भारतीय राजव्यवस्था पाठ्यक्रम (Indian Polity Syllabus)

भारतीय राजव्यवस्था पाठ्यक्रम (Indian Polity Syllabus) के अंतर्गत आने वाले प्रमुख शीर्षक –

Map of India भारतीय राजव्यवस्था

  • भारत का संवैधानिक विकास
  • भारतीय संविधान के विदेशी स्त्रोत व उनका प्रभाव
  • संविधान के अनुच्छेद व अनुसूचियां
  • उद्देशिका
  • शासन प्रणाली
  • राष्ट्रीय प्रतीक
  • भारत के राज्य व केंद्रशासित प्रदेश
  • नागरिकता
  • मूल अधिकार
  • राज्य के नीति निदेशक तत्व
  • मूल कर्तव्य
  • राष्ट्रपति
  • उप-राष्ट्रपति
  • केंद्रीय मंत्रिपरिषद्
  • महान्यायवादी और सीएजी
  • वरीयता अनुक्रम
  • भारतीय संसद
  • सर्वोच्च न्यायालय
  • राज्यपाल
  • राज्य विधानमण्डल
  • उच्च न्यायालय
  • केंद्र-राज्य संबंध
  • आपात उपबंध
  • वित्त आयोग
  • योजना आयोग
  • लोकपाल और महत्वूर्ण आयोग
  • अस्थाई विशेष प्रावधान
  • चुनाव आयोग
  • राजनीतिक दल
  • संविधान संशोधन
  • राजभाषा
  • पंचायती राज व सामुदायिक विकास
  • कुछ वर्गों के लिए विशेष उपबंध

भारत का संवैधानिक विकास –

भारतीय संविधान के निर्माण से पूर्व ब्रिटिश सरकार द्वारा समय-समय पर विभिन्न अधिनियम पारित किये गए –

1773 का रेग्यूलेटिंग एक्ट –

अंग्रेजों ने 1773 के रेगुलेटिंग एक्ट के तहत 1774 ई. में कलकत्ता में एक सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना की। इसका पहला मुख्य न्यायाधीश सर एलिजा एम्पे को बनाया गया। इनके अतिरिक्त तीन अन्य न्यायाधीशों की भी नियुक्ति की गई। ये तीन न्यायाधीश चैम्बर्स, हाइड, व लिमैस्टर थे। न्यायाधीशों की नियुक्ति ब्रिटिश सम्राट द्वारा की जाती थी। इस न्यायालय को सिविल, धार्मिक, नौसेना व आपराधिक मामलों में निर्णय देने का अधिकार था।

रेग्यूलेटिंग एक्ट के प्रवर्तन में आने के बाद इसके कुछ उपबन्ध अत्यन्त विनाशकारी सिद्ध हुए। इन उपबन्धों के संदिग्ध होने के कारण सर्वोच्च न्यायालय व सर्वोच्च परिषद के बीच विवाद अत्यधिक बढ़ गया। 1781 ई. में ब्रिटिश संसद ने दो समितियां (प्रवर समिति, व गुप्त समिति) नियुक्त कीं। भारत में न्याय व्यवस्था, उच्चतम न्यायालय, व सर्वोच्च परिषद के संबंधों की जांच का कार्य प्रवर समिति को सौंपा। प्रवर समिति का अध्यक्ष एडमंड बर्क को बनाया गया। समिति ने उसी वर्ष अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत कर दिया। फलस्वरूप 1781 में संशोधन अधिनियम पारित हुआ।

संशोधन अधिनियम – 1781

इस अधिनियम को Act of Settlement और बंगाल जूडीकेचर एक्ट 1781 के नाम से भी जाना जाता है। इसका उद्देश्य 1773 के रेग्यूलेटिंग एक्ट में व्याप्त गंभीर व्यावहारिक दोषों को दूर करना है। इसके तहत भारत में सरकार को सहयोग देने, राजस्व के नियमित संकल्प तथा भारतीयों को प्राचीन विधियों तथा परम्पराओं को मान्यता देने पर बल दिया गया। भारतीय राजव्यवस्था ।

फॉक्स का इण्डिया बिल –

इसके अनुसार कंपनी की राजनीतिक व सैन्य शक्ति सात आयुक्तों के एक बोर्ड को सौंपी जानी थी। उनके अधीनस्थ 9 उपनिदेशकों को व्यापारिक कार्य सौंपे जाने थे। यह बिल ‘हाउस ऑफ कामंस’ से तो पारित हो गया। परंतु ‘लाउस ऑफ लॉर्ड्स’ में पारित न हो सका। फलस्वरूप लार्ड नार्थ व फॉक्स की मिलीजुली सरकार गिर गई। यह पहला व अंतिम मौका था जब किसी भारतीय मुद्दे पर अंग्रेजी सरकार गिर गई। भारतीय राजव्यवस्था ।

पिट्स इण्डिया एक्ट 1784

इसके तहत 6 कमिश्नरों के एक बोर्ड का गठन किया गया, जिसे बोर्ड ऑफ कंट्रोल कहा गया। बोर्ड ऑफ कंट्रोल में एक चांसलर ऑफ एक्सचेकर, एक राज्य सचिव, और उसके द्वारा नियुक्त प्रिवी काउंसिक के 4 सदस्य थे। इस बोर्ड के अंतर्गत सभी सैन्य व असैन्य मामलों को रखा गया। बोर्ड की अनुमति के बिना गवर्नर जनरल किसी भारतीय शासक के संघर्ष प्रारंभ नहीं कर सकता। न ही किसी सहायता का आश्वासन देने की अनुमति गवर्नर जनरल को दी गई। बोर्ड का अध्यक्ष ब्रिटिश मंत्रिमण्डल का एक सदस्य होता था।

इस प्रकार ब्रिटिश सरकार ने कंपनी के मामलों व भारतीय प्रशासन पर पूर्ण नियंत्रण कर लिया। गवर्नर जनरल की कार्यकारिणी में भी परिवर्तन किया गया। इसके सदस्यों की संख्या घटाकर तीन कर दी गई। बम्बई व मद्रास की सरकारों इसके अधीन कर दी गईं। एक्ट में घोषणा की गई कि भारत में राज्य विस्तार की नीति ब्रिटिश नीति के विरुद्ध है। भारतीय राजव्यवस्था ।

1786 का एक्ट –

कार्नवालिस गवर्नर जनरल और मुख्य सेनापति दोनों की शक्तियां लेना चाहता था। इस अधिनियम के साथ इसे स्वीकार कर लिया गया। विशेष अवस्था में अपनी परिषद के निर्णयों को रद्द करने व अपने निर्णय को लागू करने का अधिकार भी गवर्नर जनरल को दे दिया गया। भारतीय राजव्यवस्था ।

1793 का चार्टर एक्ट –

इसके तहत कंपनी का कार्यकाल 20 साल के लिए बढ़ा दिया गया। परिषद के निर्णयों को रद्द करने का अधिकार कार्नवालिस को दे दिया गया। साथ ही अगने गवर्नर के लिए भी इन अधिकारों की व्यवस्था कर दी गई। बोर्ड ऑफ कंट्रोल के अधिकारियों का वेतन भारतीय कोष से दिया जाने लगा। भारतीय राजव्यवस्था ।

