलिंगी कहलाते हैं।

जैसे – शान्त, बाट, कल, टीका, पीठ, शाल, कोटि, विधि, यति, शान।

तद्भव पुल्लिंग शब्द –

गन्ना, कपड़ा, आटा, चमड़ा, पैसा, पहिया, आना, गाना, बुढ़ापा, बढ़ावा, बड़प्पन, बहाव, चढ़ाव, लगान, मिलान,  खान, पान, उठान।

तद्भव स्त्रीलिंग शब्द –

रोटी, टोपी, नदी, उदासी, चीख, चिट्ठी, खटिया, पुड़िया, डिबिया, पिढ़िया, ठलिया, गुड़िया, रात, लात, बात, ईख, भूख, छत, दारू, बालू, लू, झाड़ू, सरसों, सजावट, घबराहट, झंझट, आहट, चिकनाहट, राख, भौं, प्यास, मिठास, कोख, रास, बाँस, सांस, लूट, मार, दौड़, समझ, रगड़, चमक, छाप, पुकार।

पुल्लिंग उर्दू शब्द –

बाजार, इकरार, गुलाब, परदा, गुस्सा, तमगा, चश्मा, किस्सा, जुलाब, हिसाब, जवाब, कबाब, रास्ता, इश्तिहार, इम्तहान, अहसान, सामान, मकान, इनकार।

उर्दू स्त्रीलिंग शब्द –

राह, अदालत, इजाजत, सजा, सुलह, तामील, दगा, गरमी, तहसील, गरीबी, सरदी, बीमारी, चालाकी, कीमत, हवा, दवा, सुबह, तरह, तसवीर, मुलाकात, जागीर, तैयारी, नवाबी, लाश, दुनिया, कोशिश, तलाश, वारिश, मालिश, दौलत, आह, सलाह, कसरत।

वचन –

संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण और क्रिया के जिस रूप से संख्या का बोध हो, वचन कहलाते हैं। दूसरे शब्दों में शब्दों के संख्याबोधक विकारी रूप को वचन कहते हैं। हिन्दी में वचन दो प्रकार के होते हैं – एकवचन, बहुवचन। विकारी शब्द के जिस रूप से एक पदार्थ या व्यक्ति का बोध होता है, एकवचन कहलाता है। विकारी शब्द के जिस रूप से अधिक पदार्थों अथवा व्यक्तियों का बोध होता है, बहुवचन कहलाता है।

कारक –

संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप से वाक्य के अन्य शब्दों के साथ उनका संबंध सूचित होता है, कारक कहलाता है। अर्थात संज्ञा या सर्वनाम के आगे जब विभक्तियां (ने, को, से, का, की..) लगती हैं, तब उनका रूप ही कारक कहलाता है। तभी वे वाक्य के अन्य शब्दों व पदों से संबंध रखने योग्य होते हैं।

कारक के भेद –

हिन्दी में कारकों की संख्या 8 है। कारकों के बोध के लिए संज्ञा या सर्वनाम के आगे जो प्रत्यय(चिह्न) लगाए जाते हैं, उन्हें विभक्तियां कहा जाता है। कुछ इन्हें परसर्ग भी कहते हैं। विभक्ति से बने शब्दरूप को ‘विभक्त्यन्त शब्द’ या ‘पद’ कहा जाता है। हिन्दी कारकों के विभक्ति चिह्न निम्नलिखित हैं –

  • कर्त्ता – ने
  • कर्म – को
  • करण – से
  • सम्प्रदान – को, के लिए
  • अपादान – से
  • सम्बन्ध – का, की, के, रा, री, रे
  • अधिकरण – में, पर
  • सम्बोधन – हे, हो, अरे, अहो, अजी।

पद परिचय –

शब्दों को जब किसी वाक्य में पिरो दिया जाता है, तब वे ‘पद’ कहलाते हैं। वाक्य के अन्तर्गत जब शब्दों में विभक्तियां लगती हैं तो वे पद कहलाते हैं। पद अर्थ संकेतित करता है। शब्द सार्थक व निरर्थक दोनो हो सकते हैं। पदों के अन्वय अर्थात् विश्लेशष को पद परिचय कहा जाता है। हिन्दी व्याकरण में पद परिचय के अन्य नाम यथा पदान्वय, पदनिर्णय, पदनिर्देश, पदच्छेद, पद-विन्यास पाये जाते हैं। ये सभी पद-परिचय के ही पर्यायवाची शब्द हैं। वाक्य के प्रत्येक पद को पृथक-पृथक कर उसका स्वरूप व दूसरे पद से संबंध बताना पद-परिचय कहलाता है।

सर्वनाम –

संज्ञा के स्थान पर प्रयोग किये जाने वाले शब्दों यथा ये, वह, हम, तुम, मैं इत्यादि को सर्वनाम कहा जाता है। शाब्दिक अर्थ में सर्वनाम से आशय सर्व(सब) नामों (संज्ञाओं) के स्थान पर प्रयुक्त शब्दों को सर्वनाम कहा जाता है। संज्ञा से किसी एक ही वस्तु का बोध होता है, वहीं सर्वनाम से अनेक संबंधित वस्तुओं को बोध होता है। हिन्दी में कुल 11 सर्वनाम प्रचलित हैं – यह, वह, तू, आप, मैं, क्या, कौन, जो, सो, कुछ, कोई।

प्रयोग के आधार पर सर्वनाम के कुल 6 भेद हैं –

  1. निश्चयवाचक सर्वनाम
  2. अनिश्चयवाचक सर्वनाम
  3. प्रश्नवाचक सर्वनाम
  4. सम्बन्धवाचक सर्वनाम
  5. निजवाचक सर्वनाम
  6. पुरुषवाचक सर्वनाम (उत्तमपुरुष, मध्यमपुरुष, अन्यपुरुष)

निश्चयवाचक सर्वनाम –

इसमें वक्ता के पास या दूर की किसी वस्तु के निश्चय का बोध होता है। जैसे – यह, वह। पास की वस्तु के लिए ‘यह’ और दूर की वस्तु के लिए ‘वह’ का प्रयोग होता है।

अनिश्चयवाचक सर्वनाम –

इस सर्वनाम से किसी निश्चित वस्तु का बोध नहीं होता। जैसे – कोई, कुछ।

प्रश्नवाचक सर्वनाम –

इन सर्वनामों का प्रयोग प्रश्न पूँछने के लिए किया जाता है। जैसे – कौन, क्या।

सम्बन्धवाचक सर्वनाम –

जिस सर्वनाम से वाक्य के किसी दूसरे सर्वनाम से संबंध स्थापित होता है। उसे संबंधवाचक सर्वनाम कहा जाता है। वह कौन है ‘जो’ सबको प्रिय है। वो ‘जो’ न करे ‘सो’ अच्छा है।

निजवाचक सर्वनाम –

‘आप’ निजवाचक सर्वनाम का रूप है। लेकिन इसका प्रयोग पुरुषवाचक के अन्यरूप वाले ‘आप’ से सर्वथा भिन्न है। यह कर्त्ता का बोधक है, पर स्वयं कर्त्ता का काम नहीं करता। पुरुषवाचक ‘आप’ का प्रयोग आदर में किया जाता है।

पुरुषवाचक सर्वनाम –

पुरुषों (स्त्री या पुरुष) के नाम के बदले प्रयोग किये जाने वाले सर्वनामों को पुरुषवाचक सर्वनाम कहा जाता है। उत्तम पुरुष में कर्त्ता या लेखक आता है। मध्यमपुरुष में श्रोता या पाठक आता है। अन्यपुरुष में लेखक व श्रोता को छोड़कर अन्य लोग आते हैं।

पुरुषवाचक संज्ञा के तीन भेद हैं –

  • उत्तम पुरुष – मैं, हम।
  • मध्यमपुरुष – आप, तुम, तू।
  • अन्यपुरुष – यह, वह, ये, वे।

संयुक्त सर्वनाम –

हिन्दी व्याकरण के रूसी विद्वान डॉ. दीमशित्स ने एक और तरह के सर्वनाम का उल्लेख किया है। इसे संयुक्त सर्वनाम कहा गया। ये पृथक श्रेणी के सर्वनाम हैं। उदाहरण – सब कोई, हर कोई, सब कुछ, जो कुछ, कोई और, जो कोई, कोई भी, कुछ भी इत्यादि।

सर्वनाम के रूपांतरण –

  • मैं, मुझको, मुझसे, मेरा, मुझे
  • तुम, तुम्हें, तुम्हारा, तुम्हारी
  • हम, हमें, हमारा।
  • वह, उसने, उसे, उससे, उसको, उनको, उन्होंने, उसमें
  • यह, इसे, इसने, इसमें, इन्हें, इनको, इन्होंने, इनसे
  • कौन – किसने, किसे, किसको।

