प्रमुख समितियां : Pramukh Samitiyan

प्रमुख समितियां : Pramukh Samitiyan

प्रमुख समितियां : Pramukh Samitiyan – लकड़ावाला, सुरेश तेंदुलकर, सी. रंगराजन समिति, लोकलेखा, प्राक्कलन समिति, लोक उपक्रम समिति।

लकड़वाला समिति –

  • अध्यक्ष – प्रो. डी. टी. लकड़ावाला
  • गठन – 1989
  • उद्देश्य – देश में निर्धनता की माप
  • रिपोर्ट प्रस्तुत की – 1993 में

योजना आयोग ने देश में निर्धनता की माप करने के उद्देश्य से 1989 ई. में प्रो. डी. टी. लकड़ावाला की अध्यक्षता में इस समिति का गठन किया था। 4 साल के कार्य के बाद इस समिति ने अपनी रिपोर्ट 1993 में प्रस्तुत की। समिति ने मूल्य स्तर के आधार पर प्रत्येक राज्य में अलग-अलग निर्धनता रेखा का निर्धारण किया। अर्थात् हर राज्य की निर्धनता रेखा अलग-अलग होगी। इसके अनुसार 35 गरीबी रेखाएं बताई गईं, जिनकी संख्या शुरु में 28 थी।

समिति ने हर राज्य में गाँव व शहरी निर्धनता हेतु अलग-अलग मूल्य सूचकांकों का निर्धारण किया। कृषि श्रमिकों के लिए समिति ने ‘उपभोक्ता मूल्य सूचकांक’ का सुझाव दिया। समिति ने शहरी क्षेत्र में निर्धनता रेखा के लिए औद्योगिक श्रमिकों के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक और शहरी भिन्न कर्मचारियों हेतु उपभोक्ता मूल्य सूचकांक सुझाया। समिति के सुझाव के परिणामस्वरूप कोई विशिष्ट अथवा निर्धारित निर्धनता रेखा नहीं रही। इसके स्थान पर राज्य विशिष्ट निर्धनता रेखा हुई। जिनके एक राष्ट्रीय निर्धनता रेखा का निर्धारण किया जा सका।

सुरेश तेंदुलकर समिति –

  • अध्यक्ष – सुरेश तेंदुलकर
  • गठन – 2004 में
  • रिपोर्ट प्रस्तुत की – 2009 में
  • उद्देश्य – यह जांच करना कि भारत की गरीबी वास्तव में गिर रही है या नहीं।

योजना आयोग ने 2004 ई. में भारत के अर्थशास्त्री सुरेश तेंदुलकर की अध्यक्षता में इस समिति का गठन किया। इस समिति ने अपनी रिपोर्ट 2009 ई. में प्रस्तुत की। इस समिति का गठन मुख्य रूप से यह पता करने के लिए किया गया था कि भारत की गरीबी वास्तव में कर हो रही है कि नहीं। साथ ही नई गरीबी रेखा और गरीबी के संबंध में अनुमान प्रस्तुत करना था। इस समिति ने जीने के लिए अदा की जाने वाली कीमत (Cost of Living Index) की बात की। इस समिति ने गरीबी रेखा का निर्धारण उपभोक्ताओं द्वारा लिए जाने वाले खाद्यान्न के अतिरिक्त कुछ अन्य बुनियादी आवश्यकताओं के आधार पर किया। ये आवश्यकताएं थीं – शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छ वातावरण, बुनियादी संरचना, महिलाओं की काम तथा लाभ तक पहुँच के आधार पर किया।

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इस समिति ने ग्रामीण व शहरी दोनों उपभोक्ताओं हेतु एक ही उपभोक्ता बास्केट का उपभोग किया। समिति ने गरीबी रेखा के निर्धारण हेतु जीवन निर्वाह लागत सूचकांक यानी ‘प्रति व्यक्ति उपभोक्ता व्यय’ को आधार बनाया। अध्ययन के बाद समिति की रिपोर्ट के अनुसार शहरी जनसंख्या का 25.7% और ग्रामीण जनसंख्या का 41.8% गरीबी रेखा से नीचे था। वहीं संपूर्ण भारत के स्तर पर देखा जाए तो 37.2% जनसंख्या गरीबी रेखा के नीचे थी।

सी. रंगराजन समिति –

  • गठन – 2012 में
  • अध्यक्ष – सी. रंगराजन
  • रिपोर्ट प्रस्तुत की – जुलाई 2014 में

योजना आयोग ने 2012 में सी. रंगराजन की अध्यक्षता में इस समिति का गठन किया। आयोग ने इसे तेंदुलकर समिति की जगह गठित किया था। सी. रंगराजन समिति ने अपनी रिपोर्ट जिलाई 2014 में प्रस्तुत की। इस समिति ने तेंदुलकर समिति के आकलन के तरीकों को खारिज किया। रंगराजन समिति की रिपोर्ट के अनुसार 2011-12 में 29.5 प्रतिशत लोग गरीब थे। जब्कि तेंदुलकर समिति ने गरीबों की संख्या 21.9 प्रतिशत बताई थी। इसमें शहरी जनसंख्या के 26.4 प्रतिशत और ग्रामीण जनसंख्या का 30.09 प्रतिशत गरीबी रेखा से नीचे थी।

