वैदिक काल (Vedic Kaal)

वैदिक काल

वैदिक काल (Vedic Kaal) : सैंध्व सभ्यता के पतन के बाद भारत में आर्यों द्वारा वैदिक संस्कृति की स्थापना की गई। आर्य कोई प्रजाति नहीं बल्कि एक भाषिक शब्द है, इसका अर्थ है श्रेष्ठ या कुलीन। भारत में आर्यों की पहचान नार्डिक प्रजाति से की जाती है। वेदों के संकलनकर्ता कृष्णद्वैपायन वेदव्यास हैं।

वैदिक साहित्य –

इसके अंतर्गत वेद, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद(वेदांत) आते हैं। इसके बाद सूत्र साहित्य आता है। सूत्र साहित्य वैदिक साहित्य का भाग नहीं है परंतु वैदिक साहित्य को समझने हेतु आवश्यक है। वेदों की भाषा संस्कृत एवं लिपि ब्राह्मी है। ऋग्वेद में मंत्रों की कुल संख्या 10600 है। कुछ सूक्तों की रचना गौतम राहुगढ़ ने की। किसी भी वैदिक ग्रंथ में दक्षिण के राज्यों का उल्लेख नहीं हुआ है। ऋग्वेद की 21 शाखाएं हैं, जिनमें तीन पाठ उपयोगी हैं –

  1. साकल – इसकें 1017 सूक्त हैं।
  2. बालखिल्य या परिशिष्ट – इसमें 11 सूक्त हैं।
  3. वाष्कल – इसमें 56 सूक्त हैं। इसका उल्लेख 8वें मण्डल में मिलता है।

ऋग्वेद –

इसे सनातन धर्म की पहली पुस्तक का दर्जा प्राप्त है। इसकी रचना सप्त सैंधव प्रदेश में सरस्वती नदी के तट पर हुई। ऋग्वेद में 33 प्रकार/कोटि के देवताओं का उल्लेख हुआ है। इसका रचना काल जैकोबी ने 4500ई.पू., विन्टरनित्स ने 2500-2000ई.पू. बताया। मैक्समूलर ने 1200-1000ई.पू., बताया। बाद में मैक्समूलर ने इसकी रचना 3000ई.पू. होने की संभावना प्रकट की। तिलक ने ज्योतिष गणना के अनुसार इसके अधिकांश सूक्तों की रचना 4580 ई.पू. की बताई।

ऋग्वेद का आरम्भ अग्नि की उपासना से होता है। ऋग्वेद में संग्रहीत मंत्रों को ‘ऋचा’ कहा जाता है, जो कि पद्य में हैं। ऋग्वेद को सूक्त में लिखा गया है, एक सूक्त में कम से कम तीन मंत्र होते हैं। ऋग्वेत में वर्णित – सूर्य ग्रहण, चन्द्र ग्रहण, शल्य चिकित्सा, वृहस्पति एवं जूहू की कथा, 30 दिन, असतो माँ सदगमय, पुरुमित्रा व विभेद का प्रेम विवाह। कृष्ण का पहला उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है। ऋग्वेद में किसी भी न्यायाधिकारी या कर बसूलने वाले अधिकारी का कोई उल्लेख नहीं है। बिना कर के राजा कोई स्थाई सेना भी नहीं रख पाता था।

ऋग्वेद के मण्डल –

इसमें कुल 10 मण्डल हैं। दो से सात तक के मण्डलों को वंशमण्डल कहा जाता है। इनके पहले सूक्त अग्नि को समर्पित हैं। सामूहिक रूप से वंश मण्डल के ऋषियों को ‘प्रगाथा’ कहा गया।