सर्वनाम और कारक –

कर्ता – मैं, मैंने, तू, तूने, वह, उसने, आपने, यह, इसने, कोई, किसने

कर्म – मुझे, मुझको, तुझे, तुझको, उसे उसको, आपको, इसे, इसको

करण – मुझसे, तुझसे, तेरे द्वारा, उससे, उसके द्वारा, आपसे, इससे, किसी से

सम्प्रदान – मुझे, मेरे लिए, तुझे, तुझको, तेरे लिए, उसे, उसको, उसके लिए, आपको, आपके लिए, इसे इसको, किसी को, किसी के लिए।

अपादान – मुझसे, तुझसे, उससे, आपसे, इससे, किसी से।

सम्बन्ध – मेरा, मेरी, मेरे, तेरी, तेरे, तेरा, उसका, उसके, उसकी, आपका, की, के, इसका, किसी का, किसी की, किसी के।

अधिकरण – मुझमें, मुझपर, तुझपर, तुझमें, उसपर, उसमें, पर, आपमें, इसपर, इसमें, किसी पर, किसी में।

सर्वनाम का पदपरिचय –

इसके अंतर्गत सर्वनाम, सर्वनाम का भेद, पुरुष, लिंग, वचन, कारक और अन्य पदों से उसका संबंध बताना पड़ता है।

विशेषण : कार्य व भेद

संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता बताने वाले शब्द को विशेषण कहा जाता है। जिसकी विशेषता बताई जाती है उसे विशेष्य कहते हैं। विशेषण एक ऐसा विकारी शब्द है जो हर हाल में संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता बताता है। संज्ञा जिस वस्तु का बोध कराती है, उसके आगे विशेषण लग जाने से उस वस्तु का दायरा सीमित हो जाता है। जैसे – ‘कुत्ता’ से आशय कु्त्ते की संपूर्ण जाति से है। लेकिन इससे पहले ‘काला’ लगा दिया जाए। तब ‘काला कुत्ता’ से तात्पर्य सिर्फ काले कुत्तों से होगा, न कि संपूर्ण कुत्ता जाति से।

विशेषण के भेद या वर्गीकरण –

गुणवाचक विशेषण – जिस शब्द से संज्ञा का गुण, दशा, स्वभाव आदि लक्षित हों, उसे गुणवाचक विशेषण कहा जाता है। इनकी संख्या विशेषणों में सर्वाधिक है। काल, स्थान, दशा, रंग, आकार, दृष्टव्य इसके कुछ मुख्य रूप हैं।

सार्वनामिक विशेषण –

पुरुषवाचक और निजवाचक सर्वनाम को छोड़कर अन्य सभी सर्वनाम इसी के अंतर्गत आते हैं। इसके अंतर्गत मौलिक सार्वनामिक विशेषण, और यौगिक सार्वनामिक विशेषण आते हैं।

संख्यावाचक विशेषण –

जिन शब्दों से संज्ञा या सर्वनाम की संख्या लक्षित हो, उसे ही संख्यावाचक विशेषण कहते हैं।

इसके अंतर्गत परिमाणबोधक, निश्चित संख्यावाचक, अनिश्चित संख्यावाचक विशेषण आते हैं। निश्चित संख्यावाचक विशेषण के अंतर्गत गणनावाचक, समुदायवाचक, आवृत्तिवाचक, क्रमवाचक, प्रत्येकबोधक विशेषण आते हैं। गणनावाचक विशेषण के अंतर्गत पूर्णांकबोधक और अपू्र्णांकबोधक विशेषण आते हैं।

प्रविशेषण –

हिन्दी में कुछ विशेषणों के भी विशेषण होते हैं। इन्हें ही प्रविशेषण कहा जाता है। जैसे – बहुत काला, बहुत तेज, बहुत शैतान, बड़ा साहसी, अत्यन्त बुद्धिमान आदि।

विशेष्य और विशेषण में संबंध –

वाक्यों में विशेषण का प्रयोग दो प्रकार से होता है। कहीं पर विशेषण विशेष्य से पहले प्रयुक्त होता है तो कहीं बाद में। प्रयोग की दृष्टि से विशेषण के दो भेद हैं पहला ‘विशेष्य-विशेषण’ और दूसरा ‘विधेय-विशेषण’। विशेष्य के पूर्व आने वाला विशेषण विशेष्य-विशेषण कहलाता है। विशेष्य व क्रिया के बीच आने वाले विशेषण को विधेय-विशेषण कहते हैं। विशेषण के लिंग, वचन आदि भी विशेष्य के लिंग, वचन आदि के अनुरूप होते हैं, चाहे विशेषण विशेष्य के पहले आए या बाद में। यह वाक्य में एक विशेषण के कई विशेष्य हों, तो विशेषण का लिंग पास वाले विशेष्य के लिंग, वचन के अनुरूप होगा। रूप-रचना की दृष्टि से विशेषण विकारी और अविकारी दोनो होते हैं।

विशेषणों की रचना –

कुछ विशेषण संज्ञाओं में प्रत्यय लगाकर बनते हैं। जैसे – धर्म से धार्मिक, जाति से जातीय, दान से दानी, चमक से चमकीला।

दो या अधिक शब्दों के मेल से भी विशेषण बनते हैं।

लिंग, वचन, कारक के आधार पर भी विशेषण बदल जाते हैं।

दो या अधिक वस्तुओं या भावों की उनके गुण, मान, दोषों के आधार पर परस्पर तुलना करने वाले विशेषण को तुलनात्मक विशेषण कहते हैं।

क्रिया : कार्य और भेद

जिस शब्द से किसी कार्य के करने या होने का बोध होता है, वह क्रिया कहलाती है। क्रिया विकारी शब्द हैं, इनके रूप लिंग, वचक, पुरुष के अनुसार बदलते रहते हैं। क्रिया का मूल ‘धातु’ है। धातु क्रियापद का वह अंश है जो किसी क्रिया के प्रायः सभी रूपों में पाया जाता है। धातु (मूल अक्षर) से ही क्रियाएं बनती हैं। व्युत्पत्ति अथवा शब्द-निर्माण के आधार पर धातुएं दो प्रकार की होती हैं – मूल धातु और यौगिक धातु। मूल धातु स्वतंत्र होती है, यह किसी दूसरे शब्द पर आश्रित नहीं होती। वहीं यौगिक धातु किसी प्रत्यय के योग से बनती है।

प्रेरणार्थक क्रिया (धातु) –

जिन क्रियाओं से कर्ता स्वयं कार्य न कर किसी दूसरे को कार्य के लिए प्रेरित करता है, वे प्रेरणार्थक क्रियाएं कहलाती हैं। अकर्मक क्रिया प्रेरणार्थक होने पर सकर्मक हो जाती है।

यौगिक क्रिया –

दो या अधिक धातुओं और दूसरे शब्दों के मेल से या धातुओं में प्रत्यय लगाकर बनीं क्रियाओं को यौगिक क्रिया कहा जाता है।

नामधातु –

संज्ञा या विशेषण से बनने वाले धातु को नामधातु कहा जाता है। जैसे – हाथ से हथियाना, बात से बतियाना, गरम से गरमाना।

रचना की दृष्टि से क्रिया के दो भेद सक्रमक क्रिया व अकर्मक क्रिया होते हैं।

सकर्मक क्रिया –

जिस क्रिया का कर्म हो या जिसके साथ कर्म की संभावना हो, सकर्मक क्रिया कहलाती है।

अकर्मक क्रिया –

जिन क्रियाओं का व्यापार व फल कर्ता पर हो, वे अकर्मक क्रियाएं कहलाती हैं। अकर्मक क्रियाओं का कर्म नहीं होता। क्रिया का व्यापार व फल दूसरे पर न पड़कर कर्ता पर पड़ता है।

उभयविध धातु –

जिन धातुओं का प्रयोग अकर्मक और सकर्मक दोनों रूपों में होता है, उभयविध धातु कहलाते हैं।

क्रिया के भेद –

द्विकर्म क्रिया, संयुक्त क्रिया, सहायक क्रिया, नामबोधक क्रिया, पूर्वकालिक क्रिया।

द्विकर्म क्रिया –

अधिकांश क्रियाएं एक कर्म वाली होती हैं। परंतु कुछ क्रियाओं में दो कर्म भी होते हैं। जैसे – मैं स्कूल जाता हूँ। इसमें एक ही कर्म ‘स्कूल’ है। मैं स्कूल में हिन्दी पढ़ाता हूँ। इसमें दो कर्म ‘स्कूल’ और ‘हिन्दी’ हैं।

संयुक्त क्रिया –

दो या दो से अधिक धातुओं के मेल से बनी क्रियाओं को संयुक्त क्रिया कहते हैं। ये सकर्मक व अकर्मक दोनो प्रकार की होती हैं।

संयुक्त क्रिया के भेद –

आरम्भबोधक, समाप्तिबोधक, अवकाशबोधक, नित्यबोधक, अनुमतिबोधक, शक्तिबोधक, पुनरुक्तसंयुक्त, इच्छाबोधक, अभ्यासबोधक, निश्चयबोधक, आवश्यकताबोधक क्रिया।

