राज्य विधानमण्डल : विधानसभा और विधानपरिषद

राज्य विधानमण्डल : विधानसभा और विधानपरिषद – भारत में केंद्र एवं राज्य दोनों ही में संसदीय प्रणाली को अपनाया गया है। केंद्रीय विधानमण्डल में दो सदन हैं। संविधान में मूल रूप से यह व्यवस्था की गई थी कि जिन राज्यों की जनसंख्या अधिक है, उनके विधानमण्डल द्विसदनात्मक होंगे। इसके बाद कुछ राज्यों ने विधानपरिषद को अनावश्यक समझा। इनके अनुरोध पर संसद ने कानून बनाकर इसकी अनिवार्यता समाप्त कर दी।

2005 में संसद में आंध्रप्रदेश विधानपरिषद अधिनियम लाया गया। इसके तहत 4 अप्रैल 2007 को आंध्रप्रदेश के विधानपरिषद का पुनर्गठन किया गया। जिसे 1985 ई. में समाप्त कर दिया गया था। आंध्र प्रदेश विधानपरिषद का गठन 1957 ई. में किया गया था। पंजाब व पश्चिम बंगाल ने 1971 में अपनी विधान परिषदों का उत्सादन कर दिया था। संसद किसी राज्य के विधानपरिषद के उत्सादन या सृजन से संबंधित कानून बना सकती है। संविधान के अनुच्छेद 169 के अनुसार संसद किसी राज्य के विधानपरिषद के उत्सादन का उपबंध कर सकती है।

विधानमण्डल के सदस्य की अर्हताएं –

  • भारत का नागरिक हो। तीसरी अनुसूची में दिए गए प्रारूप के अनुसार शपथ लेना अनिवार्य है।
  • न्यूनतम आयु – विधानसभा हेतु 25 वर्ष और विधानपरिषद् हेतु 30 वर्ष।
  • राज्य के किसी विधानसभा क्षेत्र का मतदाता हो।

विधानमंडल की सदस्यता के लिए निरर्हताएं –

इनका वर्णन संविधान के अनुच्छेद 191 में किया गया है। यदि कोई सदस्य केंद्र या राज्य के अधीन कोई लाभ का पद अर्जित करता है तो वह निरर्ह होगा। बहुत से राज्यों ने नियम बनाकर ऐसे पदों की सूची तैयार की है जिनका धारक विधानमंडल का सदस्य होने से निरर्हित नहीं होगा।

यदि कोई सदस्य बिना अनुमति के 60 दिन तक सदन के अधिवेशनों में अनुपस्थित रहता है। तो अनुच्छेद 190(4) के अनुसार उसके स्थान को रिक्त घोषित किया जा सकता है। अनुच्छेद 192(2) के अनुसार सदस्य की निरर्हता के संबंध में राज्यपाल को निर्वाचन आयोग की राय के अनुसार कार्य करना पड़ेगा। कोई व्यक्ति एक ही समय में विधानसभा और विधानपरिषद् दोनों का सदस्य नहीं हो सकता। यदि कोई व्यक्ति दो या अधिक राज्यों के विधानमंडलों के लिए निर्वाचित होता है। तो अनुच्छेद 190(2) के अनुसार 10 दिन के अंदर एक के अतिरिक्त बाकी से त्यागपत्र देना होगा। अन्यथा उसके द्वारा अर्जित सभी पद रिक्त माने जाएंगे।

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विधानसभा और विधानपरिषद से त्यागपत्र –

विधानपरिषद् सदस्य सभापति को अपना त्यागपत्र संबोधित करते हैं। विधानसभा सदस्य अपना त्यागपत्र विधानसभा अध्यक्ष को सौंपते हैं। वहीं यह त्यागपत्र सदस्य के हस्ताक्षर सहित होना अनिवार्य है। 1974 में संविधान के अनुच्छेद 190 का संशोधन इससे संबंधित है। इसके अनुसार सभाध्यक्ष या सभापति यह सुनिश्चित करेंगे कि त्यागपत्र स्वैच्छिक है अथवा किसी प्रपीड़न के अधीन नहीं दिया गया है। यह असली है अथवा कूटरचित नहीं है। पूर्ण रूप से संतुष्टि के बाद ही त्यागपत्र को स्वीकार किया जाएगा। दरअसल इस संशोधन का कारण गुजरात में 1974 में चिम्मनभाई सरकार के विरुद्ध नव निर्माण आंदोलन के दौरान कुछ सदस्यों पर दबाव डाल कर त्यागपत्र दिलवाए जाने की घटना है। भविष्य में इस प्रकार के कृत्य से बचने हेतु यह संशोधन किया गया।

विधानसभा निर्वाचन –

राज्य विधानसभाओं का निर्वाचन प्रत्यक्ष रूप से होता है। इसमें राज्य के मतदाता गुप्त मतदान के माध्यम से अपने प्रतिनिधि को चुनते हैं। इनका चुनाव वयस्क मताधिकार के आधार पर होता है।