1813 का चार्टर एक्ट –

कंपनी का अधिकार पुनः 20 वर्षों के लिए बढ़ा दिया गया।

  • कंपनी का भारतीय व्यापार पर एकाधिकार समाप्त कर दिया गया।  हालांकि चाय व चीन के व्यापार पर कंपनी का एकाधिकार बना रहा।
  • ईसाई मिशनरियों को भारत में प्रवेश करने की छूट मिल गई।
  • भारत में आकर बसने व व्यापार करने हेतु आने वाले अंग्रेजों को लाइसेंस लेना अनिवार्य कर दिया।
  • व्यापारिक लेन-देन व राजस्व खाते अब भिन्न-भिन्न रखने होंगे।
  • कंपनी भारत में शिक्षा पर 1 लाख रुपये खर्च करेगी।

1833 का चार्टर एक्ट –

इस एक्ट पर मैकाले व जेम्स मिल का प्रभाव स्पष्ट नजर आता है। इसमें भी पुनः कंपनी के अधिकार को 20 सालों के लिए बढ़ा दिया गया। चार्टर एक्ट 1833 के प्रावधान  निम्नलिखित हैं –

  • चाय व चीन के साथ भी व्यापार के एकाधिकार को समाप्त कर दिया गया।
  • भारत सरकार को दासों की अवस्था सुधारने व अंततः दासता समाप्त करने की आज्ञा दी गई।
  • भारत में प्रशासक का केंद्रीकरण कर दिया गया।
  • इस अधिनियम की सबसे महत्वपूर्ण धारा 87 थी। जिसने जाति, वर्ण के आधार पर सरकारी चयन में भेदभाव को समाप्त किया।
  • बंगाल का गवर्नर जनरल अब भारत का गवर्नर जनरल कहलाने लगा। बम्बई, मद्रा, बंगाल व अन्य प्रदेश गवर्नर के नियंत्रण में आ गए।
  • कानून बनाने की शक्ति का भी केंद्रीकरण कर दिया गया। गवर्नर जनरल और उसकी कार्यकारिणी को भारत के लिए कानून बनाने का अधिकार दिया गया। मद्रास तथा बम्बई की परिषदों की कानून बनाने की शक्ति समाप्त कर दी गई।
  • गवर्नर जनरल की कार्यकारिणी में एक अतिरिक्त कानूनी सदस्य को चौथे सदस्य के रूप में जोड़ा गया। उसे सिर्फ परिषदों की बैठकों में भाग लेने का अधिकार था। परंतु मत देने का अधिकार नहीं था।
  • एक विधि आयोग की नियुक्ति की गई। इसका उद्देश्य भारतीय कानून को संचित व संहिताबद्ध करना व सुधारना था।

1853 का अधिनियम –

इसके तहत ईस्ट इंडिया का शासन समाप्त कर ब्रिटिश क्राउन को सौंप दिया गया। गवर्नर जनरल अब वायसराय कहा जाने लगा। बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स, और बोर्ड ऑफ कंट्रोल के समस्त अधिकार भारत सचिव को सौंप दिए गए। भारत सचिव की सहायतार्थ 15 सदस्यीय भारतीय परिषद गठित की गई। इसके 8 सदस्यों की नियुक्ति ब्रिटिश सरकार द्वारा की जाती थी। 7 सदस्यों की नियुक्ति कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स द्वारा की जाती थी। इनका खर्च भारतीय राजस्व से वहन होता था। भारतीय राजस्व से आकस्मिक कार्यों को छोड़कर भारतीय सीमा के बाहर की गई फौजी कार्यवाही के लिए धन की निकासी बिना भारतीय परिषद की अनुमति के नहीं होगी। भारतीय राजव्यवस्था ।

1858 का अधिनियम –

यह अधिनियम 1857 की क्रांति के बाद ब्रिटिश सरकार द्वारा लाया गया। इसके तहत भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त हो गया। इसके स्थान पर कंपनी की समस्त शक्ति ब्रिटिश क्राउन को सौंप दी गई। गवर्नर जनरल का नाम बदलकर वायसराय कर दिया गया। जो कि बाद में भारत शासन अधिनियम 1935 द्वारा फिर गवर्नर जनरल कर दिया गया। गवर्नर जनरल और वायसराय हालांकि एक ही पद था। परंतु इस पर आसीन व्यक्ति जब ब्रिटिश भारत के राज्यों का प्रशासन संभालता था तब गवर्नर जनरल कहलाता था। जब वह भारतीय राजाओं के समक्ष ब्रिटिश क्राउन का प्रतिनिधित्व करता था तब वायसराय कहलाता था। प्रांतों के गवर्नरों की नियुक्त का अधिकार भी वायसराय को ही दिया गया था। भारतीय राजव्यवस्था ।

1861 का अधिनियम –

इस अधिनियम के तहत ब्रिटिश सरकार ने वायसराय और राज्य के गवर्नरों के अधिकारों को बढ़ा दिया। व्यवस्थापन के कार्य हेतु गवर्नर जनरल को भारतीयों के साथ मिलकर कार्य करने का अधिकार दिया गया। इस अधिनियम के तहत पोर्टफोलियो व्यवस्था का प्रारंभ हुआ। आपातकाल में वायसराय को अध्यादेश जारी करने का अधिकार दिया गया। इस एक्ट के तहत केवल गृह सरकार में ही परिवर्तन किया गया। भारतीय प्रशासन में कोई परिवर्तन नहीं किया गया। भारतीय राजव्यवस्था ।

1861 के प्रथम भारतीय परिषद अधिनियम के प्रावधान –

  • वायसराय की कार्यकारिणी में 5वें सदस्य को जोड़ा गया जो विधेवेत्ता था।
  • वायसराय की कार्यकारिणी परिषद को कुछ नियम बनाने का अधिकार दिया गया। इसी आधार पर कैनिंग ने विभागीय प्रणाली आरम्भ की गई। इस प्रकार भारत सरकार की मंत्रमण्डलीय व्यवस्था की नींव पड़ी।
  • बम्बई और मद्रास प्रांतों को अपने लिए कानून बनाने तथा उनमें संशोधन करने का अधिकार पुनः दे दिया गया। परंतु ये कानून गवर्नर जनरल की अनुमति के बाद ही वैध माने जाएंगे। कुछ मामलों में गवर्नर जनरल की पूर्वानुमति पाना आवश्यक था।
  • गवर्नर जनरल को संकटकाल में विधानपरिषद की अनुमति के बिना ही अध्यादेश जारी करने की अनुमति दे दी गई। ये अध्यादेश अधिकांश 6 माह तक लागू होगा।

1892 का अधिनियम –

यह 1861 के अधिनियम का एक संशोधित स्वरूप था। इसके तहत व्यवस्थापिकाओं में प्रतिबंधित, सीमित व अप्रत्यक्ष रूप से चुने गए सदस्यों का प्रावधान किया गया। सदस्यों को व्यवस्थापिकाओं में बजट पर विचार-विमर्श करने व प्रश्न पूछने का अधिकार दिया गया। परंतु वर्तमान समय की तरह पूरक प्रश्न पूछने का अधिकार नहीं दिया गया था। इसे संसदीय व्यवस्था की शुरुवात कहा जा सकता है।