सहायक क्रिया –

यह मुख्य क्रिया के रूप में अर्थ को स्पष्ट व पूर्ण करने में सहायता करती है। कभी एक तो कभी अधिक क्रियाएं सहायक होती हैं। हिन्दी में इन क्रियाओं का व्यापक प्रयोग होता है। इनके बदलाव से क्रिया के काल में बदलाव होता है।

पूर्वकालिक क्रिया –

जब कर्ता एक कार्य पूर्ण कर उसी वक्त उसी समय दूसरी क्रिया में संलग्न होता है। तब पहली वाली क्रिया पूर्वकालिक कहलाती है। जैसे – उसने यात्रा समाप्त कर आराम किया।

क्रियार्थक संज्ञा –

जब क्रिया किसी संज्ञा के रूप में व्यवहार में आए, तब वह क्रियार्थक संज्ञा कहलाती है।

वाच्य –

क्रिया का वह परिवर्तन जिसके द्वारा यह बोध हो कि वाच्य के अन्तर्गत कर्ता, कर्म या भाव में से किसकी प्रधानता है। इसमें किसके अनुसार क्रिया के पुरुष, वचन आदि का प्रयोग हो। इसके अनुसार वाक्य में क्रिया के लिंग, वचन या तो कर्ता के अनुरूप होंगे या कर्म के या भाव के।

वाच्य के प्रयोग – कर्तरि प्रयोग, कर्मणि प्रयोग, भावे प्रयोग।

वाच्य के भेद – कर्मवाच्य, कर्तृवाच्य, भाववाच्य।

जब वाक्य में कर्म की प्रधानता होती है, तो क्रिया के रूप रूपांतर को कर्मवाच्य कहते हैं। इसमें सिर्फ सकर्मक क्रिया ही होती है।

क्रिया का वह रूपांतरण जिससे वाक्य में कर्ता की प्रधानता का बोध हो, कर्तृवाच्य कहलाता है। इसमें क्रिया सकर्मक व अकर्मक दोनो हो सकती है।

क्रिया का वह रूपांतरण जिससे वाक्य में क्रिया या भाव की प्रधानता हो,  भाववाच्य कहलाता है। इसमें अकर्मक क्रिया होती है।

काल –

क्रिया का वह रूप जिससे उसके कार्य-व्यापार का समय और उसकी पूर्ण या अपूर्ण अवस्था का बोध होता है, काल कहलाता है। काल के तीन भेद होते हैं – भूतकाल, वर्तमानकाल, भविष्य काल।

भूतकाल –

जब क्रिया से कार्य के समाप्त होने का बोध होता है, वहाँ पर भूतकाल होता है। भूतकाल के 6 भेद हैं – सामान्य भूत, आसन्न भूत, पूर्ण भूत, अपूर्ण भूत, संदिग्ध भूत, हेतुहेतुमद् भूत।

वर्तमान काल –

क्रियाओं के व्यापार की निरंतरता वर्तमानकाल कहलाती है। इसमें क्रियाओं का आरंभ हो चुका होता है परंतु समाप्त नहीं। वर्तमान काल के पाँच भेद होते हैं – सामान्य वर्तमान, तात्कालिक वर्तमान, पू्र्ण वर्तमान, संदिग्ध वर्तमान, सम्भाव्य वर्तमान।

भविष्य काल –

भविष्य में होने वाली क्रियाओं को भविष्य काल की क्रिया कहा जाता है। भविष्य काल के 3 भेद होते हैं – सामान्य भविष्य, सम्भाव्य भविष्य, हेतुहेतुमद् भविष्य।

अव्यय : कार्य और भेद

लिंग, वचन, कारक, पुरुष इत्यादि के कारण जिन शब्दों के रूपों में कोई विकार उत्पन्न न हो, अव्यय कहलाते हैं। ये शब्द हर स्थित में अपने मूल रूप में बने रहते हैं। अव्यय का रूपांतरण न होने के कारण ये अविकारी होते हैं। उदाहरण – जब, तब, कब, अभी, इधर, उधर, वहाँ, क्यों, अरे, और, एवं, तथा, किन्तु, परन्तु, बल्कि, अर्थात्, अतः, इसलिए इत्यादि।

क्रियाविशेषण –

क्रिया, विशेषण या दूसरे क्रिया-विशेषण की विशेषता बताने वाले शब्द को क्रियाविशेषण कहा जाता है।

प्रयोग के अनुसार क्रियाविशेषण –

प्रयोग के अनुसार क्रियाविशेषण तीन प्रकार के होते हैं।

  1. जिन क्रियाविशेषणों का प्रयोग वाक्य में स्वतंत्र रूप से होता है, साधारण क्रियाविशेषण कहलाते हैं।
  2. जिन क्रियाविशेषणों का संबंध किसी उपवाक्य से रहता है, संयोजक क्रियाविशेषण कहलाते हैं।
  3. जिन क्रियाविशेषणों का प्रयोग अवधारण(निश्चय) के लिए किसी भी शब्दभेद के साथ होता हो, उसे अनुबद्ध क्रियाविशेषण कहा जाता है।

रूप के अनुसार क्रियाविशेषण –

  1. वे क्रियाविशेषण जो किसी दूसरे शब्दों के मेल से नहीं बनते, मूल क्रियाविशेषण कहलाते हैं।
  2. दूसरे शब्द में प्रत्यय या पद जोड़कर बनाए गए क्रियाविशेषण, यौगिक क्रियाविशेषण कहलाते हैं।
  3. बिना रूपांतर के किसी स्थान में आने वाले क्रियाविशेषण स्थानीय क्रियाविशेषण कहलाते हैं।

अर्थ के अनुसार क्रियाविशेषण –

इसके अंतर्गत परिमाणवाचक क्रियाविशेषण, और रीतिवाचक क्रियाविशेषण आते हैं। परिमाणवाचक क्रियाविशेषण के अंतर्गत अधिकताबोधक, न्यूनताबोधक, तुलनाबोधक, पर्याप्तिबोधक, श्रेणिवाचक आते हैं।

सम्बंधबोधक –

वे अव्यय जो किसी संज्ञा के बाद आकर उस वाक्य के दूसरे शब्द से उस संज्ञा के संबंध को दर्शाते हैं, संबंधबोधक कहलाते हैं। यदि यह संज्ञा न हो, तो वही अव्यय क्रियाविशेषण कहलाते हैं।

संबंधबोधक के भेद –

प्रयोग के आधार पर सम्बद्ध और अनुबद्ध में बांटा गया है। अर्थ के आधार पर कालवाचक, सादृश्यवाचक, विरोधवाचक, विषयवाचक, दिशावाचक, संग्रहवाचक, स्थानवाचक, हेतुवाचक, तुलनावाचक, सहचरवाचक, साधनवाचक, व्यतिरेकवाचक, विनिमयवाचक में बांटा गया है। व्युत्पत्ति के आधार पर मूल संबंदबोधक, और यौगिक संबंधबोधक के रूप में बांटा गया है।

समुच्चबोधक –

यह पद (अव्यय) जो क्रिया या संज्ञा की विशेषता न बताकर एक वाक्य या पद का संबंध दूसरे वाक्य या पद से जोड़ता है। यह अव्यय पूर्ववाक्य का संबंध उत्तरवाक्य से जोड़ता है। जैसे – पानी बरसा और कीचड़ हो गई। इसमें ‘और’ अव्यय है जो दोनो पदों को जोड़ने का कार्य कर रहा है।

समुच्चबोधक के भेद –

समानाधिकरण – जिन पदो या अव्ययों के माध्यम से मुख्य वाक्य जोड़े जाते हैं, समानाधिकरण समुच्चबोधक कहलाते हैं। इसके चार उपभेद हैं – संयोजक, विभाजक, परिणामदर्शक, विरोधदर्शक।

व्यधिकरण – जिन पदों अथवा अव्ययों के मेल से एक मुख्य वाक्य में एक या अधिक आश्रित वाक्य जोड़े जाते हैं, व्यधिकरण समुच्चबोधक कहलाते हैं। इसके चार उपभेद – कारणवाचक, संकेतवाचक, स्वरूपवाचक, उद्देश्यवाचक हैं।

विस्मयादिबोधक –

इन अव्ययों से हर्ष, शोक, दुख, पीड़ा इत्यादि भाव सूचित होता है। परंतु इनका संबंध वाक्य या उसके किसी विशेषण पद से नहीं होता। व्याकरण में इनका कोई विशेष महत्व नहीं है। इनसे शब्दों या वाक्यों के निर्माण में कोई विशेष सहायता नहीं मिलती। इनका प्रयोग मनोभाव को तीव्र रूप में प्रकट करने हेतु किया जाता है। विस्मयादिबोधक के निम्नलिखित भेद हैं –

  • हर्षबोधक – वाह !, आहा !, शाबाश !
  • शोकबोधक – आह ! ऊह ! हाय ! त्राहि !
  • सम्बोधनबोधक – अरे ! रे ! अहो ! जी ! हे ! अजी ! लो !
  • स्वीकारबोधक – हाँ ! जी हाँ ! ठीक ! अच्छा ! जी ! बहुत अच्छा !
  • तिरस्कारबोधक – हट ! अरे ! धिक् ! चुप !
  • आश्चर्यबोधक – वाह ! हैं ! ऐ ! ओहो ! क्या !
  • अनुमोदनबोधक – ठीक ! अच्छा ! शाबाश ! वाह ! हाँ हाँ !