  1. इस मण्डल के 50 सूक्त कण्व ऋषियों द्वारा लिखे गए। इस मण्डल के ऋषियों को शतचिनः कहा गया।
  2. यह गृहत्समद ऋषि का है। इन्हें विश्व का पहला अभियांत्रिकी माना जाता है।
  3. यह मण्डल कुशिक कुल के विश्वामित्र को समर्पित है। इन्हें पहला धर्मगुरु माना जाता है। गायत्री मंत्र का उल्लेख इसी मण्डल में मिलता है, जिसकी रचना विश्वामित्र ने अनार्यों को आर्त बनाने के लिए की। यह मंत्र सवितृ को समर्पित है। यह सूर्य का रूप एवं प्रातःकाल की देवी थीं।
  4. यह मण्डल वामदेव का है। इसमें कृषि मंत्रों का उल्लेख हुआ है। इसमें लिखा है अश्विन देवता ने मनु को हल चलाना सिखाया।
  5. यह अत्रि ऋषि से संबंधित है।
  6. यह भारद्वाज ऋषि से संबंधित है।
  7. यह वशिष्ठ ऋषि से संबंधित है। यह वरुण देव को समर्पित है। इसी मण्डल में दशराज्ञ युद्ध का वर्णन है।
  8. यह कण्व ऋषि का है।
  9. यह अंगरा ऋषि का है। इसमें 144 सूक्त हैं, जो कि सोम देवता को समर्पित है। ब्राह्मण अपना देवता सोम को ही मानते थे। इस मण्डल के ऋषियों को पावमान्या कहा जाता है।
  10.  मण्डल के ऋषियों को महासुक्ता कहा जाता था। पुरुष सूक्त, नदी सूक्त व नासदीय सूक्त इसी मण्डल के भाग हैं।

दशराज्ञ युद्ध –

यह युद्ध पुरुषणी(रावी) नदी के तट पर हुआ। त्रित्सु वंश (भरत वंश) एवं 10 जनों के बीच हुआ था। ऋग्वैदिक भरतों का अधिवास सरस्वती व यमुना नदियों के बीच के क्षेत्र में था। भरतवंशी राजा सुदास ने विश्वामित्र को पुरोहित के पद से हटाकर वशिष्ठ को नियुक्त किया। तो विश्वामित्र ने 10 राजाओं का संघ गठित कर सुदास के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया। इनमें पंचजन (अनु, यदु, पुरु, तुर्वस, द्रहु) और पाँच लघु जनजातियां (शिव, पक्थ, अनिल, भलासन, विषाणिनी) थीं। पंचजनो में पुरु सबसे शक्तिशाली थे। इस युद्ध में पुरु कबीले का राजा पुरुकुत्स मारा गया। इस युद्ध में अनार्य दोनो तरफ से लड़े थे। इनमें तीन अनार्य कबीले (अजा, यक्ष, शिग्रु) थे। इस युद्ध में भरतवंशी सुदास की जीत हुई, उसी के नाम पर देश का नाम भारत पड़ा।

पुरुष सूक्त –

वर्ण व्यवस्था की प्राचीनतम जानकारी व शूद्र वर्ण का पहला उल्लेख इसी सूक्त में मिलता है। इसके अनुसार आदिपुरुष(ब्रह्मा) के मुख से ब्राह्मण, भुजाओं से क्षत्रिय, जांघ से वैश्य और पैरों से शूद्र वर्ण की उत्पत्ति हुई है। इसके 95वें सूक्त में पुरुरवा, उर्वशी, ऐल संवाद है।

नासदीय सूक्त

पहली बार निर्गुण ब्रह्म (एकेश्वरवाद) की चर्चा इसी सूक्त में हुई है।

ऐतरेय ब्राह्मण –

इसके संकलनकर्ता महिदास हैं। इतरा के पुत्र होने के कारण ये ऐतरेय कहलाए और इनके द्वारा रचित ब्राह्मण ऐतरेय। सायणाचार्य ने ‘सायण संग्रह’ नाम से ऐतरेय ब्राह्मण पर टीका लिखी। ये बुक्का प्रथम एव हरिहर द्वितीय के दरबार में थे। इसमें राज्याभिषेक के नियम, राज्याभिषेक व राजा की उत्पत्ति का सिद्धांत, समुद्र का उल्लेख, शुनः शेप की कथा, राजसूय यज्ञ, सोमयज्ञ, एन्द्रा महाभिषेक यज्ञ वर्णित हैं। इसमें राजा को विशमत्ता (वैश्य का भक्षण करने वाला), धर्मस्यगोप्ता (धर्म का रक्षक), लड़की को क्रपण (दुख देने वाली), जर-जोरु-जमीन को संघर्ष का कारण बताया गया है।

आरण्यक : ऋग्वेद के दो आरण्यक हैं – ऐयरेय, कौषीतकी।

उपनिषद : ऋग्वेद के दो उपनिषद – ऐतरेय, कौषीतकी हैं।

ऋग्वैदिक देवता –

यास्क ने निरुक्त में देवताओं को तीन श्रेणियों में रखा है।

पृथ्वी के देवता – अग्नि, सोम, बृहस्पति, आपानपात।

अन्तरिक्ष के देवता – इन्द्र, रुद्र, प्रजापति, पर्जन्य।

द्युस्थान(आकाश के देवता) – वरुण, मित्र, विष्णु, घौस।

घौ(घौस) –

आर्यों के सबसे प्राचीन देवता थे। इन्हें आर्यों का पिता कहा जाता है। इनका प्रतीक वृषभ था। इन्द्र ऋग्वेद के सबसे महत्वपूर्ण देवता थे। इनके बाद वरुण व अग्नि का स्थान था।

