भारत के प्रमुख लोग

भारत के प्रमुख लोग ( Important People of India ) – महात्मा गाँधी, भीमराव अम्बेडकर, अब्दुल कलाम, कबीरदास, नेहरू, इंदिरा, भगतसिंह, विवेकानंद…

प्रमुख लोगों की जन्म तिथि, जन्म स्थान, माता, पिता के नाम इत्यादि –

व्यक्तिजन्म तिथिजन्म स्थानपितामातामृत्यु
महावीर स्वामी599 ई.पू.कुण्डग्रामसिद्धार्थत्रिशला देवी527 ई.पू.
गौतम बुद्ध563 ई. पू.लुम्बिनीशुद्धोदनमहामाया483 ई.पू.
कबीरदास1398 ई.काशी--1518 ई.
रहीमदास17 दिंसबर 1556 ई.दिल्लीबैरमखाँसईदा बेगम1626 ई.
ज्योतिबा फुले11 अप्रैल 1827खानवाड़ी, पुणेगोविंद रावचिमनाबाई29 नवंबर 1890
लक्ष्मी बाई19 नवंबर 1835भदौनी, वाराणसीमोरोपंतभागीरथी बाई18 जून 1858
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र9 सितंबर 1850 ई.काशीगोपालचंद्र गिरिधरदास-6 जनवरी 1885 ई.
बालगंगाधर तिलक23 जुलाई 1856चिखली गाँव, रत्नागिरीगंगाधर तिलकपार्वती बाई1 अगस्त 1920
प्रताप नारायण मिश्र1856 ई.बैजे गाँव (उन्नाव, UP)पं. संकटा प्रसाद-1894 ई.
रवींद्रनाथ टैगोर1861 ई.कोलकातादेवेंद्रनाथ टैगोरशारदा देवी1941 ई.
स्वामी विवेकानंद12 जनवरी 1863 कलकत्ताविश्वनाथ दत्तभुवनेश्वरी देवी4 जुलाई 1902
लाला लाजपत राय28 जनवरी 1865मोगा, पंजाबलाला राधाकृष्णगुलाब देवी17 नवंबर 1828
महात्मा गांधी2 अक्टूबर 1869पोरबंदर (काठियावाड़, गुजरात)करमचंद गाँधीपुतलीबाई30 जनवरी 1948
मुंशी प्रेमचंद1880 ई.लमही, वाराणसीअजायब लालआनन्दी देवी1936 ई.
काका कालेकर1885 ई.सतारा, महाराष्ट्र--1981 ई.
मैथिलीशरण गुप्त1886 ई.चिरगाँव (झाँसी, UP)रामचरण गुप्त-1964 ई.
जवाहरलाल नेहरू14 नवंबर 1889इलाहाबादमोतीलाल नेहरूस्वरूप रानी27 मई 1964
जयशंकर प्रसाद1890 ई.काशीदेवकी प्रसाद-1937 ई.
भीमराव अम्बेडकर14 अप्रैल 1891मऊ, मध्यप्रदेशमारजी मालोजी सकपालभीमाबाई मुरबादकर6 दिसंबर 1956
श्रीराम शर्मा23 मार्च 1892 ई.मक्खनपुर (मैनपुरी, UP)--1967 ई.
सूभाषचंद्र बोस23 जनवरी 1897कटक, ओडिशाजानकीनाथ बोसप्रभावती-
सूर्यकांत त्रिपाठी निराला1897 ई.मेदिनीपुर, बंगालरामसहाय त्रिपाठी-1961 ई.
सुमित्रानन्दन पंत20 मई 1900कौसानी, अल्मोड़ागंगादत्त पंतसरस्वती देवी28 दिसंबर 1977
मेजर ध्यानचंद29 अगस्त 1905इलाहाबादसमेश्वर दत्त सिंहश्रद्धा सिंह3 दिसंबर 1979
चंद्रशेखर आजाद23 जुलाई 1906भाबरा, झाबुआ (मध्यप्रदेश)सीताराम तिवारीजगरानी देवी (3)27 फरवरी 1931
सोहनलाल द्विवेदी22 फरवरी 1906 ई.बिन्दकी, फतेहपुरवृन्दावन प्रसाद द्विवेदी-1 मार्च 1988 ई.
भगत सिंह28 सिंबर 1907लायलपुर, पंजाबसरदार किशन सिंहविद्यावती23 मार्य 1931
हजारीप्रसाद द्विवेदी1907 ई.दूबे का छपरा, बलियाअनमोल दुबेज्योतिकली देवी1979 ई.
हरिवंशराय बच्चन27 नवंबर 1907 ई.प्रयागप्रताप नारायण श्रीवास्तवसरस्वती देवी18 जनवरी 2003
महादेवी वर्मा1907 ई.फर्रुखाबाद (UP)गोविन्दप्रसाद वर्माहेमरानी देवी1987 ई.
रामधारी सिंह दिनकर1908 ई.सिमरिया (मुंगेर, बिहार)बाबू रवि सिंहमनरूप देवी14 अप्रैल 1974
इंदिरा गाँधी19 नवंबर 1917इलाहाबादजवाहरलाल नेहरूकमला नेहरू31 अक्टूबर 1984
अटल बिहारी वाजपेयी25 दिसंबर 1924ग्वालियर, MPश्रीकृष्ण वाजपेयीकृष्णादेवी16 अगस्त 2018
धर्मवीर भारती25 दिसंबर 1926 ई.इलाहाबादचिरंजी लालचन्दा देवी4 सितंबर 1997
ए.पी.जे. अब्दुल कलाम15 अक्टूबर 1931रामेश्वरम, तमिलनाडुजैनुलाब्दीन मरकयरएशियम्मा जैनुलाब्दीन22 जुलाई 2015
नरेंद्र मोदी17 सितंबर 1950बाड़नगर, गुजरातदामोदरसाद मोदीहीराबेन मोदी-
कपिल देव6 जनवरी 1959चंडीगढ़रामलाल निखंजराजकुमारी लाजवंती-
सचिन तेंदुलकर24 अप्रैल 1973मुम्बई, महाराष्ट्ररमेश तेंदुलकररजनी तेंदुलकर-