निपात और उनके कार्य –

यास्क के अनुसार ‘निपात’ के कई अर्थ हैं, इसीलिए ये निपात कहे जाते हैं। निपात का कोई लिंग, वचन नहीं होता। मूलतः इनका प्रयोग अव्ययों की तरह होता है। निपातों में अव्ययों की भांति आकारगत अपरिवर्तनीयता होती है। निपातों में सार्थकता नहीं होती परंतु इन्हें सर्वथा निरर्थक भी नहीं कहा जा सकता। यास्क ने निपात के तीन भेद माने हैं – उपमार्थक निपात, पदपूर्णार्थक निपात, कर्मोपसंग्रहार्थक निपात। निपात शुद्ध अव्यय नहीं हैं।

निपात के प्रकार –

निपात के कुल 9 वर्ग या प्रकार हैं –

प्रश्नबोधक निपात, स्वीकार्य निपात, नकारार्थक निपात, निषेधात्मक निपात, तुलनाबोधक निपात, आदरबोधक निपात, अवधारणाबोधक निपात, बिस्मयबोधक निपात, बलदायक(सीमाबोधक) निपात।

शब्द रचना –

इसके अंतर्गत शब्दभेद – तत्सम, तद्भव, देशज, विदेशी, रुढ़, यौगिक, योगरुढ़ शब्द, मूलशब्द, उपसर्ग, प्रत्यय, विशेष्य, विशेषण, सन्धि, समास, द्विरुक्ति आदि का अध्ययन करते हैं।

शब्द-भेद

ध्वनियों के मेल से बने सार्थक वर्णसमुदाय को ‘शब्द’ कहा जाता है। एक या अधिक वर्णों से बनी स्वतंत्र सार्थक ध्वनि को शब्द कहते हैं। अतः शब्द मूलतः ध्वन्यात्मक होंगे या वर्णात्मक। शब्द कभी अकेले तो कभी दूसरे शब्दों के साथ मिलकर अपना अर्थ प्रकट करता है। इन्हें हम दो रूपों में पाते हैं – एक तो इनका मिलावट रहित मूल रूप जिसे संस्कृत में प्रकृति या प्रातिपदिक कहते हैं। दूसरा वह जो कारक, काल, लिंग, वचन, पुरुष के आधार पर बदलकर बना होता है जिसे पद कहते हैं। यह वाक्यों में दूसरे शब्दों से मिलकर अपना रूप बदल लेता है। शब्दों की रचना ध्वनि और अर्थ के मेल से होती है। शब्द सार्थक व निरर्थक होते हैं। सार्थक वे जिन शब्दों का निश्चित अर्थ हो। जैसे ‘प्रेम’ एक सार्थक शब्द है, और ‘लिमारत’ निरर्थक शब्द जिसका कोई अर्थ नहीं।

उत्पत्ति की दृष्टि से शब्दों के प्रकार –

उत्पत्ति की दृष्टि से शब्दों के चार प्रकार तत्सम, तद्भव, देशज, विदेशज शब्द हैं।

रुढ़ शब्द –

वे शब्द जिनके खण्ड सार्थक न हों, रुढ़ शब्द कहलाते हैं।

यौगिक शब्द –

ये शब्द दो शब्दों के मेल से बनते हैं। इनके खण्ड सार्थक होते हैं। दो या अधिक रूढ़ शब्दों के योग से यौगिक शब्द बनते हैं। इसमें प्रत्येक शब्द के दो सार्थक खण्ड होंगे।

योगरूढ़ शब्द –

ये शब्द यौगिक तो होते हैं। साथ ही अपने सामान्य अर्थ से भिन्न विशेष अर्थ का बोध कराते हैं। अर्थात वे यौगिक शब्द जो अपने सामान्य अर्थ को छोड़कर विशेष अर्थ प्रदान करते हैं, योगरूढ़ शब्द कहलाते हैं। जैसे – दशानन, पीताम्बर, गजानन, चतुरानन, चक्रपाण, वज्रपाणि, गिरिधर, लम्बोदर इत्यादि।

शब्द रचना –

रचना के आधार पर शब्द तीन प्रकार के होते हैं – मूलशब्द, उपसर्ग, प्रत्यय। रूढ़ शब्द दूसरे शब्दों के मेल से नहीं बनते अतः ये मूलशब्द हैं। यौगिक शब्दों की रचना दो प्रकार से होती है। पहला शब्दांश के मेल से और दूसरा शब्दों के मेल से। शब्दांश दो प्रकार के होते हैं – उपसर्ग व प्रत्यय। किसी शब्द के पूर्व लगने वाले शब्दांश को उपसर्ग कहते हैं। किसी शब्द के अन्त में जोड़ा जाने वाला शब्दांश प्रत्यय कहलाता है।

उपसर्ग –

वह शब्दांश या अव्यय है जो किसी शब्द के पहले लगकर उसका विशेष अर्थ प्रकट करता है। यह दो शब्दों ‘उप’ और ‘सर्ग’ से मिलकर बनता है। उप का अर्थ है समीप/निकट और सर्ग का सृष्टि करना। अर्थात उपसर्ग से आशय है पास में बैठकर दूसरे नए सार्थक शब्द की सृष्टि करना। उपसर्गों का स्वतंत्र अस्तित्व न होते हुए भी वे किसी अन्य शब्द से मिलकर विशेष अर्थ प्रदान करते हैं। संस्कृत में उपसर्गों की संख्या 19 है। उर्दू में उपसर्गों की संख्या 12 है। हिन्दी में उपसर्गों की संख्या 10 है।

प्रत्यय –

शब्दों के बाद आने वाले अक्षर व अक्षरसमूह को प्रत्यय कहते हैं। यह दो शब्दों ‘प्रति’ और ‘अय’ से मिलकर बना है। प्रति का अर्थ है साथ में पर बाद में। अय का अर्थ है चलने वाला। अर्थात शब्दों के बाद लगने या चलने वाले को प्रत्यय कहते हैं। ये भी उपसर्गों की भांति ही अविकारी शब्दांश हैं। प्रत्यय के कुल दो भेद – कृत् प्रत्यय, और तद्धित प्रत्यय हैं।

कृत् व कृदन्त –

क्रिया या धातु के अन्त में लगने वाले प्रत्ययों को कृत् और उनके मेल से बनने वाले शब्दों को कृदन्त कहा जाता है। ये प्रत्यय क्रिया या धातु को नया रूप प्रदान करते हैं। इनसे संज्ञा व विशेषण बनते हैं। हिन्दी में क्रियाओं के अन्त का ‘ना’ हटा देने पर जो अंश बचता है, वही धातु है। कृदन्त के दो भेद विकारी और अविकारी(अव्यय) हैं। विकारी कृदन्त के चार भेद – कर्तृवाचक संज्ञा, क्रियार्थक संज्ञा, भूतकालिक कृदन्त, वर्तमानकालिक कृदन्त हैं। हिन्दी क्रियापदों के अन्त में कृत-प्रत्ययों के योग से कर्तृवाचक, कर्मवाचक, भाववाचक, करणवाचक संज्ञाएं बनती हैं।

तद्धित व तद्धितांत –

संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण के अन्त में लगने वाले प्रत्यय को तद्धित कहा जाता है। उनके मेल से बने शब्द ‘तद्धितांत’ कहलाते हैं।

कृदन्त और तद्धितांत में अंतर –

कृत प्रत्यय धातु के अन्त में लगता है। वहीं तद्धित प्रत्यय संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण के अन्त में लगता है। यही इन दोनो का मूल अंतर है।

प्रत्यय से रचना –

संस्कृत की तत्सम जातिवाचक संज्ञाओं के अन्त में तद्धित प्रत्यय लगाकर संज्ञाएं बनती हैं। किसी नाम के अन्त में तद्धित प्रत्यय जोड़कर व्यक्तिवाचक से अपत्यवाचक संज्ञाएं बनती हैं। विशेषण के अन्त में संस्कृत के तद्धित प्रत्यय लगाकर भाववाचक संज्ञाएं बनती हैं। संज्ञाओं के अन्त में संस्कृत के गुण, भाव या संबंध के वाचक तद्धित प्रत्ययों को जोड़कर विशेषण बनते हैं। दिन्दी के तद्भव शब्दों के अन्त में तद्धित प्रत्यय लगाकर संज्ञा और विशेषण बनाए जाते हैं। तद्धित प्रत्ययान्त शब्दों के अनेक रूप जैसे- भाववाचक, संबंधवाचक, कर्तृवाचक, विशेषण, व ऊनवाचक हैं। ऊनवाचक संज्ञाओं से वस्तु की लघुता, हीनता, प्रियता इत्यादि के भाव को व्यक्त किया जाता है। हिन्दी में बहुत सारे उर्दू के शब्द भी प्रयोग होते हैं। ये शब्द अरबी, फारसी व तुर्की के हैं। अतः इनके कृत् व तद्धित प्रत्यय भी इन्हीं भाषाओं के हैं।