  • कार्यकारिणी के सदस्यों की संख्या कम से कम 10 और अधिक से अधिक 16 तय कर दी गई। इस परिषद में कम से कम 40 प्रतिशत लोग अशासनिक होने चाहिए।
  • इस अधिनियम के तहत निर्वाचन पद्यति का आरंभ हुआ। हालांकि निर्वाचन शब्द का प्रयोग नहीं किया गया।

1909 का अधिनियम –

यह अधिनियम भारत सचिव मार्ले और गवर्नर जनरल मिण्टो द्वारा तैयार किया गया था। इसी कारण इसे ‘मार्ले-मिण्टो सुधार’ के नाम से जाना गया। इसके तहत केंद्रीय व प्रांतीय व्यवस्तापिकाओं की सदस्य संख्या को बढ़ा दिया गया। पहली बार जाति, वर्ग, धर्म आधारित पृथक निर्वाचन क्षेत्र का गठन किया गया। मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन क्षेत्र बनाया गया। इसके तहत व्यवस्थापिक के सदस्यों को पूरक प्रश्न पूछने का अधिकार दिया गया। भारतीय राजव्यवस्था ।

1919 का अधिनियम –

इसे माण्टेग्यू चेम्सफोर्ड सुधारों के नाम से जाना जाता है। इसमें एक प्रस्तावना भी जोड़ी गई। इसके तहत द्विसदनीय केंद्रीय व्यवस्थापिका का भी प्रावधान किया गया। साम्प्रदायिक चुनाव क्षेत्रों को और अधिक व्यापक बनाया गया। एक निश्चित राशि कर के रूप में सरकार को देने वालों को मताधिकार दिया गया। प्रांतों में दोहरे शासन की व्यवस्था की गई।

1935 का भारत शासन अधिनियम

भारतीय संविधान के विदेशी स्त्रोत –

भारतीय संविधान के प्रावधानों को बहुत से देशों के संविधानों से लिया गया है। परंतु इस पर सर्वाधिक प्रभाव 1935 के भारत शासन अधिनियम का पड़ा है। भारत शासन अधिनियम 1935 की अधिकांश धाराओं को शब्दशः अथवा थोड़े परिवर्तन के साथ भारतीय संविधान में स्थान दिया गया है।

भारत शासन अधिनियम 1935 से लिए गए उपबंध –

  • राज्यपाल
  • त्रिसूची प्रणाली
  • आपातकाल
  • लोकसेवा आयोग
  • अध्यादेश ।

भारतीय संविधान के ब्रिटिश स्त्रोत –

  • संसदीय व्यवस्था
  • राष्ट्रपति का अभिभाषण
  • बहुमत प्रणाली
  • विधि के समक्ष समता
  • एकल नागरिकता
  • विधि निर्माण प्रक्रिया
  • रिट या आलेख ( अनुच्छेद 32 )।

भारतीय संविधान के अमेरिकी स्त्रोत –

  • मूल अधिकार
  • न्यूनिक पुनरावलोकन
  • राष्ट्रपति पर महाभियोग
  • निर्वाचित राष्ट्रपति
  • उपराष्ट्रपति का पद
  • विधि का समान संरक्षण
  • स्वतंत्र न्यायपालिका
  • सामुदायिक विकास कार्यक्रम
  • संविधान की सर्वोच्चता
  • वित्तीय आपात
  • उच्च न्यायालय व उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों को हटाने की प्रक्रिया
  • संविधान संशोधन में राज्य विधायिकाओं द्वारा अनुमोदन
  • हम भारत के लोग

संविधान के कनाडाई स्त्रोत –

  • राज्यों का संघ ( भारत में संघीय व्यवस्था )
  • राज्यपाल की नियुक्ति विषयक प्रक्रिया
  • संघीय शासन व्यवस्था
  • तदर्थ नियुक्ति
  • राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति हेतु विधेयक सुरक्षित रखना
  • प्रसादपर्यंत और असमर्थ तथा सिद्ध कदाचार

भारतीय संविधान के आस्ट्रेलियाई स्त्रोत –

  • संवर्ती सूची का प्रावधान
  • प्रस्तावना की भाषा
  • संसदीय विशेषाधिकार
  • वाणिज्य , व्यापार और समागम की स्वतंत्रता
  • प्रस्तावना में निहित भावना ( स्वतंत्रता , समानता और बंधुत्व को छोड़कर )
  • केंद्र और राज्य के बीच शक्तियों का विभाजन और केंद्र राज्य संबंध

भारतीय संविधान में आयरलैंड से लिए गए उपबंध –

  • राज्य के नीति निदेशक तत्व (DPSP )
  • आपातकालीन उपबंद
  • राष्ट्रपति की निर्वाचन प्रणाली
  • राज्यसभा में मनोनयन ( साहित्य , कला , विज्ञान , समाजसेवा इत्यादि क्षेत्र से )

अन्य देशों ले लिए गए उपबंध –

  • जापान – विधि की स्थापित प्रक्रिया ( अनुच्छेद 21 की शब्दावली )
  • सोवियत संघ – मूल कर्तव्य , पंचवर्षीय योजना
  • फ्रांस – (1) गणतंत्र , (2) स्वतंत्रता , समानता और बंधुत्व की भावना ।
  • जर्मनी – आपात स्थिति में राष्ट्रपति को मूल अधिकारों के निलंबन की शक्ति ।
  • दक्षिण अफ्रीका – (1) संविधान संशोधन की प्रक्रिया का प्रावधान , (2) राज्य विधानमण्डलों द्वारा विधानसभा में आनुपातिक प्रतिनिधितिव ।
  • सामाजिक नीतियों के संदर्भ में ( DPSP ) का उपबंध ।

संविधान के अनुच्छेद व अनुसूचियां –

मूल संविधान में कुल 22 भाग, 8 अनुसूचियां और 395 अनुच्छेद थे। संविधान में संशोधन कर इनकी संख्या को घटाया व बढ़ाया जाता रहा है। संविधान में संशोधन कर कुछ अनुच्छेद जोड़े और कुछ निर्षित किये जाते हैं। वर्तमान में संविधान में 25 भाग और 400 से अधिक अनुच्छेद हैं। नए अनुच्छेदों को इस प्रकार जोड़ा जाता है कि मूल संख्या बाधित न हो। संविधान के वर्तमान अनुच्छेदों में ही नए अनुच्छेद क, ख, ग, घ… करके जोड़ दिये जाते हैं। इस प्रकार संविधान के अनुच्छेदों की मूल संख्या 395 ही रहती है। भारतीय संविधान में अनुच्छेद 396 नहीं है औ नही इससे ऊपर संख्या बढ़ी है। मूल संविधान में कुल 8 अनुसूचियाँ थी। वर्तमान में संविधान में कुल 12 अनुसूचियां हैं।

संविधान में बाद में जोड़े गए भाग –

  • 4क ( मूल कर्तव्य ) – इसे 42वें संविधान संशोधन 1976 के द्वारा जोड़ा गया था।
  • 9क ( नगरपालियाएं ) – इसे 74वें संविधान संशोधन 1993 के तहत जोड़ा गया।
  • 9ख ( सहकारी समितियां )– 9वें संविधान संशोधन 2011 के तहत जोड़ा गया।
  • 14क ( अधिकरण )– 42वें संविधान संशोधन 1976 के तहत जोड़ा गया।