महात्मा गाँधी –

भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 ई. को गुजरात के काठियावाड़ जिले के पोरबंदर नामक स्थान पर हुआ। इनका पूरा नाम मोहनदास करमचंद गाँधी था। इनकी माता का नाम पुतलीबाई और पिता का नाम करमचंद गाँधी था। 1883 ई. में गाँधी जी का विवाह कस्तूरबा गाँधी से हुआ। 1891 ई. में इन्होंने बेरिएस्टर की डिग्री प्राप्त की और वकालत की शुरुवात की। ये 1893 ई. में एक भारतीय व्यापारी अब्दुल्ला के मुकदमें की पैरवी करने दक्षिण अफ्रीका चले गए। 1904 ई. में फीनिक्स आश्रम और 1910 ई. में टॉलस्टॉय फार्म की स्थापना की।

9 जनवरी 1915 ई. को भारत में इनकी वापसी हुई। तब ये गोपालकृष्ण गोखले के संपर्क में आए और उन्हें अपना राजनीतिक गुरु बना लिया और भारतीय राजनीति में सक्रिय हो गए। 1916 ई. में अहमदाबाद में साबरमती आश्रम की स्थापना की। 1917 ई. में चम्पारण सत्याग्रह किया। 1918 ई. में अहमदाबाद मिल मजदूर आंदोलन, व खेड़ा सत्याग्रह किया। 1919 से 1922 तक खिलाफत आंदोलन किया। 1920 से 1922 तक असहयोग आंदोलन किया। 30 जनवरी 1948 ई. को नाथूराम गोड़से ने गोली मारकर इनकी हत्या कर दी।

इनके जन्म दिवस पर दुनिया भर में अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस मनाया जाता है। रवींद्रनाथ टैगोर ने इन्हें महात्मा कहकर पुकारा। सुभाषचंद्र बोस ने इन्हें राष्ट्रपिता कहा। जवाहर लाल नेहरू ने इन्हें बापू कहा।

भीमराव अम्बेडकर –

भारतीय संविधान के जनक एवं भारत के महान दार्शनिक, लेखक, पत्रकार, राजनीतिज्ञ, अर्थशास्त्री, विधि विशेषज्ञ एवं महान बुद्धिजीवी भीमराव अम्बेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 ई. को मऊ (मध्यप्रदेश, ब्रिटिश भारत) में हुआ था। इनके पिता का नाम रामजी मालोजी सकपाल और माता का नाम भीमाबाई मुरबादकर था। इन्हें बचपन से ही समाज में बेहद भेदभाव का सामना करना पड़ा। इनकी प्रारंभिक शिक्षा भी बहुत भेदभाव के साथ संपन्न हुई। इन्होंने कोलंबिया विश्वविद्यालय से पी.एच.डी. की डिग्री प्राप्त की। ये विदेश जाकर अर्थशास्त्र में डाक्ट्रेट करने वाले प्रथम भारतीय हैं। शिक्षा प्राप्ति के बाद इन्होंने शिक्षण औऱ वकालत का कार्य किया।

इन्होंने समाज में दलितों की सामाजिक दशा को सुधारने के लिए अथक प्रयास किये। समाज में व्याप्त भेदभाव को मिटाने के अथक प्रयासों के बावजूद 14 अक्टूबर 1956 ई. को इन्होनें बौद्ध धर्म अपना लिया। 6 दिसंबर 1956 ई. को इनकी मृत्यु हो गई। मुम्बई में चैत्युभूमि इनका समाधि स्थल है। 1990 ई. में इन्हें भारत के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार भारतरत्न से सम्मानित किया गया। ये भारतीय संविधान निर्माता संविधान की प्रारूप समिति के अध्यक्ष थे।

अब्दुल कलाम –

महान वैज्ञानिक एवं भारत के पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का जन्म 15 अक्टूबर 1931 ई. को तमिलनाडु के रामेश्वरम में हुआ था। बहुमुखी प्रतिभा के धनी अब्दुल कलाम एक शिक्षक, वैज्ञानिक, लेखक, इंजीनियर व राष्ट्रपति थे। इन्हें स्वदेशी तकनीक से पृथ्वी व अग्नि मिसाइलों को विकसित के लिए जाना जाता है। 25 जुलाई 2002 को ये भारत के 11वे राष्ट्रपति बने और 25 जुलाई 2007 तक पद पर कार्य किया। 1997 ई. में इन्हें भारतरत्न से सम्मानित किया गया। 22 जुलाई 2015 को मेघालय के शिलांग आईआईएम में इनका निधन हो गया।

कबीर दास –

भारत के महान कवि, आलोचक एवं समाज सुधारक कबीर दास जी का जन्म 1398 ई. में काशी में हुआ था। इनका जन्म एक विधवा ब्रह्मण स्त्री के गर्भ से हुआ था। अतः लोकलाज के भय से वह इन्हें वाराणसी के लहरतारा नामक स्थान पर छोड़ आयी। वहाँ से नीरू व नीमा नामक जुलाहा दम्पत्ति नें इन्हें उठाया और इनका पालन पोषण किया। ये तात्कालिक समाज मे व्याप्त धार्मिक आडम्बर के परम विरोधी थे। इनकी कविताएं इन्हीं आडंबरों पर चोट थीं। इस महान कवि की मृत्यु 1518 ई. में मगहर में हो गई।