ऋग्वेद के सर्वाधिक (250) सूक्त इंद्र को इसके बाद अग्नि (200 सूक्त) को समर्पित हैं। आकाश के सबसे प्रमुख देवता सूर्य थे, इन्हें देवताओं का गुप्तचर कहा जात था। अश्विन(नासत्य) को देवताओं का चिकित्सक(भीषक) कहा जाता था। इनकी सवारी गदहा था। ‘मित्र’ शपथ व प्रतिज्ञा के देवता थे। पूषन मार्गों की रक्षा करते थे, इनकी सवारी बकरा था। वरुण समुद्र के देवता थे, इनकी उपाधि असुर सम्राट की थी। वरुण का उल्लेख ईरानी ग्रंथ जिंद अवेस्ता में हुआ है। उत्तर वैदिक काल में विष्णु ने वरुण का स्थान ले लिया। मरुत तूफान के देवता थे और पर्जन्य वर्षा के देवता थे। देवता हिरण्यगर्भ की उत्पत्ति समुद्र से मानी जाती है। सरस्वती अरण्यानी – जंगल की देवी थीं। ऋग्वैदिक काल में यज्ञ की अपेक्षा प्रार्थना का विशेष महत्व था।

सामवेद –

साम का अर्थ है ‘गान’। सामवेद को भारतीय संगीत का मूल ग्रंथ माना गया है। यह पद्य में लिखा गया है। यह वेद सूर्य देवता को समर्पित है। सामवेद के प्रथम दृष्टा जैमिनी थे, वहीं सुकर्मा ने कालान्तर में सामवेद का विस्तार किया। सामवेद में कुल 1869 मंत्र हैं, इनमें से 1474 मंत्र ऋग्वेद से लिए गए हैं। मात्र 75 मंत्र ही इसके अपने हैं। गीता में श्रीकृष्ण ने स्वयं को वेदों में सामवेद कहा है। लेकिन सामवेद इतिहासवेत्ता के लिए निरर्थक है। सामवेद की तीन शाखाएं – कौथुम संहिता, जैमिनी संहिता (तलवकार), राणायनीय संहिता। आर्चिक एवं उत्तरार्चिक सामवेद के भाग हैं।

सामवेद के ब्राह्मण –

पंचविश ब्राह्मण को ताण्डव ब्राह्मण एवं महाब्राह्मण कहा जाता है। इसमें 25 अध्याय हैं। सामवेद के षडविश ब्राह्मण (अद्भुद ब्राह्मण) में जादू-टोना, भूकम्प आदि के निदान का वर्णन है। इसमें 26 अध्याय हैं। यह पंचविश ब्राह्मण का ही परिशिष्ट है। ऋषियों की वंशावलियां वंश ब्राह्मण में दी गई हैं। विभिन्न व्रतों का वर्णन सामविधान ब्राह्मण में दिया गया है। जैमिनीय(तलवकार) ब्राह्मण पंचविश ब्राह्मण से भी अधिक प्राचीन है।

सामवेद के दो आरण्यक – जैमिनीय आरण्यक, छान्दोग्य आरण्यक हैं।

सामवेद के उपनिषद – छान्दोग्य उपनिषद सबसे प्राचीन है। इसमें ‘सर्व खल्विदं ब्रह्म’ अर्थात ब्रह्म ही सब कुछ है कहकर अद्वैतवाद की स्थापना की गई है।

यजुर्वेद –

इसमें वेद का उद्भव ‘वायु’ से माना गया है। इसे गति या कर्म का वेद भी कहा जाता है। यह एक कर्मकाण्डीय वेद है, जो बलिदान धर्म की स्थापना करता है। इसे यज्ञवेद भी कहा जाता है। इसमें राजसूय से संबंधित अनुष्ठानों का उल्लेख हुआ है। यह वेद पद्य के साथ गद्य में भी है। इसके दो भाग हैं – शुक्ल यजुर्वेद और कृष्ण यजुर्वेद। शुक्ल यजुर्वेद की दो शाखाएं (कण्व, माध्यन्दिनी) और कृष्ण यजुर्वेद की चार शाखाएं (कठ, मैत्रेयी, तैत्तिरीय, कपिष्ठल) हैं।