संविधान का निर्षित किया गया भाग –

  • भाग 7 – भारतीय संविधान का सिर्फ यही एक भाग अब तक संविधान से निर्षित किया गया है। इसके तहत अनुच्छेद 238 आता है। इसे 7वें संविधान संशोधन 1956 द्वारा निर्षित किया गया है।

उद्देशिका –

हम भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को,

सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय

विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास व धर्म और उपासना की स्वतंत्रता

प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त कराने के लिए,

तथा उन सब में,

व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित करने वाली

बंधुता भढ़ाने के लिए

दृढ़ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में

आज तारीख 26 नवंबर 1949 ई. (मिति मार्ग शीर्ष शुक्ल सप्तमी, संवत् 2006 विक्रमी) को

एतद् द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित व

आत्मार्पित करते हैं।

शासन प्रणाली –

विश्व में दो प्रकार की शासन प्रणालियाँ (संसदीय व अध्यक्षात्मक) प्रचलित हैं। भारत में संसदीय शासन प्रणाली प्रचलित है। संसदीय प्रणाली की शुरुवात ग्रेट ब्रिटेन में हुई। इसमें व्यवस्थापिका के सदस्य ही कार्यपालिका का गठन करते हैं। इसमें कार्यपालिका व्यवस्थापिका के प्रति उत्तरदायी होती है। अर्थात इस व्यवस्था में कार्यपालिका विधायिका द्वारा नियंत्रित होती है। इसके विपरीत अध्यक्षात्मक सरकार में कार्यपालिका की समस्त शक्ति राष्ट्रपति में निहित होती है। यह व्यवस्था अमेरिका मे प्रचलित है।

राष्ट्रीय प्रतीक –

भारत का राष्ट्रीय पशु बाघ (पैंथरा टाइग्रिस लिन्नायस) है। भारत का राष्ट्रीय पुष्प कमल (नेलम्बो न्यूसिफेरा) है। भारत का राष्ट्रीय पक्षी मोर (पावो क्रिस्टेसस) है। भारत का राष्ट्रीय ध्वज ‘तिरंगा’, राष्ट्रीय फल ‘आम’, राष्टीय वृक्ष ‘वरगद’ है। भारत का राष्ट्रीय वाक्य ‘सत्यमेव जयते’ है। भारत का राष्ट्रीय गान ‘जन गण मन’ और राष्ट्रीय गीत ‘वन्दे मातरम’ है।

भारत के राज्य व केंद्रशासित प्रदेश –

भारतीय संविधान के अनुच्छेद-1 में कहा गया है भारत अर्थात इण्डिया ‘राज्यों का संघ’ होगा। वर्तमान में भारत में कुल 28 राज्य व 8 केंद्र शासित प्रदेश हैं। संविधान की पहली अनुसूची में भारत के राज्यों व उनके क्षेत्रों का विवरण है। भारतीय संघ में नए राज्यों के सृजन हेतु इस अनुसूची में संशोधन अनिवार्य है। स्वतंत्रता पश्चात राज्यों के निर्माण हेतु फजल अली की अध्यक्षता में राज्य पुनर्गठन आयोग गठित किया गया। इसकी सिफारिशों पर 14 राज्य व 6 केंद्र शासित प्रदेश स्थापित किये गए। स्वतंत्रता पश्चात भाषायी आधार पर गठित होने वाला पहला राज्य आंध्र प्रदेश बना।

नागरिकता –

भारतीय संविधान में नागरिकता संबंधी प्रावधान भाग-2 में अनुच्छेद 5 से 11 तक वर्णित हैं। भारतीय संविधान द्वारा भारतीयों को एकल नागरिकता प्रदान की गई है। अर्थात यहाँ के सभी नागरिक सिर्फ भारत के नागरिक हैं। अमेरिका में दोहरी नागरिकता का प्रावधान है। अमेरिका के लोगों को अमेरिका के साथ अपने राज्य की भी नागरिकता प्राप्त है। भारत में राज्यों की ओर से नागरिकता का कोई प्रावधान नहीं किया गया है। नागरिकता प्राप्त करने संबंधी उपबंध भारतीय नागरिकता अधिनियम – 1955 में दिये गए हैं।

मूल अधिकार –

संविधान में मूल अधिकारों को सम्मिलित करने का समर्थन नेहरू रिपोर्ट (1928) में किया गया था। भारतीय संविधान के भाग-3 में अनुच्छेद 12 से 35 तक मूल अधिकारों को वर्णित किया गया है। मूल संविधान में 7 मूल अधिकार दिये गए थे। परंतु 44वें संविधान संशोधन अधिनियम (1944) के तहत सम्पत्ति के अधिकार को मूल अधिकारों से हटा दिया गया। अब सम्पत्ति का अधिकार अनुच्छेद 300-क के तहत वैधानिक अधिकार है। वर्तमान में कुल 6 मूल अधिकार दिये गए हैं। आपातकाल की स्थिति में मूल अधिकारों का निलंबन किया जा सकता है। संविधान के अनुच्छेद 358 व 359 में मूल अधिकारों के निलंबन संबंधी प्रावधान वर्णित हैं। मूल अधिकारों के हनन की स्थिति में अनुच्छेद 32 के तहत न्यायपालिका की शरण ली जा सकती है। भीमराव अम्बेडकर ने अनुच्छेद-32 को संविधान की आत्मा कहा है।

राज्य के नीति निदेशक तत्व –

सामाजिक व आर्थिक प्रजातंत्र को स्थापित करने के उद्देश्य से संविधान में राज्य के नीति निदेशक तत्वों को शामिल किया गया। इन्हें आयरलैंड के संविधान से लिया गया है। ये भारतीय संविधान के भाग-4 में अनुच्छेद 36 से 51 तक वर्णित हैं। अनुच्छेद 37 के अनुसार ये न्यायालय में वाद योग्य नहीं हैं। अर्थात ये न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं हैं। ये कल्याणकारी राज्य की स्थापना में सहायक हैं।

मूल कर्तव्य –

भारतीय संविधान में मूल कर्तव्यों को रूस से लिया गया है। इन्हें संविधान के भाग 4-क के तहत अनुच्छेद 51-क में रखा गया है। मूल संविधान में मूल-कर्तव्यों का प्रावधान नहीं किया गया था। 42वें संविधान संशोधन अधिनियम – 1976 के तहत संविधान में 10 मूल कर्तव्यों को जोड़ा गया। बाद में 86वें संविधान संशोधन – 2002 के तहत एक और मूल कर्तव्य जोड़ा गया। वर्तमान में कुल 11 मूल कर्तव्य हैं। मूल कर्तव्यों की अनुशंसा स्वर्ण सिंह समिति द्वारा की गई थी।

राष्ट्रपति –

भारत में राष्ट्रपति का चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्यति के आधार पर एकल संक्रमणीय मत प्रणाली के आधार पर होता है। संविधान के अनुच्छेद – 53 के तहत संघ की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित होगी। अनुच्छेद-54 के तहत लोकसभा, राज्यसभा और राज्य विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य राष्ट्रपति के चुनाव में मतदान करते हैं। राष्ट्रपति के उम्मीदवार बनने हेतु कम से कम 50 प्रस्तावक व कम से कम 50 अमुमोदकों को होना आवश्यक है। अनुच्छेद 56 (1) के तहत राष्ट्रपति अपना त्यागपत्र उप-राष्ट्रपति को संबोधित करता है। अनुच्छेद 56 (1) के तहत उप-राष्ट्रपति इसकी सूचना तुरंत लोकसभाध्यक्ष को देगा। राष्ट्रपति उम्मीदवार की अर्हताओं का वर्णन अनुच्छेद- 58(1) में किया गया है। राष्ट्रपति पर महाभियोग चलाने की प्रक्रिया अनुच्छेद-61 में दी गई है।