जवाहरलाल नेहरू –

स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री एवं स्वतंत्रता सेनानी जवाहर लाल नेहरू का जन्म 14 नवंबर 1889 ई. को इलाहाबाद में हुआ था। इनके जन्म दिवस को हर साल बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है। इनके पिता का नाम मोतीलाल नेहरू और माता का नाम स्वरूप रानी नेहरू था। इन्होंने अपनी कॉलेज की शिक्षा ट्रिनिटी कॉलेज, कैम्ब्रिज (लंदन) से पूरी की। शिक्षा पूर्ण करने के बाद 1912 ई. में इन्होंने वकालत के तौर पर करियर की शुरुवात की। 1916 ई. में इनका विवाह कमला नेहरू से हुआ। इनकी एकमात्र संतान इंदिरा गाँधी थीं।

ये अपने राजनीतिक जीवन में कुल 9 बार जेल गए। 1919 ई. में ये गाँधी जी के संपर्क में आए। 1920 ई. में असहयोग आंदोलन में हिस्सा लिया। 1929 ई. में कांग्रेस के लाहौर अधिवेशक के अध्यक्ष बने। 1942 ई. के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान इन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और 1945 ई. में छोड़ा गया। 1944 ई. में इन्होंने ‘Discovery of India’ नामक पुस्तक लिखी। 15 अगस्त 1947 ई. को भारत आजाद होने के साथ ये भारत के प्रथम प्रधानमंत्री बने और मृत्युपर्यंत ये इस पद पर रहे। 27 मई 1964 ई. को नई दिल्ली में अपने कार्यालय में दिल का दौरा पड़ने से इनका निधन हो गया। प्रधानमंत्री के रूप में इनका कार्यकाल अब तक सबसे लम्बा (16 साल 9 माह 13 दिन) रहा।

महात्मा ज्योतिबा फुले –

भारत के महान समाज सुधारक, कवि, लेखक, दार्शनिक, विचारक व क्रांतिकारी ज्योतिबा फुले का जन्म 11 अप्रैल 1827 ई. को तात्कालिक ब्रिटिश भारत के खानवाडी (पुणे, बम्बई प्रेसिडेंसी) में हुआ था। इनके पिता का नाम गोविंदराव और माता का नाम चिमनाबाई था। इनके परिवार में फूलों का काम होता था जिस कारण इनका नाम फुले पड़ा। 1840 ई. में इनका विवाह साबित्री बाई फुले से हुआ। इन्होंने दलितों व महिलाओं के उत्थान के लिए अनेक कार्य किये। 24 सितंबर 1873 ई. को इन्होंने सत्यशोधक समाज की स्थापना की। इन्होंने बाल विवाह का विरोध एवं विधवा विवाह का समर्थन किया। इनकी पुस्तक गुलामगिरी (1873) बहुत लोकप्रिय हुई। 11 मई 1888 को विट्ठलराव कृष्णाजी वंडेकर ने इन्हें महात्मा की उपाधि दी। 28 नवंबर 1890 ई. को पुणे में इनका निधन हो गया।

अटल बिहारी बाजपेयी –

एक कवि, विचारक राजनीतिज्ञ एवं भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी का जन्म 25 दिसंबर 1924 को मध्यप्रदेश के ग्वालियर में हुआ था। इनके पिता का नाम श्रीकृष्ण बाजपेयी और माता का नाम श्रीमती कृष्णादेवी था। ये आजीवन अविवाहित रहे। आजादी के बाद इन्होंने पहला लोकसभा चुनाव 1955 ई. में लड़ा परंतु सफलता नहीं मिली। फिर 1957 ई. में बलरामपुर (गोंडा, उत्तर प्रदेश) से जनसंघ पार्टी के टिकट पर जीत मिली। ये 16 मई 1996 को पहली बार भारत के प्रधानमंत्री बने। भारत सरकार द्वारा इन्हें 2014 में भारतरत्न से सम्मानित किया गया। 16 अगस्त 2018 का इनका निधन हो गया। भारत सरकार ने 25 दिसंबर को सुशासन दिवस मनाने की घोषणा की।

इंदिरा गाँधी –

भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी का जन्म 19 नवंबर 1917 ई. को इलाहाबाद (ब्रिटिश भारत) में हुआ था। ये अपनी माता कमला नेहरू व पिता जवाहर लाल नेहरू की इकलौती संतान थीं। 24 जनवरी 1966 को भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं और 24 मार्च 1977 तक इस पद पर रहीं। 31 अक्टूबर 1984 ई. को इनकी हत्या कर दी गई।

भगत सिंह –

भारत के महान क्रांतिकारी भगत सिंह का जन्म 1907 ई. में पंजाब के लायलपुर गाँव में हुआ था। इनके पिता का नाम सरदार किशन सिंह था। भगतसिंह बचपन से ही क्रांतिकारी विचारों वाले थे। बहुत कम उम्र में ही इन्होंने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध कमर कस ली। ये हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी के सदस्य थे। इन्होंने पुलिस अधिकारी सांडर्स की गोली मारकर हत्या कर दी। ब्रिटिश सरकार ने 23 मार्च 1931 को भगतसिंह को फाँसी दे दी।

चंद्रशेखर आजाद –

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अपनी जीवन न्यौछावर कर देने वाले भारत के महान स्वतंत्रता सेनानी चंद्रशेखर आजाद का जन्म 23 जुलाई 1906 ई. को भाबरा, झाबुआ (मध्यप्रदेश) में हुआ था। ये बहुत कम उम्र में ही देश की आजादी की लड़ाई में जुट गए। इन्होंने पहली बार सक्रिय रूप से अपनी भूमिका काकोरी कांड (1925) में निभाई। इसके बाद 1928 ई. में इन्होंने लाहौर में ब्रिटिश ऑफिसर एस.पी. साण्डर्स की गोली मारकर हत्या की। 27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में अंग्रेजों से हुई मुठभेड़ में ये बुरी तरह घायल हो गए और अपनी पिस्तौल से खुद को गोली मार ली। वो पिस्तौल अंग्रेज अपने साथ ले जाकर वहाँ के म्यूजियम में रखी। लेकि भारत सरकार के प्रयासों के बाद उसे बापस भारत लाकर इलाहाबाद के म्यूजियम में रखा गया है।