संसद की प्रमुख समितियां Pramukh Samitiyan

लोकलेखा समिति –

  • सदस्य संख्या – 22
  • अध्यक्ष – विपक्ष का सदस्य

यह एक संसदीय समिति है। यह समिति मुख्य रूप से केंद्र सरकार के विनियोग लेखाओं पर नियंत्रण एवं महालेखा परीक्षक के प्रतिवेदन की समीक्षा करती है। समिति यह समाधान करती है कि जिस राशि का आवंटन हुआ है, क्या उसका प्रयोग उसी के लिए किया जा रहा है। जिसके लिए उस राशि को उपलब्ध किया गया है। इस समिति में कुल 22 सदस्य होते हैं। इनमें 15 सदस्य लोकसभा से होते हैं। इनका चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व के आधार पर एकल संक्रमणीय मत पद्यति से होता है। बाकी 7 सदस्य राज्यसभा से नामनिर्दिष्ट किये जाते हैं।

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कोई मंत्री इस समिति का सदस्य निर्वाचित नहीं हो सकता है। यदि कोई व्यक्ति समिति का सदस्य बनने के बाद मंत्री बनता है। तो मंत्री बनने की तिथि से वह समिति का सदस्य नहीं रहेगा। सदस्यों की अवधि 1 वर्ष की होती है। इस समिति का अध्यक्ष विपक्ष का कोई सदस्य होता है। अध्यक्ष को दूसरे वर्ष फिर से भी चुना जा सकता है।

प्राक्कलन समिति –

  • सदस्य संख्या – 30 (अधिकतम)

इसका गठन सरकार द्वारा प्रस्तावित व्यय की समीक्षा करने के लिए किया गया है। यह समिति सरकार की आर्थिक नीतियां बनाती है। इन नीतियों के क्रियान्वयन हेतु संसद के समक्ष मांग प्रस्तुत करती है। लोकलेख समिति का गठन लोकसभा में बजट प्रस्तुत किये जाने के बाद किया जाता है। प्रकरणों की जांच करने के संबंध में यह समिति सुझाव देती है। इस समिति के सदस्यों का चयन आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्यति से एकल संक्रमणीय मत के द्वारा किया जाता है।

कोई मंत्री इस समिति का सदस्य नहीं हो सकता। समिति का सदस्य बनने के बाद यदि कोई मंत्री बनता है। तो मंत्री बनने के बाद समिति से उसकी सदस्यता समाप्त हो जाएगी। इसके सदस्य अधिकतम 1 वर्ष के लिए चुने जाते हैं। समिति साल भर कार्य करती है और अपने प्रतिवेदन संसद के समक्ष रखती है। प्राक्कलन समिति के प्रतिवेदन पर संसद में बहस नहीं होगी। सरकार की अनुदान मांगें इस समिति के प्रतिवेदन की प्रतीक्षा नहीं करती। यह समिति उपयोगी सुझाव देती है। आगामी वित्त वर्ष में सरकार को बढ़ा-चढ़ाकर मांग करने से रोकती है।

लोक उपक्रम समिति –

  • सदस्य संख्या – 22
  • सदस्यता अवधि – 1 वर्ष
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यह समिति लोकसभा के नियमों में विनिर्दिष्ट सरकार उपक्रमों के प्रतिवेदन व लेखाओं की जांच करती है। समिति सरकारी कंपनी के लेखाओं की भी जांच करती है। जिसके लेखा कंपनी अधिनियम के अधीन सदन के पटल पर रखे जाते हैं। यह समिति सरकारी उपक्रमों के संबंध में नियंत्रण एवं महालेखा परीक्षक के प्रतिवेदनों की जांच करती है। यह समिति ये भी देखती है कि सरकारी उपक्रम समुचित व्यापारिक सिद्धांतों व विवेकपूर्ण वाणिज्यिक प्रादर्शों के अनुरूप कार्य कर रहें हैं अथवा नहीं। इसके अतिरिक्त अध्यक्ष द्वारा भी समिति को कुछ विषय निर्दिष्ट किये जाते हैं। इनकी जांच भी समिति द्वारा की जाती है।

इस समिति के सदस्यों की संख्या 22 से अधिक नहीं हो सकती। इनमें 15 सदस्य लोकसभा से होते हैं। इनका चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व के आधार पर एकल संक्रमणीय मत पद्यति से होता है। बाकी 7 सदस्य राज्यसभा द्वारा नामनिर्दिष्ट किये जाते हैं। इन सदस्यों की कालावधि 1 वर्ष से अधिक नहीं होती। इस समिति में भी मंत्री सदस्य नहीं बन सकते। सदस्य बनने के बाद मंत्री बनने पर समिति की सदस्यता समाप्त हो जाएगी।

अधीनस्थ विधान समिति –

  • सदस्य – 15

यह राज्यसभा की समिति है। यह समिति किसी अधीनस्थ प्राधिकारी को प्रत्यायोजित विधायी कृत्यों के अनुसरण में बनाए गए प्रत्येक नियम, विनियम, उपवधि आदि की समीक्षा करती है। जिन्हें संसद के समक्ष रखे जाने की अपेक्षा है। इस समिति के सदस्यों की संख्या 15 होती है। ये सभी राज्यसभा के सभापति द्वारा नामनिर्दिष्ट किये जाते हैं। आकस्मिक रिक्तियां भी सभा द्वारा ही भरी जाती हैं। इसके कोरम (गणपूर्ति) के लिए 5 सदस्य होना अनिवार्य है। यह समिति नई समिति के गठन तक कार्य करती है। समय-समय पर समिति द्वारा अपने प्रतिवेदन प्रस्तुत किये जाते हैं। समिति किसी नियम, विनियम आदि के निरसित करने, संशोधन करने संबंधी सुझाव भी सभापति के समक्ष रखती है। प्रमुख समितियां Pramukh Samitiyan.

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