विभिन्न धर्म, सम्प्रदाय, मत और दर्शन

विभिन्न धर्म, सम्प्रदाय, मत और दर्शन – भारत सदा से ही अपनी विभिन्न सांस्कृतिक विरासत के लिए जाना जाता है। यह सनातन धर्म, सिक्ख, बौद्ध, जैन जैसे प्रमुख धर्मों की जन्म स्थली है। यह अपनी सांस्कृतिक विरासत के लिए सदियों से विश्व विख्यात है।

शैव धर्म –

शिव एक प्रागैतिहासिक देवता हैं। यह भारत का प्राचीनतम धर्म है। शिव की पूजा आठ रूपों में की जाती है। पशुपति शिव का सबसे प्राचीन रूप है। जो भारत के साथ विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यता हड़प्पा के समय से ही विद्यमान है। ऋग्वेद में शिव को रुद्र के नाम से जाना गया। यूनानियों ने शिव को डायनोसस कहा है। दक्षिण भारत मे शिव का विरुपाक्ष रूप प्रचलित है। शिव नृत्य के स्वामी होने के कारण ‘नटराज’ कहलाए। उत्तर में कैलाश पर्वत शिव का वास स्थल है। इनकी सवारी नन्दी (वृषभ) है। दक्षिण मे शिव की अधिकांश मूर्तियां चतुर्भुज रूप में है।

दक्षिण में शिव की पत्नी के रूप में मीनाक्षी को जाना जाता है। शिव का तीसरा नेत्र श्रेष्ठ ज्ञान एवं दूरदर्शिता का प्रतीक है। सबसे बड़ी एकाश्म नन्दी की मूर्ति लेपाक्षी मंदिर में स्थित है। शिव के रूद्र रूप को प्रसन्न करने के लिए शूलगव यज्ञ किया जाता है। ‘अर्द्धनारीश्वर’ शिव एवं पार्वती का संयुक्त रूप है। कार्तिकेय और गणेश शिव के दो पुत्र हैं। कार्तिकेय को देवताओं का सेनापति एवं युद्ध का देवता कहा जाता है। दक्षिण में शैव धर्म का प्रचार नयनारों द्वारा किया गया, जिनकी कुल संख्या 63 थी। अप्पार, अक्कादेवी, सुन्दरमूर्ति, मणिकवाचकर, तिरुज्ञान सम्बन्दर प्रमुख नयनार संत थे।

शैव धर्म के सम्प्रदाय –

  • पाशुपत सम्प्रदाय
  • कापालिक सम्प्रदाय
  • कालामुख सम्प्रदाय
  • शिव भागवत सम्प्रदाय
  • मत्तमयूर सम्प्रदाय
  • आगमन्त सम्प्रदाय
  • शुद्ध शैव सम्प्रदाय

पाशुपत सम्प्रदाय –

यह शैव धर्म का सबसे प्राचीन सम्प्रदाय है। इस सम्प्रदाय की स्थापना द्वितीय शताब्दी ई. पू. लकुलीश द्वारा की गई। इन्हें शिव का 18वां अवतार माना जाता है। लकुलीश गुजरात के कायावरोहण के रहने वाले थे। राजस्थान के मेवाड़ में लकुलीश का मंदिर अवस्थित है। कुशिक, गर्ग, मित्र, और कौरुष्य लकुलीश के चार शिष्य थे। पाशुपत सम्प्रदाय का पहला उल्लेख कुषाण शासक हुविष्क के सिक्कों पर मिलता है। गुप्त काल में इस सम्प्रदाय का अधिक विकास हुआ। इस सम्प्रदाय के लोग भस्मधारी होते हैं।

कापालिक सम्प्रदाय –

‘भैरव’ इस सम्प्रदाय के इष्टदेव हैं। यह एक वाममार्गी सम्प्रदाय था। भवभूति ने मालतीमाधव में हिमालय के श्रीशैलम को कापालिकों का प्रमुख केंद्र बताया है। ये लोग नरकपाल में भोजन करते थे। शरीर पर भस्म लगाया करते और सुरापान किया करते थे। ये लोग वर्णभेद में विश्वास नहीं करते थे। महिलाओं को भी इस सम्प्रदाय में शामिल होने का अधिकार था। संगम साहित्य के ग्रंथ मणिमेखले में कापालिकों का वर्णन कट्टर शैव के रूप में किया गया है।

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कालामुख सम्प्रदाय –

ये कापालिकों से भी अधिक अतिवादी और वाममार्गी थे। शिवपुराण में इन्हें महाव्रतधर की संज्ञा दी गई है। कापालिक और कालामुख दोनों ही सम्प्रदाय चिरादम योग पद्यति में विश्वास रखते थे।