विशेष्य विशेषण की रचना –

संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता बताने वाले शब्द को विशेषण कहते हैं। जिस संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता बताई जाती है उसे विशेष्य कहते हैं। विशेष्य या तो क्रिया रूप में या संज्ञा रूप में होता है। विशेष्य से विशेषण और विशेषण से विशेष्य बनाए जाते हैं। इसके लिए कृदन्त और तद्धितांत प्रत्ययों का सहारा लेना पड़ता है। विशेषण बनाते समय समस्त पदों का व्यवहार नहीं होना चाहिए। जैसे – कर्तव्य से कर्तव्यनिष्ठ, और सूद से सूदखोर, ये सब समस्त पद हैं विशेषण नहीं। प्रत्यय लगाकर ही विशेषण बनाना चाहिए। क्रिया में कृत्-प्रत्यय लगाकर भाववाचक संज्ञाएं बनाई जाती हैं। कृत्-प्रत्ययों द्वारा धातुओं से बनी संस्कृत की भाववाचक कृदन्त-संज्ञाएं हिन्दी में ज्यों-की-त्यों प्रयु्क्त होती हैं।

सन्धि –

सन्धि का सामान्य अर्थ है ‘मेल’। इसमें तो वर्णों के मेल से तीसरे शब्द की रचना होती है। संधि निरर्थक शब्दों को मिलाकर सार्थक शब्द बनाती है। संधि करने में शब्द का रूप प्रायः छोटा हो जाता है। संधि में समास नहीं होता, परंतु समास में संधि होती है।

द्विरुक्ति –

इसका अर्थ है दोहराना, एक ही उक्ति को दो बार उच्चरित करना। इसकी रचना सार्थक शब्दों की आवृत्ति से होती है। इसके अंतर्गत संज्ञा शब्द की द्विरुक्ति, सर्वनाम शब्द की द्विरुक्ति, विस्मयबोधक शब्द की द्विरुक्ति, विशेषण शब्द की द्विरुक्ति, विभक्तियुक्त शब्द की द्विरुक्ति, क्रिया शब्द की द्विरुक्ति, क्रियाविशेषण शब्द की द्विरुक्ति।

उदाहरण:-

घर-घर, पानी-पानी, बूँद-बूँद, किस-किस, अपना-अपना, क्या-क्या, कुछ-कुछ, आते-आते, जाते-जाते, गोल-गोल, जल्दी-जल्दी।

 

सन्धि और समास में अन्तर –

जहाँ संधि में दो वर्णों का मेल होता है, वहीं समास में दो पदों का योग होता है। समास में पदों के प्रत्यय समाप्त कर दिये जाते हैं। संधि के लिए दो वर्णों के मेल व विकार की गुंजाइश रहती है। जब्कि समास में इस मेल का विकार से कोई संबंध नहीं है। संधि के तोड़ने को विच्छेद कहते हैं। जब्कि समास का विग्रह होता है। हिन्दी में सन्धि केवल तत्सम पदों में होती है। जब्कि समास संस्कृत तत्सम, हिन्दी, उर्दू हर प्रकार के पदों में होता है। इसीलिए हिन्दी पदों के समास में सन्धि आवश्यक नहीं है।

समास –

समास का अर्थ है संक्षेप। समास का मुख्य प्रयोजन कम-के-कम शब्दों से अधिक से अधिक अर्थ प्रकट करना है। समास में कम से कम दो पदों का योग होता है। वे दो या अधिक पद एक हो जाते हैं, एकपदीभावः समास कहलाते हैं। समा में होने वाले समस्त पदों की विभक्ति प्रत्यय को लोप हो जाता है। समस्त पदों के बीच संधि की स्थिति होने पर संधि अवश्य होती है। यह नियम संस्कृत तत्सम में अत्यावश्यक है।

समास के भेद –

समास का अनुशरण हिन्दी में संस्कृत व्याकरण के आधार पर हुआ है। इस संबंध में हिन्दी की प्रकृति संस्कृत के अनुकूल है। हिन्दी की प्रवृत्ति दो पदों के समास की है, परंतु दो से अधिक पदों का भी समास होता है। समास के भेद कुछ इस प्रकार हैं –

अव्ययीभाव समास –

जिसमें पूर्व पद प्रधान और सामासिक या समास पद अव्यय हो, वहाँ अव्ययीभाव समास होता है। इसमें समूचापद क्रियाविशेषण हो जाता है। इसमें पहला पद समास आदि जाति का अव्यय होता है एवं वही प्रधान होता है। संस्कृत में सामासिक पद अव्यय हो जाने के कारण नपुंसक लिंग की प्रथमा विभक्ति के एकवचन के ही रूप में होता है। उदाहरण – यथाशक्ति, प्रतिदिन, यथासम्भव, भरपेट, निर्भर, प्रत्यंग, प्रत्यक्ष, यथार्थ इत्यादि।

तत्पुरुष समास –

इसमें उत्तर पद की प्रधानता होती है। इसमें सामान्यतः पूर्वपद विशेषण और उत्तरपद विशेष्य होता है। इस समास के तीन भेद – तत्पुरुष, कर्मधारय, द्विगु होते हैं। इसके 6 उपभेद उपपद, प्रादि, अलुक्, मध्यमपदलोपी, नञ्, मयूरव्यंसकादि हैं। इसे छ विभक्तियों कर्म, करण, सम्प्रदान, अपादान, सम्बन्ध, अधिकरण में विभक्त किया गया है।

कर्मधारय –

इसे कर्मधारय तत्पुरुष के नाम से जाना जाता है। इसके समस्त होने वाले पद समानाधिकरण अर्थात विशेष्य-विशेषण-भाव को प्राप्त होते हैं। कर्ता कारक के होते हैं और लिंग-वचन में समान होते हैं। कर्मधारय के चार भेद – विशेषण पूर्ववद, विशेष्य पूर्वपद, विशेषणोभयपद, विशेष्योभयपद हैं। अर्थात इस समास में कभी पहला पद कभी दूसरा पद तो कभी दोनों पद विशेषण होते हैं। तो कभी पहला पद, दूसरा पद, या दोनों पद विशेष्य होते हैं।

द्विगु समास –

वह कर्मधारय समास जिसका पूर्वपद संख्याबोधक हो, वहाँ द्विगु कर्मधारय समास आता है। द्विगु समास के दो भेद होते हैं – समाहारद्विगु, और उत्तरपदप्रधानद्विगु।

बहुब्रीहि समास –

इस समाम में पूर्वपद और उत्तरपद दोनों ही अप्रधान होते हैं। इसमें किसी अन्य अर्थ का बोध होता है। इसमें पूरा समस्तपद ही किसी अन्य पद का विशेषण होता है। समानाधिकरणबहुब्रीहि, व्यधिकरणबहुब्रीहि, तुल्ययोगबहुब्रीहि (सहबहुब्रीहि), व्यतिहारबहुब्रीहि इसके भेद हैं।

प्रयोग की दृष्टि से समास के भेद –

प्रयोग की दृष्टि से समास के कुल तीन भेद – संयोगमूलक समास, आश्रयमूलक समास, वर्णनमूलक समास हैं। संयोगमूलक समास को द्वन्द्व समास या संज्ञा समास कहते हैं। ऐसे समास में दोनों पद संज्ञा होते हैं। अर्थात इनमें दो संज्ञाओं का संयोग होता है। जैसे – माँ-बाप, भाई-बहन, माता-पिता, पति-पत्नी, नाना-नानी, दादा-दादी, रात-दिन, दूध-दही इत्यादि। परंतु जहाँ योजक जिह्न (-) नहीं लगता, वहाँ तत्पुरुष समाम होता है। तत्पुरुष में भी दो संज्ञाओं का संयोग होता है। विशेषण-समास आश्रमूलक समास है। प्रायः यह कर्मधारय समास होता है। इसमें पूर्वपद विशेषण होता है, परंतु उत्तरपद का अर्थ मजबूत होता है। कर्मधारय का शाब्दिक अर्थ है कर्म या वृत्ति धारण करनेवाला।