उप-राष्ट्रपति

अनुच्छेद-89(1) के तहत उपराष्ट्रपति राज्यसभा का पदेन सभापति होगा। परंतु यह राज्यसभा का सदस्य नहीं होता है। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृण्णन भारत के पहले उपराष्ट्रपति थे।

केंद्रीय मंत्रिपरिषद्

संविधान के अनुच्छेद 74(1) के तहत राष्ट्रपति की सहायता व सलाह हेतु एक मंत्रिपरिषद् होगी। इसका प्रमुख प्रधानमंत्री होगा। कैबिनेट मंत्री, राज्य मंत्री व उपमंत्रियों को संयुक्त रूप से मंत्रीपरिषद् कहा जाता है। कैबिनेट मंत्रियों को संयुक्त रूप से मंत्रिमण्डल कहा जाता है। अनुच्छेद 75 के अनुसार मंत्रिपरिषद संयुक्त रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होगी।

महान्यायवादी

यह भारत सरकार का प्रथम विधि अधिकारी है। संविधान के अनुच्छेद 76 के तहत भारत सरकार को कानूनी मामलों में सलाह देने हेतु एक अटार्नी जनरल की व्यवस्था की जाएगी। इसकी नियुक्ति राष्ट्रपति करेगा। राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत यह अपने पद पर रहेगा। इसकी योग्यता उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के बराबर होगी। राज्य सरकार को कानूनी विषयों पर सलाह देने हेतु एडवोकेट जनरल (महाधिवक्ता) की नियुक्ति की जाती है। यह राज्य सरकार का प्रथम विधिक सलाहकार होता है। अनुच्छेद 165 के तहत यह राज्यपाल के प्रसादपर्यंत पद पर रहता है।

नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सी.ए.जी.)

अनुच्छेद 148 (1) के तहत भारत के नियंत्रक व महालेखा परीक्षक की नियुक्ति राष्ट्रपति करेगा। सीएजी के वेतन व सेवा शर्तों का निर्धारण संसद करेगी। इसका कार्यकाल 6 वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक का निर्धारित किया गया है। भारतीय राजव्यवस्था

वरीयता अनुक्रम

भारत में वरीयता क्रम में सबसे पहला नाम राष्ट्रपति का आता है। इसके बाद उप-राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यपाल(अपने राज्य में), भूतपूर्व राष्ट्रपति व उपप्रधानमंत्री का नाम आता है। लोकसभा अध्यक्ष और भारत का मुख्य न्यायाधीश वरीयता क्रम में समान स्तर पर हैं। मंत्रिमंडल सचिव देश का वरिष्ठतम लोकसेवक होता है।

भारतीय संसद

भारतीय व्यवस्थापिका को संसद के नाम से जाना जाता है। ये दो सदनों और राष्ट्रपति से मिलकर बनती है। इसके दो सदन राज्यसभा (उच्च सदन) व लोकसभा (निम्न सदन) हैं। लोकसभा सदस्य सीधे जनता द्वारा चुने जाते हैं। इसलिये इसे जनता सदन कहा जाता है। अनुच्छेद-81 के तहत वर्तमान में लोकसभी की अधिकतम सदस्य संख्या 552 हो सकती है। इनमें से 530 राज्यों से, 20 केंद्र शासित प्रदेशों से और 2 आंग्ल-भारतीय समुदाय से होंगे।

राज्यसभा की संरचना का उल्लेख संविधान के अनुच्छेद – 80 में दिया गया है। राज्यसभा की अधिकतम सदस्य संख्या 250 हो सकती है। इनमें 238 राज्यों से निर्वाचित और 12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत होते हैं। राज्यसभा एक स्थायी सदन है। इसका कभी विघटन नहीं होता। राज्यसभा सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्ष का होता है। इसके एक तिहाई सदस्य हर 2 साल बाद बदलते रहते हैं। महान्यायवादी को राज्यसभा के दोनों सदनों में बोलने का अधिकार होता है। परंतु यह संसद में मतदान नहीं कर सकता। भारतीय संसद की विस्तृत जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें

सर्वोच्च न्यायालय

भारतीय सर्वोच्च न्यायालय भारतीय न्यायपालिका का शीर्ष है। उच्चतम न्यायालय की स्थापना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124 के तहत की गई है।

उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या –

मूल संविधान के अनुसार उच्चतम न्यायालय में 1 मुख्य न्यायाधीश और 7 अन्य न्यायाधीश होते थे। 1956 में अन्य न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाकर 10 कर दी। तत्पश्चात 1960 ई. में 13, 1977 ई. में 17 कर दी गई। इसके बाद 1986 ई. में अन्य न्यायाधीशों की संख्या 30 कर दी गई। इसके बाद साल 2019 में अन्य न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाकर 33 कर दी गई। इस तरह वर्तमान में उच्चतम न्यायालय में 1 मुख्य न्यायाधीश और 33 अन्य न्यायाधीश हैं। अर्थात वर्तमान में उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या 34 (33+1) है। न्यायाधीशों की संख्या विहित करने की शक्ति संसद के पास है।

तदर्थ न्यायाधीश –

उच्चतम न्यायालय में गणपूर्ति की स्थित न होने पर मुख्य न्यायाधीश किसी उच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश से बैठक में उपस्थित रहने की अपील कर सकता है। यह राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से होगा। यह अनुरोध लिखित रूप में किया जएगा। इसके लिए मुख्य न्यायाधीश से पहले परामर्श करना आवश्यक है (अनुच्छेद-127)। जिस न्यायाधीश को निमंत्रित किया गया है वह सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश होने के लिए अर्ह होना चाहिए।

सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की उपस्थिति –

उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीशों से भी उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में कार्य करने हेतु अपील की जा सकती है। इसके लिए भी राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति होना चाहिए। जिस न्यायाधीश से अपील की जा रही है वह सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के लिए अर्ह होना चाहिए।

न्यायाधीशों की नियुक्ति –

भारतीय सर्वोच्च न्यायालय का हर न्यायाधीश राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किया जाता है। अन्य न्याधीशों की नियुक्ति के लिए राष्ट्रपति मुख्य न्यायाधीश से परामर्श करेगा। राष्ट्रपति यह कार्य मंत्रिपरिषद की सलाह पर ही करेगा।

मुख्य न्यायाधीश का चयन –

प्रारंभ में वरिष्ठता के अनुसार ही मुख्य न्यायाधीश का चयन किया जाता था। यह व्यवस्था साल 1973 तक निर्विवाद रूप से चलती रही। हालांकि 1956 में भारत के विधि आयोग ने इस पर अपनी असहमति व्यक्त की। विधि आयोग ने कहा कि आंख मूंदकर वरिष्ठता के अनुसार नियुक्ति की परंपरा ठीक नहीं। इसके स्थान पर न्यायमूर्ति के गुण व योग्यताओं पर विचार किया जाना चाहिए। सिर्फ ज्येष्ठता को ही नियुक्ति का आधार नहीं बनाना चाहिए। हालांकि विधि आयोग के इस प्रतिवेदन पर सरकार ने कोई अमल नहीं किया और वही व्यवस्था बनाए रखी।