आजीवक सम्प्रदाय –

आजीवक सम्प्रदाय की स्थापना मक्खलिगोशाल ने की थी। गोशाला में जन्म लेने के कारण ये गोशाल कहलाए। नालंदा में इनकी भेंट महावीर स्वामी से हुई। 6 वर्ष तक इन्होंने यहाँ पर तपस्या की। महावीर के ज्ञान प्राप्ति से पूर्व ये ही उनके शिष्य थे। ये गौतम बुद्ध के समकालीन थे। इनकी गतिविधियों का केंद्र ‘श्रावस्ती’ था। इनके विचार ‘सामंज फल सुत्त’ तथा ‘भगवतीसूत्र’ में मिलते हैं। आजीवक समुदाय के अनुयायियों को ‘हत्थापलेखण’ और ‘एकदण्डिक’ भी कहा जाता है। इस सम्प्रदाय के लोग पुरुषार्थ में विश्वास नहीं करते। वे मनुष्य के सभी अवस्थाओं के लिए नियति को उत्तरदायी ठहराते हैं। अतः ये नियतिवादी विचारधारा से संबंधित थे। इनके अनुसार मनुष्य नियति के अनुसार सुख दुख भोगता है। इसमें पुरुष के बल या पराक्रम के लिए कोई स्थान नहीं। वे पाप या पुण्य का कोई हेतु या कारण नहीं मानते। आजीवकों का सम्प्रदाय इतना विस्तृत न हो सका कि वे राजनीति पर प्रभाव डाल सकें। हालांकि अशोक के समय में इस सम्प्रदाय को महत्वपूर्ण माना गया है।

दक्षिण में मक्खलि गोशाल को अवर्णनीय देवता की संज्ञा दी गई। वहीं चोलों ने आजीवकों पर ‘आजीवककाशु’ नामक कर लगाया। बिन्दुसार ब्राह्मण धर्म का अनुयायी था परंतु उसने आजीवकों को संरक्षण प्रदान किया। अशोक और दशरथ ने आजीवकों को गुफाएं दान कीं। अशोक के अभिलेखों में आजीवकों का भी जिक्र हुआ है। यह सम्प्रदाय मध्यकाल में 1002 ई. तक चला। धार्मिक सम्प्रदाय के रूप में आजीवकों का उल्लेख पतंजलि के महाभाष्य में हुआ है। आजीवक मोक्ष में विश्वास करते थे। भक्त जीवों के पुनर्जन्म प्रक्रिया को मण्डलम मोक्ष कहा जाता है। नियतिवादी होने के कारण ये लोग कर्म पर विश्वास नहीं करते थे। यही कारण है कि बौद्ध एवं जैनियों ने आजीवकों पर अनैतिकता का आरोप लगाया। गृहस्थ एवं स्त्रियां भी इसमें दीक्षित होने के अधिकारी थे। आजीवक सम्प्रदाय के लोग भिक्षा मांगकर दिन मे सिर्फ एक बार हथेली पर रखकर भोजन किया करते थे। ये प्रायः निर्वस्त्र रहते थे। आचरण की शुद्धता हेतु ये कठोर तप किया करते थे। ये लोग जीवन के अंतिम समय में नृत्य एवं गान के साथ शरीर का त्याग किया करते थे।

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लोकायत सम्प्रदाय –

लोकायत का अर्थ है ‘सामान्य लोगों से प्राप्त विचार’। अनुश्रुतियों के अनुसार इसकी स्थापना बृहस्पति ने की थी। वहीं इसका प्रमुख प्रतिपादक चार्वाक को माना जाता है। चार्वाक भौतिकवादी दर्शन के प्रमुख प्रवर्तक थे। इसमें लोक को महत्व दिया गया है और परलोक के प्रति अविश्वास जताया गया है। यह मत मोक्ष, धर्म, दर्शन, ईश्वर, ब्रह्म इत्यादि का विरोधी है। ये सम्प्रदाय उन्हीं चीजों की सत्ता में विश्वास करता है जिसे मानव बुद्धि एवं इन्द्रियों से अनुभव किया जा सकता है। अर्थात् यह सम्प्रदाय सिर्फ प्रत्यक्ष प्रमाण को ही स्वीकार करता है। चार्वाक के भौतिकवादी विचार से कुंठित होकर आडंबर और कर्मकाण्ड के ठेकेदारों ने इन्हें बदनाम करने के लिए इस मत को खूब उछाला ‘जब तक जियें सुख से जियें, कर्ज लेकर घी पियें’।

शून्यवाद –

यह मत शून्य को ही अन्तिम सत्य स्वीकार करता है। माध्यमिक या शून्यवाद मत के प्रवर्तक नागार्जुन थे। इन्होंने माध्यमिककारिका और प्रज्ञापारमिताशास्त्र की रचना की। नागार्जुन के प्रतीत्यसमुत्पाद को ही शून्यता कहा जाता है। शून्यवाद सम्प्रदाय को सापेक्षवादी भी कहा जाता है। क्योंकि प्रत्येक वस्तु किसी न किसी कारण से उत्पन्न हुई है और वह उस पर निर्भर करती है। महात्मा बुद्ध के मध्यमार्ग को इस मत में विकसित किया गया है। नागार्जुन ने कहा कि यह संसार मिथ्या है तो निर्वाण भी मिथ्या है।