सुभाष चन्द्र बोस –

भारत के महान क्रांतिकारी नेताजी सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 ई. को कटक, ओडिशा में हुआ था। इनके पिता का नाम जानकीनाथ बोस और माता का नाम प्रभावती था। सुभाष अपने माता पिता की 14 संतानों में 9वें थे। इनका पिता बंगाल विधानसभा के सदस्य भी रहे थे। सेना में भर्ती होने के लिए इन्होंने 49वीं नेटिव बंगाल रेजिमेंट के लिए परीक्षा भी दी थी। परंतु इनकी आँखें कमजोर होने के कारण इन्हें अयोग्य घोषित कर दिया गया था। इन्होंने स्वाध्याय से 1920 ई. में IAS की परीक्षा चौथी रैंक से पास की। 22 अप्रैल 1921 ई. को पद त्याग दिया।

जून 1921 में ये भारत बापस आए। रवींद्रनाथ टैगोर की सलाह पर ये 20 जुलाई 1921 ई. को पहली बार महात्मा गाँधी से मिले। 1938 ई. में ये कांग्रेस के हरिपुरा अधिवेशन में निर्विरोध अध्यक्ष चुने गए। 1939 ई. में त्रिपुरी अधिवेशन में गाँधी समर्थित पट्टाभिसीतारमैया को हराकर दूसरी बार कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए। परंतु कार्यकारिणी के गठन के प्रस्ताव पर गाँधी जी से विवाद होने पर इन्होंने पद त्याग दिया। 3 मई 1939 ई. को फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना की। 18 अगस्त 1945 को जापान के ताइहोकू हवाई अड्डे के पास इनका विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया। इसमें इनकी मृत्यु हुई या बच गए ये आज तक विवादास्पद है।

स्वामी विवेकानंद –

19वीं सदी के उत्तरार्द्ध हिन्दू धर्म के सबसे महान दार्शनिक स्वामी विवेकानन्द जी का जन्म 12 जनवरी 1863 ई. को कलकत्ता के एक संपन्न कायस्थ परिवार में हुआ था। इनके पिता विश्वनाथ दत्त हाई कोर्ट के वकील थे। इनकी माता का नाम भुवनेश्वरी देवी था। ये स्वामी रामकृष्ण परमहंस के शिष्य थे। इनके बचपन का नाम नरेंद्र नाथ दत्त था। विवेकानंद ने सितंबर 1983 में शिकागो में आयोजित विश्व धर्म सम्मेलन में भारत की ओर से हिस्सा लिया। 4 जुलाई 1902 ई. को 39 वर्ष की अवस्था में इनका निधन हो गया। इनके जन्म दिवस पर हर साल युवा दिवस मनाया जाता है।

गौतम बुद्ध –

बौद्ध धर्म के संस्थापक महात्मा बुद्ध का जन्म 563 ई. पू. लूम्बिनी (रुम्मिनदेई) में हुआ था। इनकी माता का नाम महामाया और पिता का नाम शुद्धोदन था। गौतम बुद्ध के बचपन का नाम सिद्धार्थ था। इनकी पत्नी का नाम यशोधरा था और पुत्र का नाम राहुल था। 29 वर्ष की अवस्था में इन्होंने घर त्याग (महाभिनिष्क्रमण) दिया। निरंजना नदी के तट पर उरुबेला नामक स्थान पर इन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई। इन्होंने अपना पहला उपदेश ऋषिपट्टनम के मृगदाव में दिया। प्रथम वर्षावास सारनाथ के मूलगंधकुटी विहार में किया। इनकी मृत्यु (महापरिनिर्वाण) 483 ई.पू. कुशीनारा (कुशीगनर) में हुई।

महावीर स्वामी –

जैन धर्म के 24वें तीर्थांकर महावीर स्वामी का जन्म 599 ई. पू. कुण्डग्राम (वासुकुण्ड) में हुआ था। इनके पिता का नाम सिद्धार्थ और माता का नाम त्रिशला देवी था। इनके बचपन का नाम वर्धमान था। इनकी पत्नी का नाम यशोदा एवं बहन का नाम सुदर्शना था। 30 वर्ष की अवस्था में अपने बड़े भाई नंदिवर्धन की आज्ञा लेकर इन्होंने गृह त्याग दिया। इन्हें 42 वर्ष की अवस्था में ऋजुपालिका नदी के तट पर शाल वृक्ष के नीचे ज्ञान की प्राप्त हुई। इन्होंने अपना पहला शिष्य जमालि को बनाया। गौतम स्वामी इनका पहला गणधर था। महावीर स्वामी की मृत्यु 527 ई.पू. पावापुरी में हो गई।

बालगंगाधर तिलक –

भारतीय राष्ट्री कांग्रेस में गरम दल के नेता बालगंगाधर तिलक का जन्म 23 जुलाई 1856 ई. को चिखली गाँव, रत्नागिरी (महाराष्ट्र) में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम गंगाधर रामचंद्र तिलक था। इन्होंने 1776 ई. में डेक्कन से बी.ए. (ऑनर्स) की और 1879 ई. में बॉम्बे विश्वविद्यालय से एल.एल.बी. की परीक्षा उत्तीर्ण की। 1881 ई. में इन्होंने मराठा (अंग्रेजी में) और केसरी (मराठी में) नामक दो दैनिक पत्रों की शुरुवात की। 1890 ई. में ये कांग्रेस में शामिल हो गए। 1908 ई. में इन्हें 6 साल की सजा के लिए मांडले जेल (बर्मा) भेज दिया गया। यहीं पर इन्होंने गीतारहस्य नामक पुस्तक लिखी। 1916 ई. में इन्होंने होमरूप लीग की स्थापना की। 1 अगस्त 1920 को बम्बई में इनका निधन हो गया। नहरू जी ने इन्हें भारतीय क्रांति का जनक कहा।