विधानसभा सीटों की संख्या –

अनुच्छेद 170 के अनुसार विधानसभा सीटों की संख्या कम से कम 60 और अधिक से अधिक 500 हो सकती है। परंतु कुछ छोटे राज्यों की विधानसभा सीटों की न्यूनतम संख्या कम कर दी गई। सिक्किम, गोवा और अरुणाचल प्रदेश विधानसभा सीटों की न्यूनतम संख्या 30 है। भारत में उत्तर प्रदेश विधानसभा सबसे बड़ी है जिसमें कुल 403 सीटें हैं।

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विधानसभा और विधानपरिषद में आरक्षण –

अनुच्छेद 332 के अनुसार राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई है। राज्यपाल विधानसभा में आंग्ल भारतीयों का प्रतिनिधित्व न होने पर अनुच्छेद 333 के अनुसार एक व्यक्ति का नाम निर्दिष्ट कर सकता है। अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण का प्रावधान मूलतः संविधान के प्रारंभ के 10 वर्ष के लिए किया गया था।

विधानसभा का कार्यकाल –

इसका कार्यकाल 5 वर्ष का होता है। परंतु इससे पूर्व भी इसके विघटन की शक्ति राज्यपाल में निहित है। हालांकि राज्यपाल की इस शक्ति का कई बार दुरुपयोग भी हुआ। 1977 में केंद्र की जनता पार्टी की सरकार ने 9 राज्यों की कांग्रेस सरकारों को त्यागपत्र देने, विधानसभा को विघटित कर पुनर्निर्वाचन कराने को कहा। 1980 में सत्ता में आने के बाद कांग्रेस सरकार ने भी यही किया। ऐसे 9 राज्यों की विधानसभाएं भंग कर दी जहाँ कांग्रेस की सरकार नहीं थी। 1992 में ऐसी चार विधानसभाएं विघटित कर दी गई जहाँ भारतीय जनता पार्टी का बहुमत था।

विधानसभा और विधानपरिषद में विधेयक –

सामान्य विधेयक को विधानमंडल के किसी भी सदन में प्रस्तुत किया जा सकता है। एक सदन से पारित होने के बाद दूसरे सदन को भेज दिया जाता है। दोनों सदनों से पारित होने के बाद इसे राज्यपाल के हस्ताक्षर के लिए भेजा जाता है। राज्यपाल के हस्ताक्षर के बाद ही कोई विधेयक कानून बनता है। धन विधेयक को सिर्फ विधानसभा में ही लाया जा सकता है।

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विधान परिषद् –

यह राज्य विधानमण्डल का स्थाई सदन है। इसका विघटन नहीं किया जा सकता। परंतु इसे समाप्त किया जा सकता है। इसके सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्ष होता है। इसके एक तिहाई सदस्य हर साल सेवानिवृत्त और निर्वाचित होते रहते हैं। किसी सदस्य की मृत्यु या त्यागपत्र से रिक्त स्थान को भरने के लिए आकस्मिक रिक्ति को भरने के लिए निर्वाचित सदस्य उस सदस्य के शेष कार्यकाल तक ही परिषद् का सदस्य रहेगा न कि 6 वर्ष के लिए। अनुच्छेद 171 के अनुसार विधान परिषद् की न्यूनतम सदस्य संख्या 40 निर्धारित की गई है। यह संख्या राज्य विधानसभा की सदस्य संख्या के एक तिहाई से अधिक नहीं होनी चाहिए। यह अनुच्छेद संसद को विधानपरिषद् की संरचना के लिए उपबंध करने का अधिकार देता है।

विधान परिषद् का गठन –

  • एक तिहाई सदस्य – नगरपालिकाओं, जिला बोर्डों, और अन्य स्थानीय प्राधिकारियों के सदस्यों से मिलकर बने निर्वाचक मण्डल द्वारा निर्वाचित किये जाते हैं।
  • एक तिहाई सदस्य – राज्य विधानसभा के निर्वाचित सदस्यों द्वारा ऐसे व्यक्तियों में से चुने जाते हैं, जो सभा के सदस्य न हों।
  • 1/6 सदस्य – राज्यपाल द्वारा निर्दिष्ट किये जाते हैं। राज्यपाल इन्हें कला, विज्ञान, साहित्य, समाज सेवा, सहकारी आंदोलन में किये गए योगदान के आधार पर चुनता है।
  • 1/12 सदस्य – तीन वर्ष से स्नातक हो चुके मतदाताओं द्वारा निर्वाचित किये जाते हैं।
  • 1/12 सदस्य – शिक्षकों के निर्वाचन मण्डल द्वारा निर्वाचित होते हैं। माध्यमिक शिक्षा से ऊपर के संस्थानों में 3 साल से अधिक से पढ़ा रहे शिक्षक इसके लिए पात्र होंगे।
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