वाक्य –

मनुष्य के विचारों को पूर्णता से प्रकट करने वाला पदसमूह वाक्य कहलाता है। सार्थक समूह के व्यवस्थित रूप को वाक्य कहते हैं। वाक्य में क्रिया को होना अनिवार्य है। बिना क्रिया के कोई पदसमूह वाक्य नहीं बन सकता। यदि शब्द भाषा की प्रारंभिक अवस्था है, तो वाक्य उसका विकास। सभ्यता के विकास के साथ ही वाक्यों के विकास की वृद्धि होती है। क्योंकि मनुष्यों के भावों और विचारों की पूर्ण अभिव्यक्ति वाक्यों से ही होती है। शब्द वो साधन हैं जो वाक्यों की संरचना में सहायक होते हैं। वाक्य वह सार्थक ध्वनि हैं जिसके माध्यम से लेखक लिखकर तथा वक्ता बोलकर अपने भावों और विचारों की अभिव्यक्ति करता है। व्याकरण में वाक्य संरचना का अपना विधान है। जिससे शिक्षित लोग तो परिचित होते हैं परंतु अशिक्षित लोग इसका प्रयोग सटीकता से नहीं करते।

वाक्य में आकांक्षा, योग्यता व क्रम –

वाक्य के एक पद को सुनकर अगले को सुनने की उत्कंठा जागृत होती है, इसे की आकांक्षा कहते हैं। इस आकांक्षा की पूर्ति करने के लिए वाक्य का पूर्ण होना अत्यावश्यक है। जब वाक्य का हर पद या शब्द अर्थबोधन में सहायक हो, इसका तात्पर्य है कि वाक्य में योग्यता विद्यमान है। इसके बाद क्रम का महत्वपूर्ण स्थान है। क्योंकि यह आकांक्षा व योग्यता दोनों को पूर्ण करता है। यदि कहा जाए ‘अपना नहीं काम मैं हूँ करता’ तो इस वाक्य में क्रम नहीं है। इसके स्थान पर यदि कहा जाए ‘मैं अपना काम नहीं करता हूँ’ तो इसमें क्रम है।

पदबन्ध –

वाक्य का वह भाग जिसमें एक से अधिक पद परस्पर सम्बद्ध होकर अर्थ देते हैं, किंतु पूरा अर्थ नहीं देते पदबन्ध या वाक्यांश कहलाते हैं। रचना की दृष्टि से पदबंध में तीन बातें आवश्यक हैं। पहली इसमें एक से अधिक पद होते हैं। दूसरी ये पद इस तरह से संबद्ध होते हैं कि उनमें एक इकाई बन जाती है। तीसरा पदबन्ध किसी वाक्य का अंश होता है। शब्दभेद की भांति इनके आठ प्रकार स्वीकर किये गए हैं। जैसे – संज्ञा पदबंध, सर्वनाम पदबंध, क्रिया पदबंध, क्रियाविशेषण पदबंध, पदबंध और उपवाक्य।

वाक्य और उपवाक्य –

सामान्यतः वाक्य सार्थक शब्द समूह हैं, जिनमें कर्ता और क्रिया दोनों होते हैं। वाक्य के अर्थ में उद्देश्य और विधेय में परस्पर विरोधाभाव की स्थित न हो। जैसे – राम ने बैलगाड़ी से नदी पार की। यह वाक्य व्याकरण की दृष्टि से तो ठीक है। इसमें उद्देश्य, विधेय, क्रिया इत्यादि भी क्रमागत हैं। लेकिन इसका अर्थ भावबोधक नहीं है। अर्थात इसके स्थान पर राम ने नाव से नदी पार की। उपवाक्य तीन प्रकार के होते हैं – संज्ञा उपवाक्य, विशेषण उपवाक्य, क्रियाविशेषण उपवाक्य। जो आश्रित अपवाक्य संज्ञा की तरह व्यवहृत होते हैं, संज्ञा-उपवाक्य कहलाते हैं। ये कर्म(सकर्मक क्रिया) या पूरक(अकर्मक क्रिया) का काम करते हैं। इस उपवाक्य से पूर्व ‘कि’ का प्रयोग होता है। जो आश्रित उपवाक्य विशेषण की तरह व्यवहृत होता है, उसे विशेषण उपवाक्य कहते हैं। इसमें जो, जितनी, जैसा इत्यादि शब्दों का प्रयोग होता है। क्रियाविशेषण उपवाक्य में जब, जिधर, ज्यों, जहाँ, जिधर, यद्यपि इत्यादि शब्दों का प्रयोग होता है।

वाक्य भेद –

रचना की दृष्टि से वाक्यों के कुल तीन भेद हैं। सरल या साधारण वाक्य, मिश्र वाक्य, संयुक्त वाक्य। सरल वाक्य में एक कर्ता व एक क्रिया होती है। इसमें एक उद्देश्य और एक विधेय होता है। यदि एक सरल वाक्य के अतिरिक्त उसके अधीन कोई दूसरा अंगवाक्य हो, तब यह मिश्र वाक्य कहलाता है। अर्थात वाक्य में जब मुख्य उद्देश्य व मुख्य विधेय के अतिरिक्त एक या अधिक समापिका क्रियाएं हों, तो उसे मिश्रवाक्य कहते हैं। इसमें एक मुख्य उपवाक्य और अन्य आश्रित उपवाक्य होते हैं। सहायक वाक्य अपने में पूर्ण या सार्थक नहीं होते। लेकिन मुख्य वाक्य के साथ आने पर उनका अर्थ निकलता है। संयुक्त वाक्य में सरल वाक्य या मिश्र वाक्यों का मेल संयोजन अवयवों के माध्यम से होता है। दो या अधिक सरल अथवा मिश्र वाक्य अवयवों द्वारा संयुक्त हों, संयुक्त वाक्य कहलाता है।

अर्थ की दृष्टि से वाक्यों का वर्गीकरण –

विधिवाचक, निषेधवाचक, आज्ञावाचक, संदेहवाचक, संकेतवाचक, इच्छावातक, प्रश्नवाचक, विस्मयवाचक।

वाक्य का रूपांतरण –

एक प्रकार से दूसरे प्रकार में वाक्यों का ऐसा परिवर्तन जिसमें उसका अर्थ वही रहे, वाक्यपरिवर्तन कहलाता है। इस तरह के रूपांतर में सरल को मिश्र या संयुक्त में, मिश्र को सरल में बदला जा सकता है। कर्तृवाचक से कर्मवाचक में और विधिवाचक से निषेधवाचक में बदला जा सकता है।

वाक्य-विश्लेषण

वाक्य के सभी अंगों को अलग-अलग कर उसके पारस्परिक संबंध दिखाने की क्रिया वाक्यविश्लेषण कहलाती है। वाक्यविग्रह को हिन्दी व्याकरण में वाक्यविभाजन, वाक्यपृथक्करण के भी नाम से जाना जाता है। इसमें वाक्य के उपवाक्यों को अलग किया जाता है। उपवाक्यों का नामकरण होता है। अंत में पूरे वाक्य का नामकरण होता है। उपवाक्य में कर्ता व क्रिया को होना आवश्यक है।

शब्द और अर्थ में संबंध –

एक या अधिक वर्णों के सार्थक योग को शब्द कहते हैं। अर्थ की दृष्टि से शब्द दो प्रकार के होते हैं – सार्थक व निरर्थक। वे शब्द जिनका भाषा में अर्थ स्पष्ट है और कोष में वर्णित है, सार्थक शब्द कहलाते हैं। वे शब्द जिनका अपनी भाषा में अर्थ न हो, निरर्थक शब्द कहलाते हैं। अर्थ के अभाव में भाषा का कोई मतलब नहीं।

पर्यायवाची शब्द –

वे शब्द जिनके अर्थों में समानता हो, पर्यायवाची कहलाते हैं। पर्यायवाची को प्रतिशब्द भी कहा जाता है। किसी भी समृद्ध भाषा में पर्यायवाची शब्दों की अधिकता मिलती है। जो भाषा जिनती विकसित होगी उसमें पर्यायवाची शब्दों की संख्या उतनी ही अधिक होगी। हिन्दी के पर्यायवाची शब्द संस्कृते के तत्सम शब्द हैं। इन्हें संस्कृत से ज्यों का त्यों लिया गया है। परंतु ध्यान रहे कि इनके अर्थों में समानता होने पर भी इनके प्रयोग एक तरह के नहीं होते। कहीं कोई शब्द सटीक बैठता है तो कहीं दूसरा पर्यायवाची।

पर्यायवाची शब्दों की विस्तृत सूची देखने के लिए यहाँ क्लिक करें

अनेकार्थी या अनेकार्थक शब्द –

हिन्दी में बहुत से ऐसे शब्द हैं जिनके एक से अधिक अर्थ हैं। इन शब्दों को अनेकार्थी या अनेकार्थक शब्द कहा जाता है। जहाँ पर्यायवाची शब्दों में बहुत से शब्दों का एक अर्थ निकलता है। वहीं अनेकार्थक शब्द में एक ही शब्द के अनेक अर्थ निकलते हैं।

विलोम शब्द –

ये अपने सामने वाले शब्द के सर्वदा विपरीत अर्थ प्रदान करते हैं। इसीलिए इन्हें विलोम या विपरीतार्थक शब्द कहा  जाता है। ध्यान रहे कि संज्ञा शब्द का विपरीतार्थक संज्ञा और विशेषण का विपरीतार्थक विशेषण हो। विलोम शब्दों की विस्तृत सूची देखने के लिए यहाँ क्लिक करें