केशवानन्द भारती विवाद – 1973

परंतु बहुचर्चित केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य विवाह के निर्णय के कुछ घंटों बाद ही न्या. ए. एन. रे को मुख्य न्यायाधीश नियुक्त कर दिया गया। जब्कि उस वक्त तीन अन्य न्यायाधीश उनसे ज्येष्ठ थे। इन तीनों न्यायाधीशों ने तुरंत अपने पद से त्यागपत्र दे दिया। बहुत से एसोसिएशन, वकीलों व सेवानिवृत्त न्यायाधीशों ने इसका विरोध किया और कहा कि इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर गंभीर प्रहार हुआ है।

बंदी प्रत्यक्षीकरण मामाला –

तीन साल बाद 1976 ई. में सर्वोच्च न्यायालय ने बंदी प्रत्यक्षीकरण पर अपनी राय प्रकट की। 5 न्यायधीशों की पीठ में अकेले न्या. एच. आर. खन्ना ने अन्य से विसम्मत निर्णय दिया। उन्होंने अपना मत दिया कि आपातकाल के दौरान भी प्राणों का अधिकार विद्यमान रहता है। सरकार को उनका फैसला रास नहीं आया। इसका खामियाजा उन्हें मुख्य न्यायाधीश के पद से वंचित होकर चुकाना पड़ा। उनकी ज्येष्ठता की अनदेखी कर सरकार ने उनसे कनिष्ठ न्या. एम. यू. बेग को मुख्य न्यायधीश बना दिया।

उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की अर्हताएं –

  • – भारत का नागरिक हो।
  • – राष्ट्रपति की राय में पारंगत विधिवेत्ता हो।
  • – किसी उच्च न्यायालय में कम से कम 5 वर्ष न्यायाधीश रहा हो। या
  • – किसी उच्च न्यायालय में कम से कम 10 वर्ष अधिवक्ता रहा हो।

न्यायाधीश की पदावधि –

सर्वोच्च न्यायालय के न्यायधीश के सेवानिवृत्ति की आयु 65 वर्ष निर्धारित की गई है। हालांकि इस पद के लिए निम्नतम आयु सीमा का निर्धारण नहीं किया गया है। न्यायाधीश जब चाहे राष्ट्रपति को अपना त्यागपत्र संबोधित कर सकता है। साथ ही राष्ट्रपति को संसद के दोनों सदनों के विशेष बहुमत द्वारा पारित समावेदन के माध्यम से भी न्यायाधीश को पद से हटाया जा सकता है। उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को केवल दो आधारों (असमर्थता, व साबित कदाचार) पर ही पद से हटाया जा सकता है।

महाभियोग –

संविधान के अनुच्छेद-124(4) के अनुसार न्यायाधीश को साबित कदाचार व असमर्थता के आधार पर ही पद से हटाया जा सकता है। संसद ने इसके लिए न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 अधिनियमित किया।

महाभियोग की प्रक्रिया –

इसके लिए न्यायाधीश को हटाने के उद्देश्य से राष्ट्रपति को समावेदन दिया जाता है। समावेदन लोकसभा से आने पर इस पर कम से कम 100 सदस्यों के हस्ताक्षर अनिवार्य हैं। समावेदन यदि राज्यसभा से आया है तो इस पर कम से कम 50 सदस्यों के हस्ताक्षर होने चाहिए। लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति ऐसे लोगों से परामर्श कर सकते हैं जो इसके लिए उक्त हों।

यह प्रस्ताव ग्रहण कर लिया जाता है तो तीन लोगों की समिति गठित की जाएगी। इस समिति में एक हाई कोर्ट का मुख्य या अन्य न्यायाधीश होगा। एक उच्च न्यायालयों में से किसी का मुख्य न्यायाधीश होगा। एक व्यक्ति कोई पारंगत विधिवेत्ता होगा। यदि समिति न्यायाधीश को असमर्थ या कदाचार का दोषी पाती है, तो न्यायाधीश को हटाए जाने के प्रस्ताव और समिति के प्रतिवेदन पर उस सदन में विचार किया जाएगा जहाँ वह लंबित हो। यह प्रस्ताव दोनों सदनों की कुल संख्या के बहुमत और उपस्थित व मतदान करने वाले सदस्यों के दो तिहाई बहुमत से पास होना चाहिए। इस प्रकार पारित समावेदन को अंत में राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है। राष्ट्रपति न्यायाधीश को पद से हटाने का आदेश देता है।

राज्यपाल

अनुच्छेद 154(1) के अनुसार राज्य की कार्यपालिका शक्ति राज्यपाल में निहित होगी। अनुच्छेद 156 (1) के तहत राज्यपाल राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद पर रहेगा। अनुच्छेद 164 के अनुसार मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल करेगा।

राज्य विधानमण्डल

संविधान के अनुच्छेद 168 के तहत राज्यपाल, विधानपरिषद् और विधानसभा मिलकर राज्य विधानमंडल का निर्माण करेंगी। जिन राज्यों में विधान परिषद् नहीं हैं वहां विधानसभा और राज्यपाल मिलकर विधानमंडल का निर्माण करेंगे। विधान परिषद् एक स्थाई सदन होगा। इसका विघटन नहीं हो सकता। परंतु राज्य चाहे तो इसे समाप्त कर सकेंगे। भारतीय राजव्यवस्था ।

उच्च न्यायालय –

हाई कोर्ट ( उच्च न्यायालय ) राज्य की न्याय व्यवस्था का शीर्ष है। भारत के हर राज्य का अपना पृथक हाई कोर्ट नहीं है। परंतु हर क्षेत्र किसी न किसी उच्च न्यायालय के अंतर्गत आता है। इसके लिए कुछ उच्च न्यायालयों के न्यायिक क्षेत्र के अंतर्गत एक से अधिक राज्यों के संवद्ध किया गया है। वर्तमान में भारत में कुल 25 उच्च न्यायालय हैं। साधारणतः प्रत्येक राज्य के लिए एक उच्च न्यायालय होगा। परंतु किसी एक राज्य के उच्च न्यायालय के कार्यक्षेत्र को एक राज्य से अधिक भी बढ़ाया जा सकता है।

उच्च न्यायालय के अंतर्गत आने वाले टॉपिक –

  • न्यायपीठ व न्यायाधीशों की संख्या
  • उच्च न्यायालय का गठन
  • न्यायाधीशों की अर्हताएं
  • न्यायाधीशों की नियुक्ति
  • पदावधि
  • वेतन
  • न्यायाधीश का अंतरण
  • न्यायमण्डल द्वारा नियुक्ति की आलोचना
  • राष्ट्रीय न्यायिक आयोग
  • न्यायाधीशों की स्वाधीनता
  • राज्य क्षेत्रीय अधिकारिता
  • राज्यक्षेत्रीय अधिकार
  • अपीलीय क्षेत्राधिकार
  • रिट अधिकार
  • उच्चतम न्यायालय से तुलना
  • उच्च न्यायालय व उच्चतम न्यायालय के बीच संबंध
  • केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो को निदेश देने की शक्ति
  • अभिलेख न्यायालय
  • अधीनस्थ न्यायालयो पर नियंत्रण