शुक्ल यजुर्वेद पद्य में है और कृष्ण यजुर्वेद पद्य व गद्य दोनो में हैं। शुक्ल यजुर्वेद के सभी मंत्र शुद्ध हैं अतः इसे वास्तविक वेद कहा गया। कृष्ण यजुर्वेद में यज्ञ की विधि के साथ-साथ आर्थिक व न्यायिक प्रक्रियाओं का भी उल्लेख है। इसीलिए इसे अशुद्ध वेद कहा जाता है। शुक्ल यजुर्वेद को बाजसनेयी संहिता भी कहा जाता है। क्योंकि इसके दृष्टा वाजसनेयी के पुत्र याज्ञवल्क्य थे। चाँदी का पहला उल्लेख रजतहिरण्य के नाम से यजुर्वेद में हुआ है।

शतपथ ब्राह्मण –

यह शुक्ल यजुर्वेद का ब्राह्मण ग्रंथ है। यह सबसे प्रचीन व सबसे बड़ा ब्राह्मण ग्रंथ है, यह 14 काण्डों (अध्यायों) में विभक्त है। इसके लेखक याज्ञवल्क्य हैं। इसे लघुवेद व ऐतिहासिक वेद की संज्ञा दी गई है। इसमें याज्ञवल्क्य-मैत्रेयी संवाद, विदेह माधव की कथा, पुरुषमेद्य यज्ञ का वर्णन, रामकथा, मत्स्यावतार की कथा, जलप्लावन की कथा, दुष्यंत पुत्र भरत की कथा, कृषि संबंधी प्रक्रियाएं, पुनर्जन्म का सिद्धांत, अश्विनी कुमार द्वारा च्यवन ऋषि के यौवन को दान करना, पुरुरवा-उर्वशी आख्यान का वर्णन है।

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प्राचीन इतिहास के साधन के रूप में ऋग्वेद के बाद शतपथ ब्राह्मण का ही नाम आता है। इसी में स्त्री को अर्द्धांगिनी कहा गया है। यह ब्राह्मणों को समाज में सर्वोच्च स्थान प्रदान करता है। इसका एक अध्याय कृषि कर्म (जुताई, बुआई आदि) से संबंधित है। इसमें राजा जनक को हल चलाते बताया गया है। पुरुषमेद्य यज्ञ का पहला उल्लेख इसी ग्रंथ में मिलता है। इसमें 11 पुरुषों की बलि दी जाती थी।

तैत्तिरीय ब्राह्मण कृष्ण यजुर्वेद का ब्राह्मण है। तैत्तरीय ब्राह्मण में पंच महायज्ञ व तीन ऋणों का उल्लेख मिलता है।

यजुर्वेद के आरण्यक – वृहदकारण्यक, तैत्तिरीय, शतपथ। अहिल्या आख्यान तैत्तिरीय आरण्यक में मिलता है।

वृहदकारण्यक उपनिषद –

इसके प्रवक्ता याज्ञवल्क्य हैं। इसमें क्षत्रिय जनक द्वारा ब्राह्मण याज्ञवल्क्य को शिक्षा व गार्गी-याज्ञवल्क्य संवाद, विदुषी पुत्री की प्राप्ति हेतु अनुष्ठान का उल्लेख मिलता है। इसमें वर्णित है दमन, दान, दया की शिक्षा सदैव देनी चाहिए।

तैत्तरीय उपनिषद में गुरु-

शिष्य व्यवहारों की आदर्श रूपरेखा खींची गई है। इसमें अतिथि देवो भवः, सदा सत्य बोलो, खूब अन्न उपजाओ आदि वाक्य मिलते हैं।

कठोपनिषद में यम-

नचिकेता संवाद दिया है। इसमें यम ने नचिकेता को ओउम और आत्मा का महत्व समझाया। आत्मा को पुरुष मानते हुए यम ने कहा “आत्मा का न तो कभी जन्म होता है और न ही मृत्यु, यह अजन्मा व अनश्वर है’’। इसी उपनिषद से सांख्य शब्दों की जानकारी मिलती है।

श्वेताश्वर उपनिषद में परमात्मा को रुद्र तथा दुनिया को माना कहा गया है। मोक्ष व नवधा भक्ति की चर्चा इसी उपनिषद में की गई है।