लाला लाजपत राय –

पंजाब केसरी के उपनाम से प्रसिद्ध भारत के महान क्रांतिकारी लाला लाजपत राय का जन्म 28 जनवरी 1865 ई. को मोगा, पंजाब में अग्रवाल वैश्य परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम लाला राधाकृष्ण और माता का नाम गुलाब देवी था। ये 1888 ई. में पहली बार कांग्रेस के इलाहाबाद अदिवेशन में शामिल हुए। साइमन कमीशन के विरोध प्रदर्शन में इनके सर में लाठी लगने से ये घायल हो गए। 17 नवंबर 1928 की इनकी मृत्यु हो गई।

मेजर ध्यानचंद –

फिरकी के जादूगर के नाम से प्रसिद्ध भारत के पूर्व हॉकी खिलाड़ी मेजर ध्यानचंद का जन्म 29 अगस्त 1905 को इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश में हुआ था। ये मात्र 16 वर्ष की अवस्था में ही भारतीय सेना में भर्ती हो गए। भारतीय सेना में 34 साल सेवा देने के बाद ये 29 अगस्त 1956 को मेजर के पद पर सेवानिवृत्त हुए। इन्होंने भारतीय हॉकी टीम को एम्सटर्डम ओलंपिक 1928 में स्वर्ण पदक दिलाया। 1956 ई. में भारत सरकार द्वारा इन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया। इन्होंने तीन बर भारत को ओलंपिक में स्वर्ण पदक दिलाया। 3 दिसंबर 1979 ई. को इनकी मृत्यु हो गयी। इनकी जन्मतिथि 29 अगस्त को भारत में राष्ट्रीय खेल दिवस के रूप में मनाया जाता है।

कपिल देव –

भारत के महान क्रिकेटर कपिल देव का जन्म 6 जनवरी 1959 ई. को चंड़ीगढ़ में हुआ था। इन्होंने भारत को पहली बार वनडे क्रिकेट विश्वकप (1983) में जीत दिलाई। तब 1983 में इन्हें विजडन क्रिकेटर ऑफ दे ईयर चुना गया। भारत ने यह खिताब वेस्टेंडीज की टीम को हराकर जीता। इन्होंने अपने क्रिकेट करियर की शुरुवात 1975 ई. में हरियाणा की टीम को ओर से घरेलू मैच में की। 1994 ई. में इन्होंने क्रिकेट से संन्यास ले किया।

सचिन तेंदुलकर –

क्रिकेट के भगवान के रूप में जाने जाने वाले भारतीय क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर का जन्म 24 अप्रैल 1973 ई. को मुम्बई (महाराष्ट्र) में एक मराठी ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम रमेश तेंदुलकर और माता रजनी तेंदुलकर है। इनके पिता रमेश तेंदुलकर एक प्रसिद्ध मराठी उपन्यासकार थे। रमेश ने सचिन का नाम अपने पसंदीदा संगीतकार सचिनदेव बर्मन के नाम पर रखा था। 24 मई 1995 को इनका विवाह अंजलि मेहता से हुआ।

इन्होंने अपने क्रिकेट करियर की शुरुवात 1988 ई. में बॉम्बे की टीम की तरफ से गुजरात के विरुद्ध खेलकर की। इन्होंने अपना पहला टेस्ट मैच कराँची में 15 नवंबर 1989 को खेला। पहला वनडे मैच पाकिस्तान के जिन्ना स्टेडियम में 18 दिसंबर 1989 को खेला। इन्हें 2012 में राज्यसभा सांसद बनाया गया। इन्होंने अपना अंतिम वनडे मैच 18 मार्च 2012 को पाकिस्तान में खेला और 23 दिसंबर 2012 को वनडे मैच से संन्यास की घोषणा की। 14 नवंबर 2013 को अपना अंतिम टेस्ट मैच वेस्टेंडीज के विरुद्ध वानखेड़े स्टेडियम में खेला और क्रिकेट जगत से संन्यास लेने की घोषणा की। संन्यास के दो दिन बाद भारत सरकार ने इन्हें भारतरत्न (2014) से सम्मानित करने की घोषणा की। ये टेस्ट क्रिकेट में 13 हजार रन बनाने वाले पहले क्रिकेटर हैं।

झाँसी की रानी –

झाँसी की राजी लक्ष्मी बाई को भारतीय इतिहास में ‘झाँसी की रानी’ के नाम से जाना जाता है। ये भारतीय क्रांति की महान वीरांगना थीं। रानी लक्ष्मीबाई का जन्म 19 नवंबर 1835 ई. को ब्रिटिश भारत में वाराणसी के भदौनी में हुआ था। इनके बचपन का नाम मणिकर्णिका था, इन्हें प्यार से मनु कहकर पुकारते थे। इनके पिता का नाम मोरोपंत और माता का नाम भागीरथी बाई था। 1842 ई. में मात्र सात वर्ष की अवस्था में इनका विवाह झाँसी नरेश गंगाधर राव से हुआ। तब झाँसी की रानी बनने के बाद इनका नाम लक्ष्मीबाई पड़ा। 1851 ई. में मात्र 16 वर्ष की अवस्था में इन्होंने एक पुत्र को जन्म दिया। 4 माह बाद उस पुत्र की मृत्यु हो गई।

21 नवंबर 1853 ई. को गंगाधर राव की मृत्यु हो गई। तब जनरल डॉयर ने गंगाधर राव के दत्तक पुत्र दामोदर राव को गोद निषेध सिद्धांत के आधार पर झांसी का राजा स्वीकार न कर झाँसी को 7 मार्च 1854 ई. को ब्रिट्श साम्राज्य में मिला लिया। तब रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ाई छेड़ दी। अंग्रेजों से लड़ते हुए 18 जून 1858 ई. को ग्वालियर में मात्र 23 वर्ष की अवस्था में इन्हें वीरगति प्राप्त हुई। इनकी समाधि ग्वालियर के फूलबाग में बनी हुई है। सुभद्रा कुमारी चौहन ने इन पर कविता ‘खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी’ लिखी।