युग्म शब्द –

हिन्दी में प्रयुक्त ऐसे अनेक शब्द जिनका उच्चारण मात्रा या वर्ण के थोड़े से बदलाव के सिवाय प्रायः समान हो, किन्तु अर्थ में भिन्नता है। अर्थात् एक जैसे दिखने वाले वे शब्द जिनका अर्थ भिन्न हो, युग्म शब्द कहलाते हैं। इनका अर्थगत सूक्ष्म अन्तर भली भाँति समझ लेना चाहिए। इनमें कुछ शब्द ऐसे हैं जिनका प्रयोग गद्य की अपेक्षा पद्य में ज्यादा हुआ है। इन्हें ही युग्म शब्द या समोच्चरितप्राय भिन्नार्थक शब्द कहा जाता है।

अनेक शब्दों (पदों) के लिए एक शब्द (पद) –

भाषा की दृढ़ता, भावों की गम्भीरता और चुस्त शैली के लिए यह आवश्यक है कि लेखक शब्दों के प्रयोग में संयम से काम ले। ताकि वह विस्तृत विचारों या भावों को थोड़े से थोड़े शब्दों में व्यक्त किया जा सके। इन्हीं के माध्यम से ‘गागर में सागर’ भरने की कहावत चरित्रार्थ होती है। समास, तद्धित और कृदन्त वाक्यांश या वाक्य एक शब्द या पद के रूप में संक्षिप्त किये जा सकते हैं।

मुहावरे –

सामान्य अर्थ का बोध न कराकर कोई विलक्षण अर्थ प्रकट करने वाले वाक्यांश को मुहावरा कहते हैं। हिन्दी का शब्द ‘मुहावरा’ अरबी भाषा के मुहावरः शब्द से बना है। उर्दूभाषी इसे मुहाविरा बोलते हैं। जिसका अर्थ है ‘अभ्यास’ या ‘बातचीत’। हिन्दी में मुहावरा एक पारभाषिक शब्द बन गया। कुछ इसे रोजमर्रा या वागधारा भी कहते हैं। इसका प्रयोग भाषा में सरलता, सरसता, प्रवाह, व चमत्कार उत्पन्न करने के लिए किया जाता है। मुहावरे का प्रयोग वाक्य के प्रसंग में होता है, अलग नहीं। मुहावरा अपना असली रूप कभी नहीं बदलता। अर्थात मुहावरों को पर्यायवाची शब्दों में अनूदित नहीं किया जा सकता।

लोकोक्तियाँ या कहावतें –

लोकोक्तियों के पीछे कोई न कोई कहानी या घटना जुड़ी होती है। जिससे निकली बात लोगों में बात-बात पर प्रयोग किये जाने से प्रचलित हो जाती है।

भावार्थ –

भावार्थ की विधि गागर में सागर भरने की चेष्टा है। इसे संक्षिप्त व स्पष्ट होना चाहिए। इसे व्याख्या के रूप में नहीं होता चाहिए। साथ ही अवतरण के मूल भाव का विचार नहीं छूटना चाहिए। भावार्थ में अन्वयार्थ भी नहीं होना चाहिए। इसकी शैली सामासिक होने चाहिए। विषय को बढ़ा-चढ़ाकर लिखने का अवसर यहाँ नहीं रहता। भावार्थ की लम्बाई-चौड़ाई की सीमा तो तय नहीं की गई है। परंतु इसे मूल अवतरण से आधा होना चाहिए। भावार्थ की मूल विशेषता इसकी संक्षिप्तता है। फिर भी भावार्थ ‘संक्षेपण’ से सर्वदा भिन्न है।

भावार्थ के लिए निर्देश –

  • मूल अवतरण को दो-तीन बार ध्यानपू्र्वक पढ़ें और विचारों को रेखांकित करें।
  • व्यर्थ बातों व शब्दों को हटा दें।
  • रेखांकित वाक्यों व शब्दों को मिलाकर सार्थक वाक्य बना लें। रिक्त स्थानों की पूर्ति के लिए कुछ बाहरी शब्द भी लिये जा सकते हैं।
  • आलंकारिक शब्दों या भाषा का प्रयोग न हो।
  • विषय की व्याख्या करने, प्रत्येक पंक्ति या वाक्य को लिखने या टीका-टिप्पणी करने की कोई आवश्यकता नहीं।
  • भावों का पदान्वयन नहीं हो। संपूर्ण भावार्थ पढ़ने के बाद यह सुनिश्चित करें कि मूल अवतरण के सभी भाव इसमें संकलित हैं। यह कुछ छूट गया हो तो उसे यथास्थान पर समाविष्ट करें।
  • भावार्थ की भाषा स्पष्ट व सरल हो। मूल अवतरण के शब्दों का ज्यों-का-त्यों प्रयोग आवश्यक नहीं है। ध्यान रहे मूल अवतरण के मूलभाव में परिवर्तन न आए।

व्याख्या –

व्याख्या न तो भावार्थ है और न ही आशय। यह इन दोनों ही से भिन्न है एवं इसके नियम भी अलग हैं। व्याख्या किसी भाव का विस्तार या विवेचन है। भावार्थ के विपरीत इसमें लेखक को अपने अध्ययन, मनन व चिंतन को प्रदर्शित करने की पूर्ण स्वतंत्रता है। भावार्थ के विपरीत व्याख्या मूल अवतरण से कहीं विस्तृत होती है।

व्याख्या के लिए आवश्यक निर्देश –

  • इसमें प्रसंगनिर्देश अत्यावश्यक हैं।
  • प्रसंगनिर्देश संक्षिप्त, आकर्षक, व संगत होने चाहिए।
  • व्याख्या करते वक्त मूल भाव का संतुलित विवेचन होना चाहिए।
  • मूल अवतरण के विचारों का खण्डन व मण्डन किया जा सकता है।
  • मूल अवतरण के विचारों के गुण-दोषों पर समानरूप से प्रकाश डालना चाहिए।
  • यदि अवतरण में कोई महत्वपूर्ण बात हो, तो अंत में उस पर टिप्पणी देनी चाहिए।

आशय या अर्थ लेखन –

इसका विधान भी भावार्थ से पृथक है। यह न तो किसी अवतरण का सारांश है न व्याख्या और न ही भावार्थ। मूलभावों को अपनी भाषा में उपस्थित करने की विधि को आशय या अर्थलेखन कहा जाता है। इसमें आवश्यक है कि मूल अवतरण के भावों और विचारों की रक्षा की जाए।

पल्लवन –

किसी सुगठित व गुम्फित विचार अथवा भाव के विस्तार को पल्लवन कहा जाता है। पण्डित रामचंद्र शुक्ल इस गद्यलेखन में सिद्धहस्थ थे। इस प्रकार के लेखन की गंजाइस पद्य में अधिक है। क्योंकि इसमें कम-से-कम शब्दों में अधिक से अधिक भावों व विचारों को भरा जाता है। गागर में सागर भरने की इस शैली के अर्थ को समझना सामान्य लोगों के लिए मुश्किल होता है। अर्थात इसे समझने के लिए कुशल व्याख्याता की आवश्यकता पड़ती है। हिन्दी में ऐसी बहुत सी कहावतें और सूक्तियां हैं जिनके अर्थ ऊपर से तो स्पष्ट नहीं हैं। किंतु उनका अर्थ-विस्तार करने पर उनका भाव पूर्णतः स्पष्ट हो जाता है। लेखन की इसी क्रिया को पल्लवन के नाम से जाना जाता है। इसके मूल वाक्य में आए विचारसूत्रों को सही-सही अर्थ में पकड़ने की चेष्टा की जाती है।

अपठित गद्यांश –

कभी कभी परीक्षा में ऐसे गद्यांश दिये जाते हैं, जिनका पाठ्यपुस्तकों से कोई संबंध नहीं। इसके नाम से ही झलक रहा है एक ऐसा गद्यांश जो अब तक छात्र के लिए अपठित हो। इसके माध्यम से छात्र की बौद्धिक क्षमता, गहराई, व पहुँच की जाँच की जाती है। साथ ही इससे छात्रों के सामान्य ज्ञान और स्वतंत्र अध्ययन की भी जाँच होती है। यह एक प्रकार का मानसिक व्यायाम है। ये अवतरण अक्सर समाचारपत्र-पत्रिकाओं, सामान्य ज्ञान की पुस्तकों इत्यादि से लिए जाते हैं।

अनुच्छेद लेखन –

किसी एक भाव अथवा विचार को व्यक्त करने के लिए लिखे गए संबद्ध व लघु वाक्यसमूह को अनुच्छेद लेखन कहा जाता है। किसी एक विचार को इस तरह लिखना कि सभी वाक्य एक दूसरे से बंधें हों। एक भी वाक्य अनावश्यक और बेकार नहीं होना चाहिए। अनुच्छेद अपनेआप में पूर्ण व स्वतंत्र होते हैं। अनुच्छेद का मुख्य विचार अथवा भाव की कुंजी या तो आरंभ में रहती है या अन्त में। उच्च कोटि के अनुच्छेद लेखन में मुख्य विचार अंत में दिया जाता है।