मैत्रायणि उपनिषद में स्त्रियों को ‘जुँआ एवं शराब का योग’ बताया गया है। इसमें त्रिमूर्ति का उल्लेख हुआ है। इसी में पहली बार निराशावाद के तत्व दृष्टिगत होते हैं।

इशोपनिषद का प्रमुख विषय आध्यात्मिक चिन्तन है। गीता में वर्णित ‘निष्काम कर्म’ का प्रतिपादन सबसे पहले इशोपनिषद में मिलता है।

अथर्ववेद –

इसकी रचना अथर्वा ऋषि ने की थी। इसके दूसरे द्रष्टा अंगिरस ऋषि थे। इसलिए इसे अथर्वांगिरस वेद भी कहा जाता है। यह वेद आर्य व अनार्य दोनों की संयुक्त रचना है। इस वेद को वेदत्रयी में शामिल नहीं किया गया है। यज्ञ में बाधा का निराकरण इस वेद में वर्णित है। यह वेद गद्य व पद्य में है। यह सर्वाधिक लोकप्रिय वेद है। अथर्ववेद में 20 काण्ड(अध्याय), 731 सूक्त, 6000 मंत्र हैं। अथर्ववेद को श्रेष्ठ वेद, ब्रह्मवेद, महिवेद, सतवेद, भृगुवेद, सतवेद की संज्ञा दी गई है। अथर्ववेद एकमात्र ऐसा वेद है जिसका कोई आरण्यक नहीं है। अथर्ववेद का एकमात्र ब्राह्मण ग्रंथ गोपथ ब्राह्मण है।

अथर्ववेद के उपनिषद – मुण्डक, माण्डूक्य, प्रश्न उपनिषद।

मुण्डक उपनिषद में ‘सत्यमेव जयते’, विद्या के दो प्रकार (परा व अपरा), यज्ञ की तुलना टूटी नाव का उल्लेख है।

माण्डूक्य उपनिषद में दुनिया की उत्पत्ति ब्रह्म से बताई गई है। यह ब्रह्म सगुण भी है और निर्गुण भी।

प्रश्नोपनिषद ऋषि पिप्पलाद व 6 ऋषियों के वार्तालाप का संकलन है।

अथर्ववेद में वर्णित बातें –

  • परीक्षित का पहला उल्लेख (मृत्युलोक के देवता के रूप में)
  • अथर्ववेद के राजतिलकोत्सव मंत्र से जनता द्वारा राजा के चुनाव का उदाहरण मिलता है। अथर्ववेद में राजा को राष्ट्रभृत्य कहा गया है।
  • एक मंत्र में ‘स जायके पुनः’ कहकर पुनर्जन्म की ओर इशारा किया गया है।
  • इसमें स्वर्ग, राष्ट्रभाषा, राष्ट्रमहिमा, पुराण, भूत-प्रेत, वशीकरण, भूकंप, विपत्ति-व्याधियों का उल्लेख मिलता है।
  • वैदिक काल में वर्षा कराने के मंत्रों के साथ-साथ कीड़ों के विनाश का उपाय बताया गया है।
  • मगध(कीकट) व अंग का पहला उल्लेख व अयोध्या का उल्लेख। अयोध्या का उल्लेख ऋग्वेद के 10वें मण्डल में भी मिलता है, परंतु यह मण्डल अथर्ववेद के बाद का है। मगध के लोगों को अथर्ववेद में ब्रात्य कहा गया है।
  • इसके पृथ्वी सूक्त में वर्णित है – भूमि माता है और मैं उसका पुत्र हूँ।
  • अथर्ववेद में नष्ट हुए राष्ट्र की तुलना पानी भरी हुई टूटी नाव से की गई है।
  • आयुर्वेद(जीवन का विज्ञान) का पहला उल्लेख अथर्ववेद में ही मिलता है।
  • अथर्ववेद में वर्णित है ‘युद्ध पहले मस्तिष्क में लड़ा जाता है, भूमि का प्रयोग इसके बाद में होता है’।
  • वैदिक काल में नहरों का पहला उल्लेख अथर्ववेद में मिलता है।
  • गन्ने का प्रारंभिक वर्णन अथर्ववेद में मिलता है।
  • अथर्ववेद के अनुसार पृथ्वैन्यु (कृषि का देवता) ने मनु को हल चलाना सिखाया।

 

ऋग्वेद या पूर्व वैदिक काल  का विस्तार क्षेत्र –

जहाँ सैंधव सभ्यता पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान तक विस्तृत थी।