रामधारी सिंह ‘दिनकर’

भारत के महान कवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का जन्म 1908 ई. में सिमरिया (मुंगेर, बिहार) में हुआ था। राष्ट्रीय धारा के कवियों में इनका महत्वपूर्ण स्थान है। विचारों की गहराई व प्रगतिशीलता इनके लेखन की विशेषता है। दिनकर जी पद्य के साथ गत्य में भी रचना करते थे। कुरुक्षेत्र, रश्मिरथी, उर्वशी, रेणुका, हुंकार इत्यादि दिनकर जी की प्रमुख पुस्तकें हैं। संस्कृत के चार अध्याय, काव्य की भूमिका, और मिट्टी की ओर दिनकर जी की गद्य रचनाएं हैं। दिनकर जी का निधन 1974 ई. में हो गया।

मुंशी प्रेमचन्द –

कहानी व उपन्यास सम्राट के रूप मे प्रसिद्ध मुंशी प्रेमचन्द का जन्म 1880 ई. में लमही (वाराणसी, उत्तर प्रदेश) में हुआ था। गबन, गोदान, कर्मभूमि, रंगभूमि, निर्मला, सेवासदन इत्यादि प्रेमचन्द के प्रमुख उपन्यास है। ‘मानसरोवर’ प्रेमचन्द की कहानियों का संग्रह है, जो कि आठ भागों में प्रकाशित है। मुंशी प्रेमचन्द की मुत्यु 1936 ई. में हो गई।

सुमित्रा नन्दन पंत –

प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रा नन्दन पंत का जन्म 20 मई 1900 ई. को अल्मोड़ा के कौसानी में हुआ था। इन्होंने ग्राम की ही पाठशाला में प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की। इनकी साहित्यिक सेवा के लिए भारत सरकार द्वारा इन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। चिदम्बरा, वीणा, पल्लव, गुंजन, ग्रंथि इत्यादि इनकी प्रमुख रचनाएं हैं। सुमित्रानन्दन पन्त की मृत्यु 28 दिसंबर 1977 को हो गई।

रहीम दास –

भारत के महान कवि रहीम दास का जन्म 1556 ई. में हुआ था। इनका पूरा नाम अब्दुर्रमीम खान खाना था। ये मुगल बादशाह अकबर के संरक्षक बैरम खाँ के पुत्र थे। ये अकबर के दरबार के नवरत्नों में से एक थे। इन्हें हिन्दी, संस्कृति, अरबी, फारसी इत्यादि भाषाओं का अच्छा ज्ञान था। 1626 ई. में रहीमदास की मृत्यु हो गई।

बंगाल विभाजन – Partition of Bengal

बंगाल विभाजन – Partition of Bengal

  • विभाजन का निर्णय – 20 जुलाई 1905
  • विरोध में आंदोलन प्रारंभ – 7 अगस्त 1905
  • विभाजन प्रभावी – 16 अक्टूबर
  • कारण – प्रशासनिक असुविधा
  • विभाजन रद्द – 1911 (लार्ड हार्डिंग द्वितीय)

बंगाल विभाजन –

यह विभाजन भारतीय इतिहास की महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक है। यह लार्ड कर्जन का सबसे घृणित कार्य था। विभाजन के वक्त बंगाल की जनसंख्या 7 करोड़ 85 लाख थी। उस समय का बंगाल आधुनिक बंगाल से कहीं विस्तृत था। तब बंगाल के अंतर्गत प. बंगाल, बिहार, ओडिशा व बांग्लादेश भी शामिल थे। इतने बड़े प्रांत को एक लेफ्टिनेंट गवर्नर प्रशासन देने में असमर्थ था। तात्कालिक गवर्नर जनरल ने बंगाल विभान का प्रमुख कारण ‘प्रशासनिक असुविधा’ को बताया। परंतु वास्तविक कारण प्रशासनिक न होकर राजनीतिक था। इसकी जानकारी तात्कालिक राज्य सचिव रिजले के 1904 ई. में कर्जन को लिखे गए उस खत से मिलती है, जिसमें उसने लिखा था ‘संयुक्त बंगाल एक शक्ति है, विभाजित बंगाल की दिशाएं अलग-अलग होंगी’। उस वक्त का बंगाल राष्ट्रीय चेतना का केंद्र बिन्दु था। अतः कर्जन ने बंगालियों की राजनीतिक चेतना को छिन्न-भिन्न करने का यह तरीका अपनाया।

बंगाल को हिन्दू व मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र में विभाजित कर उन्हें आपस में लड़ाने की नीति अपनाई। दिसंबर 1903 में बंगाल विभाजन की खबर फैलने पर चारो ओर विरोधस्वरूप अनेक बैठकें हुईं। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, कृष्णकुमार मित्र, पृथ्वीशचन्द्र राय आदि नेताओं ने अखबारों के माध्यम से विभाजन के प्रस्ताव की आलोचना की। भारी विरोध के बावजूद कर्जन ने 20 जुलाई 1905 को कलकत्ता में बंगाल विभाजन की घोषणा की। परिणामस्वरूप 7 अगस्त 1905 ई. को कलकत्ता के टाउन हॉल में स्वदेशी आंदोलन की घोषणा की गई। इसी बैठक में ऐतिहासिक बहिष्कार प्रस्ताव पारित हुआ।

स्वदेशी आन्दोलन –

16 अक्टूबर 1905 को बंगाल विभाजन प्रभावी हो गया। संपूर्ण भारत में इस दिन को शोक दिवस के रूप में मनाया गया। विभाजन के बाद बंगाल प्रेसिडेंसी को पूर्वी बंगाल व पश्चिमी बंगाल के रूप में विभाजित कर दिया गया। रवींद्र नाथ टौगोर के सुझाव पर संपूर्ण बंगाल में इस दिन राखी दिवस के रूप में मनाया गया। इसका उद्देश्य यह प्रदर्शित करना था कि विभाजन के बाद भी अंग्रेज इसकी एकता में दरार नहीं डाल पाए। अगले ही दिन सुरेन्द्रनाथ बनर्जी और आनन्द मोहन बोस ने दो विशाल जनसभाओं को संबोधित किया। देखते ही देखते कुछ ही घंटों में आन्दोलन के लिए 50 हजार रुपये इकट्ठे हो गए। स्वदेशी व बहिष्कार आंदोलन का संदेश पूरे देश में फैल गया।