कहानी लेखन –

यह हिन्दी में गद्य विधा की सबसे प्रचलित विधाओं में से एक है। कहानी लेखन की प्रथा हिन्दी के साथ सभी भाषाओं में एक लम्बे समय से चली आ रही है। कहानी लेखन, पाठन व श्रवण सभी लोगों के बीच आकर्षण का विषय है। कहानी की कोई परिभाषा देना मतलब किसी दायरे में बांधना है। सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्याययन अज्ञेय के अनुसार ‘कहानी जीवन की प्रतिच्छाया है और जीवन स्वयं एक अधूरी कहानी है, एक शिक्षा है, जो उम्र भर मिलती है और समाप्त नहीं होती।

संवाद लेखन –

संवाद का सामान्य अर्थ बातचीत है। दो या दो से अधिक व्यक्तियों के बीच हुए वार्तालाप या सम्भाषण को संवाद कहते हैं। अपने विचारों व भावों को व्यक्त करने के लिए संवाद की सहायता ली जाती है। संवाद की सहायता अपने विचारों व भावों को प्रकट करने के लिए की जाती है। संवाद जितना सजीव, सामाजिक व रोचक होगा, उतना ही अधिक आकर्षक होगा। उसके प्रति लोगों का खिंचाव होगा।

अच्छे संवाद लेखन की विशेषताएं –

  • संवाद की भाषा सरल होनी चाहिए।
  • संवाद में प्रवाह, क्रम, तर्कसम्मत विचाह होना आवश्यक हैं।
  • यह देश, काल, विषय, व व्यक्ति के अनुसार लिखा जाना चाहिए।
  • संवाद में जीवन की जितनी अधिक स्वाभाविकता होगी, वह उतना ही अधिक सजीव, रोचक व मनोरंजक होगा।
  • इसका आरंभ और अंत रोचक होना चाहिए।
  • संवाद छोटे व स्पष्ट होने चाहिए। तभी इसके प्रति पाठकों का आकर्षण बढ़ेगा।

संक्षेपण –

किसी विस्तृत विवरण, सविस्तार व्याख्या, वक्तव्य, पत्रव्यवहार या लेख के तथ्यों और निर्देशों के ऐसे संयोजन को प्रक्षेण कहा जाता है जिसमें सभी अनिवार्य, उयोगी तथा मूल तथ्यों का प्रवाहपूर्ण संक्षिप्त संकलन हो। परंतु अप्रासंगिक, असम्बद्ध, पुनरावृत्त, अनावश्यक बातें न हों। इसे पढ़ लेने के बाद मूल संदर्भ को पढ़ने की कोई आवश्यकता नहीं रह जानी चाहिए। इसमें कम से कम शब्दों में विचारों औऱ भावों को संकलित किया जाता है। इसका प्रयोग लम्बे चौंड़े विवरण व पत्राचार आदि की सारी बातें कम शब्दों में रखने में किया जाता है। इसमें मूल विवरण की कोई बात छूटनी नहीं चाहिए। लेकिन अनावश्यक बातों को छांटकर निकाल दिया जाता है। मूल बातों को रख लिया जाता है।

रस –

रस की सबसे प्रचलित परिभाषा भरत मुनि ने दी है। इन्होंने सर्वप्रथम रसों का उल्लेख अपने नाट्यशास्त्र में किया। इनके अनुसार विभाव, अनुभाव, और व्यभिचारी भाव के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है। काव्यप्रकाश के रचयिता मम्मटभट्ट ने कहा कि आलम्बन विभाव से उद्बुद्ध, उद्दीपन से उद्दीप्त, व्यभिचारी भावों से परिपुष्ट तथा अनुभाव द्वारा व्यक्त हृदय का स्थायीभाव ही रस-दशा को प्राप्त होता है। भरतमुनि ने अपने नाट्यशास्त्र में भावों की संख्या 49 बताई है। इनमें 33 संचारी भाव, 8 सात्त्विक, और 8 स्थाई भाव हैं। भरतमुनि के अनुसार 8 स्थाई भाव – रति, शोक, क्रोध, ह्रास, भय, उत्साह, विस्मय, जुगुप्सा। भरतमुनि के बाद निर्वेद(शांत) को 9वां स्थाई भाव स्वीकार किया गया। इसके बाद के आचार्यों ने भक्ति को 10वां और वात्सल्य को 11वां स्थाई भाव स्वीकार किया। आचार्य रामचंद्रशुक्ल के अनुसार ‘भाव का जहाँ स्थायित्व हो, उसी को स्थायीभाव कहा जाता है। आचार्य अभिनवगुप्त और मम्मट ने 9 ही रस माने हैं। ये रस – श्रंगार, वीर, हास्य, करुण, शांत, रौद्र, भयानक, वीभत्स, अद्भुत हैं। इसके अंतर्गत भावपक्ष (स्थायीभाव, संचारीभाव), विभावपक्ष (आलम्बन, उद्दीपन, आश्रय), अनुभाव आते हैं।

छन्द –

अक्षरों की संख्या व क्रम, मात्रागणना, व यति-गति से सम्बद्ध विशिष्ट नियमों से नियोजित पद्यरचना छन्द कहलाती है। इसकी चर्चा पहली बार ऋग्वेद में हुई है। यदि गद्य का नियामक व्याकरण है तो कविता का छन्दशास्त्र। यह पद्य की रचना का मानक है और इसी के अनुसार पद्य की सृष्टि होती है। छन्दशास्त्र में पद्य रचना का समुचित ज्ञान है।

अलंकार –

रस की तरह अलंकार का भी सटीक सक्षण बता पाना मुश्किल है। आचार्य वामन के अनुसार ‘जो किसी वस्तु को अलंकृत करे, वह अलंकार है’। जिस प्रकार आभूषण स्वर्ण से बनते हैं उसी प्रकार अलंकार भी सुवर्ण(सुंदर वर्ण) से बनते हैं। काव्यशास्त्र के आरंभिक काल में अलंकार का प्रयोग इसी अर्थ में किया जाता था। संस्कृत में अलंकार शब्द का प्रयोग इसके शास्त्रपक्ष में हुआ है। मुख्यतः अलंकारों के तीन भेद – शब्दालंकार, अर्थालंकार, उभयालंकार हैं। इन्हीं तीन आधारों पर अलंकारों का अध्ययन किया जाता है। अनुप्रास, यमक, श्लेष प्रमुख शब्दालंकार हैं। उपमा, उत्प्रेक्षा, रूपक, अतिशयोक्ति प्रमुख अर्थालंकार हैं।

पत्र लेखन के प्रकार –

  • आवेदन पत्र
  • निमंत्रण पत्र
  • अभिभावक के नाम पत्र
  • पिता के नाम पत्र
  • माता के नाम पत्र
  • मित्र के नाम पत्र
  • छोटे भाई के नाम पत्र
  • बधाई पत्र
  • शोक पत्र
  • सम्पादक के नाम पत्र
  • फीस माफ करने हेतु पत्र
  • सूचीपत्र मांगने हेतु पुस्तक विक्रेता को पत्र

आलेखन –

यह पत्राचार का ही एक अंग है। विकास के साथ आलेखन के विभिन्न रूप सामने आए हैं। विशेषकर सरकारी सेवाओं व कार्यालयों में कार्यरतों के लिए आलेखन कला में निपुण होना चाहिए। इसके लिए दो चीजें आवश्यक हैं। पहली भाषा की निपुणता, दूसरी आलेखन के विविध रूपों और उसके विशिष्ट नियमों की जानकारी। सामान्यतः आलेखन दो प्रकार के होते हैं। प्रारंभिक आलेखन और उन्नत (उच्चतर) आलेखन। प्रारंभिक आलेखन में वैयक्तिक व सामाजिक पत्राचार आते हैं। इसके अंतर्गत पारिवारिक पत्र, आवेदनपत्र, पदाधिकारियों से पत्रव्यवहार, निमंत्रणपत्र, सम्पादक के नाम पत्र, व्यावसायिक पत्र इत्यादि आते हैं।

टिप्पणन लेखन –

किसी विचाराधीन पत्र या आवेदन पर निष्पादन को सरल बनाने के उद्देश्य से इसे लिखा जाता है। इसे सरकारी कार्यालयों में सहायकों, लिपिकों व कार्यालय अधीक्षकों द्वारा लिखा जाता है। कुछ बातें इसमें ध्यान में रखने योग्य हैं। इस पत्र में पूर्व के पत्र का सारांश हो। जिस प्रश्न पर निर्णय किया जाना है, उसका उसका विवरण या विश्लेषण। उस संबंध में क्या कार्यवाही की जाए और क्या आदेश दिये जाए, इस संबंध में सुझाव दें।

साहित्य की विधाएं –

कहानी, निबन्ध, जीवनी, आत्मकथा, नाटक, एकांकी, उपन्यास, यात्रावृत्तांत, संस्मरण इत्यादि।

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