वहीं ऋग्वैदिक आर्यन्स इसके साथ-साथ अफगानिस्तान तक फैले थे।

सप्तसैंधव प्रदेश (सिंधु, सरस्वती व पंजाब की 5 नदियों का क्षेत्र) आर्यन्स का पहला निवास स्थान था, यहीं पर ऋग्वेद की रचना हुई।

आर्यों का मूल –

इस बार में सभी इतिहासकार एकमत नहीं हैं। कुछ इसका मूल स्थान भारत तो कुछ इसके बाहर मानते हैं। भगवानदास गिडवानी ने अपनी पुस्तक ‘Return of The Aryans’ में भारत को ही आर्यन्स का मूल स्थान बताया है। तिलक ने अपनी पुस्तक ‘Arctic Home in the Vedas’ में आर्यों का मूल स्थान आर्कटिक (उत्तरी ध्रुव) बताया है। The Aryan’s गार्डेन चाइल्ड की पुस्तक है।

  • पं. गंगानाथ झा – ब्रह्मऋषि देश
  • डी. एस. त्रिवेदी – मुल्तान स्थित देविका
  • एल. डी. कल्ल – कश्मीर या हिमालय
  • दयानन्द सरस्वती, व पार्टीजर – तिब्बत
  • बालगंगाधर तिलक – आर्कटिक (उत्तरी ध्रुव)
  • मैक्समूलर – मध्य एशिया
  • रोडस – बैक्ट्रिया
  • पेनका व हर्ट – जर्मनी
  • पी. गाइल्स – डेन्यूब घाटी (हंगरी, यूरोप)
  • नेहरिंग व गार्डेन चाइल्ड – यूक्रेन