केंद्र-राज्य संबंध

भारत राज्यों का संघ है। अर्थात केंद्र व राज्य के पारस्परिक संबंधों को स्थापित करने के उद्देश्य से संविधान के भाग 11 और 12 में नियमों का उल्लेख किया गया है। किस विषय पर कौन कानून बनाएगा यह निर्धारित करने के लिए त्रिसूची व्यवस्था अपनाई गई है। भारतीय राजव्यवस्था ।

आपात उपबंध

देश में आपात स्थिति उत्पन्न होने पर संविधान के अनुच्छेद 352, 356, 360 के तहत राष्ट्रपति आपातकाल की घोषणा करता है। युद्ध, बाह्य आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह होने पर राष्ट्रपति अनुच्छेद 352 के तहत आपातकाल की घोषणा करता है। किसी प्रदेश में संवैधानिक तंत्र विफल होने वहाँ पर अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन लगाया जाता है। अनुच्छेद-360 के तहत वित्तीय आपात की घोषणा की जाती है। आजादी के बाद से भारत में अनुच्छेद 360 की आवश्यकता कभी नहीं पड़ी। भारतीय राजव्यवस्था ।

वित्त आयोग

संविधान के अनुच्छेद 280 में वित्त आयोग का उल्लेख मिलता है। हर पांच साल के अंतराल से एक वित्त आयोग का गठन किया जाता है। पहले वित्त आयोग का गठन के. सी. नियोगी की अध्यक्षता में 12 नवंबर 1951 को हुआ था। वित्त आयोग अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति को सौंपता है। भारतीय राजव्यवस्था ।

योजना आयोग

योजना आयोग एक गैर संवैधानिक या संविधानेत्तर संस्था है। केंद्रीय मंत्रिमंडल के एक संकल्प के माध्यम से इसका गठन 15 मार्च 1950 को हुआ था। प्रधानमंत्री योजना आयोग का पदेन अध्यक्ष होता है। योजना आयोग पंचवर्षीय योजनाओं का निर्माण करता है। भारतीय राजव्यवस्था ।

लोकपाल और महत्वूर्ण आयोग

भारत में लोकपाल व लोकायुक्त की नियुक्ति का सुझाव प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग द्वारा दिया गया था। 5 जुलाई 1966 को इस आयोग का गठन मोरारजी देसाई की अध्यक्षता में किया गया था। 1967 में के. हनुमंतैया को आयोग का अध्यक्ष बनाया गया। पहला लोकपाल विधेयक 1968 ई. में चौथी लोकसभा में प्रस्तुत किया गया। लोकसभा से यह पारित हो गया। परंतु राज्यसभा में लंबित रहने से यह विधेयक समाप्त हो गया। 1970 ई. में इस आयोग का कार्यकाल समाप्त हो गया। भारतीय राजव्यवस्था ।

अस्थाई विशेष प्रावधान

संविधान के अनुच्छेद 369, 370, 371, 372 कुछ राज्यों के लिए विशेष महत्व प्रदान करने के लिए थे। अनुच्छेद 369 संसद को राज्यसूची के विषयों पर कानून बनाने का अधिकार देता है। अनुच्छेद 370 जम्मू कश्मीर के लिए विशेष प्रावधान करता था। परंतु अब अनुच्छेद 370 को निर्षित कर दिया गया है। अनुच्छेद 371 भारत के कुछ राज्यों गुजरात, महाराष्ट्र, असम, नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम, सिक्किम, आंध्रा, अरुणाचल, गोवा के लिए विशेष प्रावधान करता है। भारतीय राजव्यवस्था ।

चुनाव आयोग

संविधान के अनुच्छेद 324 में चुनाव आयोग का उल्लेख मिलता है। चुनाव आयोग में एक मुख्य निर्वाचन आयुक्त व अन्य निर्वाचन आयुक्त होते हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त का कार्यकाल 6 वर्ष या 65 वर्ष की अवस्था तक का होता है। 61वें संविधान संशोधन अधिनियम 1988 द्वारा भारत में मताधिकार की आयु को 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष कर दिया। यह 28 मार्य 1989 से प्रभावी हुआ। इसका पहली बार प्रयोग नवंबर 1989 में 9वीं लोकसभा के चुनाव में किया गया। भारतीय राजव्यवस्था ।

राजनीतिक दल

वर्तमान में भारत में कुल 8 राजनीतिक पार्टियां हैं।

  • भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
  • भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी
  • मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी
  • राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी
  • बहुजन समाज पार्टी
  • तृणमूल कांग्रेस पार्टी
  • नेशनल पीपुल्स पार्टी
  • भारतीय जनता पार्टी

संविधान संशोधन

संविधान के अनुच्छेद-368 संसद को संविधान में संशोधन की शक्ति प्रदान करता है। तीन प्रकार से संविधान में संशोधन किये जा सकते हैं। साधारण बहुमत, विशेष बहुमत और विशिष्ट बहुमत। विशिष्ट बहुमत में विशेष बहुतम के साथ राज्यों का अनुमोदन भी आवश्यक है। भारतीय राजव्यवस्था ।

राजभाषा

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343 में वर्षित है कि हिंदी भारत की राजभाषा है। ध्यान रहे हिंदी भारत की राष्ट्रभाषा नहीं है। भारत की कोई भी राष्ट्रभाषा नहीं है। प्रथम राजकीय भाषा आयोग का गठन 7 जून 1955 को बी. जी. खेर की अध्यक्षता में किया गया था। भारत की राजकीय भाषाओं की सूची संविधान की आठवीं अनुसूची में दी गई है।

संविधान के प्रारंभ में इस सूची में 14 भाषाएं थीं। भारतीय राजव्यवस्था ।

पंचायती राज व सामुदायिक विकास

पंचायती राज व्यवस्था राज्य स्तर पर स्थानीय स्वशासन की व्यवस्था है, यह राज्य सूची का विषय है।

इसके गठन व चुनाव का अधिकार राज्यों को दिया गया है।

पंचायतों की अवधि निर्वाचन से 5 वर्ष की होती है। भारतीय राजव्यवस्था ।

कुछ वर्गों के लिए विशेष उपबंध

संविधान के भाग-16 में कुछ वर्गों से संबंधित विशेष उपबंध किये गए हैं।

अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजातियों की सूचियां संसद द्वारा बनाई व संशोधित की जाती हैं।

अनुसूचित जातियों संबंधी उपबंध अनुच्छेद 341 में वर्णति हैं। अनुसूचित जनजातियों संबंधी उपबंध संविधान के अनुच्छेद 342 में वर्णति हैं।

लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में जातिगत आरक्षण की व्यवस्था की गई है। भारतीय राजव्यवस्था ।