इस आंदोलन को सर्वाधिक सफलता विदेशी माल के बहिष्कार आंदोलन से मिली। इसके तहत औरतों ने विदेशी चूडियां पहनना व विदेशी वर्तनों का प्रयोग करना बंद कर दिया। धोबियों ने विदेशी कपड़े धोना बंद कर दिया। यहाँ तक कि महंतों ने विदशी चीनी से बने प्रसाद तक को लेने से मना कर दिया। इस आंदोलन ने आत्मनिर्भर और आत्मशक्ति का नारा दिया। स्वदेशी माल की आपूर्ति के लिए स्वदेशी स्टोर खोले गए। आचार्य प्रफुल्ल चंद्र राय ने बंगाल केमिकल स्वदेशी स्टोर्स खोला। बंगाल के छात्रों की इस आंदोलन में मुख्य भूमिका रही।

पूर्वी बंगाल –

तब पूर्वी बंगाल का क्षेत्रफल 1,06,540 वर्ग किलोमीटर था। पूर्वी बंगाल की जनसंख्या 3 करोड़ 10 लाख थी, जिनमें 1 करोड़ 80 लाख मुसलमान और 1 करोड़ 20 लाख हिन्दू थे। ढाका को पूर्वी बंगाल का मुख्यालय बनाया गया।

पश्चिम बंगाल

बंगाल विभाजन के बाद तात्कालिक पश्चिम बंगाल में वर्तमान बिहार व ओडिशा राज्य भी सम्मिलित थे। इसकी जनसंख्या 5 करोड़ 40 लाख थी। जिनमें 4 करोड़ 50 लाख हिन्दू और 90 लाख मुसलमान थे। तब पश्चिम बंगाल का क्षेत्रफल 1,41,580 वर्ग किलोमीटर था।

बंगाल विभाजन के विरोध में हुए आंदोलन का प्रचार व नेतृत्व –

  • दिल्ली – सैयद हैदर खाँ
  • महाराष्ट्र – तिलक व उनकी पुत्री केतकर
  • पंजाब व उत्तर प्रदेश – लाला लाजपत राय, स्वामी श्रद्धानंद, अजीत सिंह, जयपाल, गंगाराम
  • मद्रास – चिदम्बरम पिल्लई, सुब्रमण्यम अय्यर, आनन्द चारलू, टी. एम. नायक

स्वदेश बान्धव समिति –

यह बंगाल विभाजन के विरोध में गठित सबसे महत्वपूर्ण संगठन था। इसका गठन वारिसाल के एक अध्यापक अश्विनी कुमार दत्त ने किया था। इस संगठन की देश भर में 159 शाखाएं फैली हुई थीं।

कार्लाइल सर्कुलर –

इस आंदोलन में छात्रों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। जिसके चलते सरकार ने कार्लाइल सर्कुलर जारी किया। इसके तहत बंगाल सरकार ने कार्यवाहक मुख्य सचिव कार्लाइल ने कलेक्टरों के पास पत्र भेजा कि वे कॉलेजों से कहें कि वे छात्रों को आंदोलन में भाग न लेने दें, अन्यथा उनकी सरकारी सहायता रोक दी जाएगी। विश्वविद्यालयों से कहा गया कि वे ऐसी संस्थाओं की मान्यता बापस लें। अन्यथा उसकी सरकारी सहायता बापस ले  जी जाएगी। कार्लाइल के इसी पत्र को कार्लाइल सर्कुलर के नाम से जाना गया। सरकार के इस प्रकार के दमन का मुकाबला करने के लिए एण्टी सर्कुलर सोसाइटी की स्थापना की गई। छात्र नेता सचीन्द्र प्रसाद बसु को चुना गया। बंगाल में शिक्षा फैलाने में सबसे बड़ा कार्य डान सोसाइटी का था। यह विद्यार्थियों का संगठन था जिसके सचिव सतीश चन्द्र मुखर्जी थे।

राष्ट्रीय शिक्षा की ओर कदम –

राष्ट्रीय शिक्षा के क्षेत्र में सर्वप्रथम 8 नवंबर 1905 ई. को रंगपुर नेशनल स्कूल की स्थापना की गई। 16 नवंबर 1905 को कलकत्ता में एक सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस सम्मेलन में राष्ट्रीय नियंत्रण में राष्ट्रीय साहित्यिक, वैज्ञानिक और तकनीकी शिक्षा देने के लिए राष्ट्रीय शिक्षा परिषद स्थापित करने का फैसला लिया गया। टैगोर के शांति निकेतन की तर्ज पर 14 अगस्त 1906 ई. को ‘बंगाल नेशनल कॉलेज और स्कूल’ की स्थापना की गई। इसका प्रधानाचार्य ‘अरविंद घोष’ को नियुक्त किया गया। इसके बाद 15 अगस्त 1906 ई. को ‘सदगुरु दास बनर्जी’ ने राष्ट्रीय शिक्षा परिषद की स्थापना की।

स्वदेशी आंदोलन का सांस्कृतिक क्षेत्र पर प्रभाव –

इस आंदोलन का सबसे अधिक प्रभाव सांस्कृतिक क्षेत्र पर पड़ा। बंगाल साहित्य के लिए यह स्वर्णकाल था। बंगाली कवियों के गीत आंदोलनकारियों के लिए प्रेरणा स्त्रोत बने। आंदोलन को तेज करने के लिए रवींद्रनाथ टैगोर ने प्रेरणा स्त्रोत ‘आमार सोनार बंगला’ की रचना की। इसे 1971 ई. में बांग्लादेश ने अपना राष्ट्रगीत बनाया।