वैदिक काल से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य –

  • ऋग्वेद में रेखागणित के साथ अंकगणित के क्षेत्र की भी जानकारी मिलती है।
  • वैदिक संहिताओं में अशुद्धियां रोकने हेतु अनुक्रमणीय ग्रंथ लिखे गए। ये न वैदिक साहित्य के अंतर्गत आते हैं न वेदांग के। शौनक ने ऋग्वेद पर 10 अनुक्रमणीय ग्रंथ लिखे।
  • सर्वानुक्रमणी ग्रंथ कात्यायन ने लिखा।
  • वृहत्सर्वानुक्रमणीय ग्रंथ अथर्ववेद से संबंधित अनुक्रमणीय ग्रंथ है।
  • विवाह को एक संस्था के रूप में दीर्घतमा ऋषि ने स्थापित किया।
  • भारतीय नाटक के आरंभिक सूक्त ऋग्वेद के संवाद सूक्त में मिलते हैं।
  • विवाह गीतों का पहला उल्लेख ऋग्वेद के विवाह सूक्त में मिलता है।
  • संस्कृत गद्य का प्राचीनतम रूप ब्राह्मण ग्रंथ ही हैं।
  • ऋग्वेद के दो ब्राह्मण ग्रंथ हैं – ऐतरेय ब्राह्मण या पंञ्चिका, कौषितकी या शंखायन ब्राह्मण।
  • कौषीतकी ब्राह्मण में विभिन्न प्रकार के यज्ञ विधान दिये हैं।
  • कृष्ण का पहला उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है।
  • परंतु ‘देवकी के पुत्र’ के रूप में कृष्ण का पहला उल्लेख छांदोग्य उपनिषद में मिलता है। इसमें कृष्ण को घोर अंगिरस का शिष्य बताया गया है।
  • उद्दालक आरुणि एवं उनके पुत्र श्वेतकेतु के बीच हुए वार्तालाप का विवरण छांदोग्य उपनिषद में मिलता है।
  • विवाह गीतों का प्राचीनतम उल्लेख छांदोग्य उपनिषद में मिलता है।
  • छांदोग्य उपनिषद में धर्म के तीन स्कंध बताए गए हैं। इसमें कहा गया है दान नित्य करना चाहिए।
  • “ब्राह्मण केवल दान पाने वाला है, राजा जब चाहे उसके हटा सकता है’’ – ऐतरेय ब्राह्मण।
  • “राजा को ब्राह्मण को चारों दिशाएं दे देनी चाहिए’’ – शतपथ ब्राह्मण
  • अथर्ववेद का फारसी अनुवाद अब्दुल कादिर बदाय़ूंनी ने शुरु किया, इब्राहिम सरहिंदी ने पूर्ण किया।
  • प्रारंभ में वेदों का अध्ययन गायत्री मंत्र के साथ प्रारंभ किया जाता था। किंतु बाद में इसके साथ अलग-अलग देवता जुड़ गए।
  • वैदिक काल में ऋग्वेद के अध्ययन से पूर्व पृथ्वी का आह्वान तथा अग्नि को आहुति दी जाती थी।
  • सामवेद के अध्ययन से पूर्व घौस का आह्वान तथा सूर्य को आहुति दी जाती थी।
  • यजुर्वेद के अध्ययन से पूर्व अंतरिक्ष का आह्वान तथा वायु को आहुति दी जाती थी।
  • अथर्ववेद के अध्ययन से पूर्व चारों दिशाओं की पूजा व आहुति दी जाती थी।
  • आर्य संस्कृति की प्रमुख विशेषता हिन्द-यूरोपीय(भारोपीय) भाषा थी। भारोपीय भाषा की संकल्पना सबसे पहले न्यायमूर्ति विलियम जोंस ने दी। इस भाषा का सबसे प्राचीन नमूना इराक से प्राप्त होता है, जो 2200 ई.पू. का है।
  • घोड़े, युद्ध के रथ, आरे वाले पहिए, दाह संस्कार, अग्नि पूजा, पशु बलि, सोमरस का पान करने की प्रथा आर्यन्स ने डाली।
  • ऋग्वैदिक लोग परलोक में विश्वास नहीं करते थे। इनका दृष्टिकोण इहलौकिक था। ये भौतिक सुखों की प्राप्ति के लिए उपासना करते थे, न कि मोक्ष के लिए।
  • वैदिक काल में आर्यों ने देवताओं का मानवीकरण किया।
  • नैतिक व्यवस्था वरुण से संबंधित थी, इसलिए इन्हें ऋतस्यगोपा कहा जाता था।
  • वैदिक धर्म में संभवतः पूर्तिपूजा व मंदिर का उल्लेख नहीं है।
  • शुरुवात में केवल तीन ही वर्ण थे, ऋग्वेद के 10वें मण्डल के पुरुष सूक्त में पहली बार शूद्र शब्द का उल्लेख हुआ।
  • ऋग्वेद में वर्ण व्यवस्था जन्मजात नहीं थी, यह कर्म आधारित थी। समाज में व्यवसाय परिवर्तन संभव था। ऋग्वेद के 9वें मण्डल में कहा गया है ‘मैं कवि हूँ, मेरे पिता वैद्य हैं तथा मेरी माँ अन्न पीसने वाली है’।
  • कुलपा (कुल का प्रमुख) के अधिकार असीमित थे, यह पुत्र को बेच भी सकता था।
  • वैदिक काल में ऋग्वेद में पत्नी को जायेदस्तम (पत्नी ही गृह है) कहा गया है।
  • विदाई के समय स्त्री को उपहार स्वरूप दिया जाने वाला धन वहतु कहलाता है।