संविधान को एकात्मक व्यवस्था की ओर झुकाने वाले उपबंध –

  • इकहरी नागरिकता – भारत में अमेरिका की भांति दोहरी नागरिकता का प्रावधान नहीं है। यहाँ पर भारत के हर नागरिक को केंद्र की नागरिकता ही प्राप्त है। अर्थात भारत में राज्य की नागरिकता का प्रावधान नहीं है। इसके विपरीत संयुक्त राज्य अमेरिका में दोहरी नागरिकता की व्यवस्था की गई है। वहाँ के नागरिकों को देश के साथ अपने राज्य की भी नागरिकता प्राप्त है।
  • राज्य व केंद्र के लिए एक ही संविधान की व्यवस्था – भारत में केंद्र सरकार के ही कानून लागू होते हैं। भारत का संविधान देश के हर राज्य पर लागू होता है। यहाँ किसी राज्य का स्वयं का संविधान नहीं है।
  • एकीकृत न्याय व्यवस्था – भारत में एकीकृत न्याय की व्यवस्था की गई है। इसके लिए एक सर्वोच्च न्यायालय की व्यवस्था की गई है। जो भारतीय न्याय व्यवस्था का शीर्ष है।
  • विशिष्ट शक्तियां केंद्र सरकार के पास
  • आपात उपबंध
  • संविधान में संशोधन की व्यवस्था
  • केंद्र द्वारा राज्यों में राज्यपालों की नियुक्ति
  • केंद्र सरकार द्वारा भारतीय राज्य की सीमाओं के नाम पर सीमा में परिवर्तन – भारत में केंद्र को इस वावत व्यवस्था करने की शक्ति प्रदान की गई है।
  • अखिल भारतीय लोकसेवाएं
  • केंद्रीय निर्वाचन आयोग की व्यवस्था
  • राज्यों के बीच मतभेदों का निस्तारण केंद्र द्वारा
  • राज्य विधानमण्डलों द्वारा पारित विधेयक को राष्ट्रपति की अनुमति के लिए सुरक्षित रखना
  • राज्यों की आर्थिक सहायता व अनुदान हेतु केंद्र पर निर्भरता

भारतीय संविधान की प्रस्तावना

भारतीय संविधान की प्रस्तावना संविधान की उद्देशिका है। यह संविधान का ही भाग है।

संविधान की प्रस्तावना निम्नलिखित है-

हम, भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्वसंपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को :

सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय

विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता,

प्रतिष्ठा और अवसर की समता

प्राप्त कराने के लिए

तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता

सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ़ संकल्प होकर

अपनी इस संविधान सभा में

आज तारीख 26 नवंबर 1949 ई. (मिति मार्ग शीर्ष शुक्ल सप्तमी संवत 2006 विक्रमी) को

एतद् द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।

संविधान सभा की बैठक –

9 दिसंबर 1946 को संविधान सभा की पहली बैठक हुई। इसके 4 दिन बाद ही 13 दिसंबर 1946 को संविधान सभा द्वारा एक उद्देश्य संकल्प पारित किया गया। इसके तहत संविधान सभा के लक्ष्यों या उद्देश्यों को सुनिश्चित किया गया। संविधान की प्रस्तावना को ‘संविधान की कुंजी‘ कहा जाता है।भारतीय संसद प्रस्तावना में संशोधन कर सकती है या नहीं इस पर बहुत सारे वाद दायर किये जा चुके हैं। सर्वोच्च न्यायायल में दायर वादों के अंतिम निर्णयानुसार प्रस्तावना संविधान का अंग है अर्थात इसमें संशोधन किया जा सकता है। ‘केशवानंद वाद – 1973′ में ही न्यायालय द्वारा प्रस्तावना को संविधान का मूल ढांचा माना गया। संसद इसमें उसी हद तक संशोधन कर सकती है जहां तक इसका मूल ढांचा नकारात्मक रूप से प्रभावित न हो।

मूल प्रस्तावना –

26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान को पूर्ण रूप से पारित किया गया था। उस समय संविधान की प्रस्तावना कुछ इस प्रकार थी –

हम, भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्वसंपन्न, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को :

सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय

विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता,

प्रतिष्ठा और अवसर की समता

प्राप्त कराने के लिए तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता

सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ़ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में

आज तारीख 26 नवंबर 1949 ई. (मिति मार्ग शीर्ष शुक्ल सप्तमी संवत 2006 विक्रमी) को

एतद् द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।

42 वां संविधान संशोधन (1976) –

वर्ष 1976 में हुए भारतीय संविधान के संशोधन के तहत संविधान की प्रस्तावना में ‘समाजवादी’, ‘पंथनिरपेक्ष,’ ‘और अखण्डता’ शब्दों को जोड़ा गया।

प्रस्तावना में प्रयुक्त प्रमुख शब्दों का अर्थ –

हम, भारत के लोग –

इससे आशय है कि यह संविधान भारतीयों द्वारा निर्मित है न कि अंग्रेजों द्वारा। इसकी शक्ति का प्रमुख स्त्रोत भारत की जनता है, और भारत में जनता ही सर्वोच्च है। शासन की समस्त शक्ति का मूल भारत की जनता है। संपूर्ण प्रभुत्व शक्ति जनता में निहित है।

संपूर्ण प्रभुत्वसंपन्न –

इसका तात्पर्य है कि भारत अपने समस्त आंतरिक व वैदेशिक मामलों में निर्णय लेने की शक्ति स्वयं रखता है। अब भारत पूर्ण रूप से स्वतंत्र है। हम पर किसी भी विदेशी शक्ति का कोई प्रभुत्व नहीं।

गणराज्य –

इसका तात्पर्य है कि भारत से अब राजतंत्र समाप्त हो चुका है। भारत अब एक गणतंत्र राज्य है। यहां का राष्ट्रप्रमुख जनता द्वारा चुना जाता है। इसके विपरीत राजतंत्र में राज्य का प्रमुख वंशानुगत होता है। भारत के साथ साथ विश्व भर में सदियों से राजतंत्र व्यवस्था ही चली आ रही थी। परंतु अब भारत एक गणतंत्र देश है।

पंथनिरपेक्ष (Secular) –

यह शब्द भारतीय संविधान की मूल प्रस्तावना में सम्मिलित नहीं था। वरन इसे 42 वें संविधान संशोधन 1976 द्वारा संविधान में जोड़ा गया। पंथनिरपेक्ष राज्य से तात्पर्य उस राज्य से है जिसका अपना कोई धर्म नहीं है। जहाँ किसी विशेष धर्म को राज्य की ओर से आश्रय न दिया गया हो। जहाँ किसी धर्म को राज्य का धर्म न घोषित किया गया हो। जहाँ हर धर्म को मानने, अपनाने व उसके अनुसार व्यवहार करने की आजादी हो।

एकता –

चूंकि भारत विविधिताओं का देश है। यहाँ विभिन्न जाति, धर्म व संस्कृति के लोग रहते हैं। इसके अतिरिक्त यह इतना विशाल होने के कारण क्षेत्रीय विविधताओं वाला देश है। बावजूद इन सबके हमारे अंदर एकता की भावना सदैव विद्यमान है। इसी के उद्देश्य को सार्थक बनाए रखने के उद्देश्य से ‘एकता’ शब्द को संविधान में जोड़ा गया।

अखण्डता –

यह शब्द भी मूल प्रस्तावना में नहीं था। इसे 42 वें संशोधन 1976 द्वारा प्रस्तावना में जोड़ा गया। राष्ट्र की एकता की भावना को और अधिक मजबूत करने के उद्देश्य से इस शब्द को जोड़ा गया।

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