स्वदेशी आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी –

इस आंदोलन की यह भी एक विशेषता थी कि स्वदेशी आंदोलन में महिलाओं ने सक्रिय रूप से भाग लिया। पहली बार औरतों ने घर की दहलीज को लांघकर प्रदर्शन में भाग लिया और धरने पर बैठीं।

स्वदेशी आंदोलन में किसानों की भूमिका –

लेकिन यह आंदोलन बंगाल के किसानों को प्रभावित नहीं कर सिका। केवल वारिसाल ही इसका अपवाद था।

यह आंदोलन मुख्य रूप से शहरों के उच्च व मध्यम वर्ग तक ही सीमित था। बहुसंख्यक मुसलमानों, विशेषकर खेतिहर मुसलमानों ने इसमें भाग नहीं लिया। उस वक्त बंगाल के अधिकतर भूस्वामी हिन्दू थे और मुसलमान खेतिहर मजदूर थे। अंग्रेजों ने ढाका के नवाब सलीमुल्ला का इस्तेमाल स्वदेशी आन्दोलन के विरोधी के रूप में किया।

बनारस अधिवेशन (1905) –

1905 ई. के कांग्रेस के बनारस अधिवेशन की अध्यक्षता ‘गोपाल कृष्ण गोखले’ ने की। इन्होंने स्वदेशी एवं बहिष्कार आंदोलन का समर्थन किया। इस अधिवेशन में पहला मतभेद ‘प्रिंस ऑफ वेल्स’ के स्वागत प्रस्ताव पर हुआ। नरमपंथी प्रिंस ऑफ वेल्स का स्वागत करना चाहते थे, वहीं राष्ट्रवादियों ने इसका विरोध किया। फिर भी यह प्रस्ताव पारित हो गया। लाला लाजपत राय ने अपने भाषण में सत्याग्रह को अपनाने का सुझाव दिया। इस प्रकार का सुझाव कांग्रेस के मंच से पहली बार दिया गया।

कलकत्ता अधिवेशन 1906 –

1906 ई. में हुए कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन की अध्यक्षता दादाभाई नौरोजी ने की। यहीं पर पहली बार दादाभाई नौरोजी द्वारा स्वदेश की मांग प्रस्तुत की गई। अब तक कांग्रेस में उग्रवादी नेताओं की पकड़ मजबूत हो चुकी थी। जहाँ एक ओर उग्रवादी नेता हिंसा का समर्थन करते थे, वहीं दूसरी ओर उदारवादी नेता हिंसा के विरोध में थे। तिलक ने लाला लाजपत राय को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाने का सुझाव दिया। परंतु राष्ट्रवादियों को कांग्रेस के अध्यक्ष पद से दूर रखने के लिए नरमपंथियों ने वयोवृद्ध नेता दादाभाई नौरोजी को अध्यक्ष बना दिया। तो राष्ट्रवादियों ने इसका विरोध करना उचित नहीं समझा। इसी अधिवेशन के दौरान दोनों विचारधाराओं के नेताओं में मतभेद सामने आया। परंतु दादाभाई नौरोजी के प्रयास से यह मतभेद दबा दिया गया।

उदारवादी और उग्रवादी विचारधारा के नेताओं के बीच यह विवाद स्वदेशी आंदोलन के चलाने के तरीके को लेकर था। परिणामस्वरूप सूरत अधिवेशन में उग्रवादी नेता कांग्रेस से अलग हो गए।

सूरत अधिवेशन (1907) –

यह अधिवेशन पहले नागपुर में होने को था। इसमें कांग्रेस गरम दल और नरम दल में बंट गई। गर्म दल में बालगंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और बिपिन चंद्रपाल जैसे नेता थे।

स्वदेशी आंदोलन का परिणाम –

बंगाल विभाजन के विरोध में शुरु हुआ स्वदेशी आंदोलन अपने तत्कालीन लक्ष्य की प्राप्ति में असफल रहा। क्योंकि इस अवसर पर बंगाल के विभाजन को रद्द नहीं किया गया। परंतु आंदोलन के दूरगामी लाभ अवश्य मिले। इस आंदोलन के परिणामस्वरूप विदेश वस्तुओं के आयात में कमी आयी। भारतीय उद्योगों को प्रोत्साहन मिला। 1907 व 1908 के बीच आंदोलन के सभी बड़े नेता गिरफ्तार या निर्वासित कर दिये गए। इस प्रकार यह आंदोलन नेतृत्वविहीन हो गया। जब सरकार ने इस आंदोलन का दमन करने का प्रयत्न किया, तब उसके परिणामस्वरूप उग्र राष्ट्रीयता का उदय हुआ।

अरुण्डेल कमेटी –

तत्कालीन वायसराय लॉर्ड मिण्टो द्वितीय ने राजनीतिक सुधारों के विषय में सलाह देने हेतु अगस्त 1906 ई. में अरुण्डेल कमेटी का गठन किया। इस कमेटी ने विभाजित बंगाल को पुनः संयुक्त करने की आवश्यकता पर बल दिया। इसके फलस्वरूप बंगाल सरकार ने विवश होकर 1911 ई. में बंगाल विभाजन को रद्द कर दिया।

बंगाल विभाजन रद्द –

दिसंबर 1911 ई. में ब्रिटिश सम्राट जॉर्ज पंचम का दिल्ली में आगमन हुआ। 12 दिसंबर 1911 को दिल्ली दरबार का आयोजन किया गया। यहाँ पर वायसराय लॉर्ड हार्डिंग द्वितीय ने सम्राट की ओर से बंगाल विभाजन को रद्द किये जाने की घोषणा की। साथ ही भारत की राजधानी कलकत्ता के स्थान पर दिल्ली बनाने की भी घोषणा की गई।

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