वज्रयान सम्प्रदाय –

बौद्ध धर्म आगे चलकर बहुत से छोटे-छोटे सम्प्रदायों में विभाजित हो गया। उसी में एक था वज्रयान सम्प्रदाय़। इसे मंत्रयान भी कहा जाता था। इसका उद्भव 5वीं-6ठी शताब्दी के बीच हुआ। यह सम्प्रदाय ज्ञान एवं आचार के स्थान पर तंत्र-मंत्र, माँस, मैथुन इत्यादि पर बल देता था। वज्रयान में गौतम बुद्ध को आदि बुद्ध की संज्ञा दी गई है। आदि बुद्ध के मानवाकृति रूप को वज्रधर कहा गया। 9वीं शताब्दी में नालंदा वज्रयान का प्रमुख केंद्र बन गया। इसके आचार्यों को 84 सिद्ध या सिद्धाचार्य या सरहपा कहा जाने लगा। ‘गुह्य समाज’ और ‘मञ्जुश्रीकल्प’ इस सम्प्रदाय के प्रमुख ग्रंथ हैं। इसमें बुद्ध या बोधिसत्व की पत्नी तारा देवी को माना गया है। धरणियों का इस सम्प्रदाय में महत्वपूर्ण स्थान है। इस सम्प्रदाय ने बौद्ध धर्म के पतन का मार्ग प्रशस्त किया।

सांख्य दर्शन –

यह सबसे प्राचीन षड्दर्शन है। कपिल मुनि सांख्य दर्शन के प्रवर्तक हैं। सांख्य दर्शन का प्राचीनतम ग्रंथ ईश्वर कृष्ण की सांख्यकारिका है। यह दर्शन संसार की उत्पत्ति को ईश्वर से न होकर पुरुष एवं प्रकृति के संयोग से मानता है। यह सृष्टि के तीन गुण – सतगुण, रजगुण, तमगुण मानता है। इसे ही त्रिगुण सिद्धांत कहा गया। यह दर्शन ईश्वर की विचारधारा का खण्डन नहीं करता है। हालांकि ये लोग अपनी आराधना पद्यति में ईश्वर की आवश्यकता नहीं मानते।

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योग दर्शन –

पतंजलि को योग का प्रणेता माना जाता है। इन्होंने योगसूत्र की रचना की। यह भारतीय तर्कविद्या का सबसे प्राचीन ग्रंथ है। इनके अनुसार आसन एवं प्राणायाम के माध्यम से मोक्ष की प्राप्ति की जा सकती है।

न्याय दर्शन –

न्याय दर्शन का प्रवर्तक गौतम (अक्षपाद) को माना जाता है। इन्होंने न्याय सत्र की रचना की। यह भारतीय तर्क विद्या का प्राचीनतम ग्रंथ है। इसके अनुसार तर्क (प्रमाण) के आधार पर ही किसी तथ्य को स्वीकार किया जा सकता है। प्रमाण की चार विधियां हैं – प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द, उपमान।

वैशेषिक दर्शन –

उलूक कणाद मुनि को वैशेषिक दर्शन का प्रवर्तक माना जाता है। वैशेषिक सूत्रों की रचना इन्हीं ने की। इनके अनुसार पांच महाभूतों के मेल से ही वस्तुओं का निर्माण होता है। ये पंचमहाभूत पदार्थ हैं – जल, वायु, अग्नि, आकाश, पृथ्वी। भारत में परमाणुवाद की स्थापना एवं भौतिक शास्त्र के आरंभ का श्रेय उलूक कणाद को ही दिया जाता है।

मीमांसा दर्शन –

जैमिनीय को मीमांसा दर्शन का प्रवर्तक माना जाता है। प्रभाकर भट्ट और कुमारिल भट्ट इसी दर्शन से संबंधित हैं। इन्होंने यज्ञिक वैदिक परम्परा का समर्थन किया। कुमारिल ने ही बौद्धों के मत का खण्डन कर वेदों की प्रमाणिकता सिद्ध की। यह दर्शन वैदिक देवताओं का मंत्रो से पृथक कोई अस्तित्व नहीं मानता। मीमांसा दर्शन के अनुसार वेद द्वारा विदित कर्म ही धर्म है। इस दर्शन ने यज्ञ का समर्थन किया, वेदों को नित्य व अपौरुषेय स्वीकार किया।

वेदांत दर्शन –

बादरायण को वेदांत दर्शन का प्रवर्तक माना जाता है। इन्होंने ब्रह्मसूत्र की रचना की। वेदांत दर्शन का मूल उपनिषद हैं, क्योंकि उपनिषदों को वेद का अंत माना जाता है। शंकराचार्य व रामानुज ने कालांतर में ब्रह्मसूत्र पर महाभाष्य लिखे। शंकराचार्य निर्गुण ब्रह्म के उपासक थे और ज्ञान की ईश्वर की प्राप्ति का साधन मानते थे। वहीं रामानुज सगुण ब्रह्म के उपासक थे और भक्ति को मोक्ष प्राप्त का साधन स्वीकार करते थे। इस दर्शन ने ब्रह्म को ही वास्तविक सत्य स्वीकार किया है। इसके अतिरिक्त सब कुछ माया है।

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