  • ऋग्वेद में बहुत सी वदुषियों का उल्लेख हुआ है – लोपामूद्रा, घोषा, विशपला, मुद्गलानी, विश्ववारा, शची, कांक्षावृत्ति, पौलोमी आदि। विश्ववारा को ब्रह्मवादिनी व मंत्र द्रष्टा भी कहा जाता है। अगस्त ऋषि की पत्नी लोपामुद्रा राजकुल में जन्मी थी। महिलाएं सभा व समिति में भाग ले सकती थीं। लेकिन सम्पत्ति व राजनीति संबंधी अधिकार नहीं रखती थीं।
  • कपड़े पर सिलाई-बुनाई करने वाली महिलाएं ‘सीरी’ कहलाती थीं। कपड़े पर रंगाई, कढ़ाई करने वाली महिलाएं पेशेस्कारी व रजयित्री कहलाती थीं। बांस का काम करने वाली कंटकीकारी, वेंत की टोकरी बनाने वाली विदलकारी कहा जाता था।
  • ऋग्वैदिक समाज में नियोग प्रथा, अंतर्जातीय विवाह, बहुपत्नी प्रथा, विधवा पुनर्विवाह की प्रथा प्रचलित थी।
  • बाल विवाह, दास व्यवस्था, सती प्रथा, पर्दा प्रथा, तलाक, बहुपतित्व की प्रथा का प्रचलन नहीं था।
  • ऐतरेय ब्राह्मण में स्पष्ट रूप से बहुपतित्व का निशेध है।
  • आर्य वर्ण का दास वर्ण से विवाह नहीं होता था।
  • ऋग्वेद में दासों से अधिक दासियों का उल्लेख है। दास घरेलू थे, इन्हें आर्थिक उत्पादन में नहीं लगाया जाता था।
  • ऋग्वेद में नई को ‘वप्ता’ कहा जाता है। ऋग्वेद में सिर्फ एक अनाज ‘जौ’ का उल्लेख किया गया है। आर्य नमक का प्रयोग नहीं करते थे।
  • तीन प्रकार के वस्त्रों का प्रयोग करते थे – नीवी, वासस, अधिवासस(दापि)
  • नीवी – कमर के नीचे पहने जाने वाला वस्त्र
  • वासस – कमर के ऊपर पहने जाने वाला वस्त्र
  • अधिवासस(दापि) – ऊपर से ओढनी के रूप में।
  • पुरुष पगड़ी पहनते थे जिसे उष्णीश कहा जाता था।
  • ऋग्वेद में ‘निष्क’ गले का हार था, ये आगे चलकर निष्क सिक्का प्रचलित हुआ।
  • ऋग्वेद में 40 नदियों के नाम हैं, 10वें मण्डल में 42 नदियों की बात कही गई है, लेकिन गिनाए 19 ही गए। ऋग्वेद ने नदी सूक्त में 21 नदियों का उल्लेख है। ऋग्वेद में वर्णित पहली नदी ‘गंगा’ और अंतिम नदी गोमती(गोमल) है। गोमती नदी का क्षेत्र गोधन में समृद्ध था।
  • ऋग्वैदिक आर्यों की सबसे पवित्र नदी सरस्वती थी, इसे नदीतमा(नदियों की मां) कहा गया है। ईरानी ग्रंथ अवेस्ता में सरस्वती नदी को ‘हरख्वती’ कहा गया है।
  • आर्यों की सबसे विशिष्ट व असाधारण नदी सिंधु थी। नदी सूक्त में सर्वाधिक वर्णन सिंधु नदी का ही हुआ है। इसे हिरण्या भी कहा गया है, क्योंकि इस नदी में सोना पाया जाता था।
  • नदी सूक्त में विपासा(व्यास) नदी का वर्णन नहीं है। इसमें गंगा का एक बार, यमुना का तीन बार उल्लेख हुआ है। इसमें अफनानिस्तान की चार नदियों कुभा(काबुल), गोमती(गोमल), कुर्रम(क्रुमु), सुवास्तु का उल्लेख हुआ है।
  • शतपथ ब्राह्मण में दो नदियों रेवा(नर्मदा), सदानीरा(गण्डक) का उल्लेख मिलता है।
  • ऋग्वैदिक काल में कृषि की तुलना में पशुपालन की प्रधानता थी।
  • गाय की महत्ता इस बात से समझी जा सकती है कि युद्ध को गाविष्टि, गवेषण, गव्य व गमय, धनी व्यक्ति को गोमत, समय की माप को गोधूलि, गायों की खोज को गवेषणा, व दूरी की माप को गवयतुक हा जाता था।
  • पशुओं में गाय, बैल, घोड़ा, बकरी की जानकारी थी, परंतु हाथी से अनजान थे।
  • ऋग्वेद में बाघ व गैंडे का उल्लेख नहीं है।
  • गाय को अघन्या(वध न किये जाने योग्य), और अष्टकर्णी(जिसके कान छेदे गए हों) कहा जाता था।
  • ऋग्वेद में अश्व की चर्चा 215 बार, गो की 176 बार, वृषभ की 170 बार हुई है।
  • ऋग्वेद में कृषि से संबंधित केवल 24 मंत्र ही हैं।
  • ऋग्वैदिक लोगों को लोहे व चाँदी का ज्ञान नहीं था।
  • ऋग्वेद में कपास का उल्लेख नहीं है।
  • गांधार प्रदेश व पुरुष्णी (रावी) नदी का क्षेत्र ऊनी वस्त्र उद्योग का गढ़ था।
  • पणि वर्ग के लोग व्यापार करते थे, ये गैर आर्य थे जो पशुओं को भी चोरी करते थे।
  • अश्विनी कुमारो ने ‘भुज्यु’ को 100 पतवारों वाला जहाज दिया था।
  • ऋग्वेद में पुर(दुर्ग) की चर्चा मिलती है, किंतु ‘नगर’ की नहीं।
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शब्दों का ऋग्वेद में उल्लेख –

पिता-335 बार, जन-275 बार, इन्द्र-250 बार, माता-234 बार, अग्नि-200 बार, गाय-176 बार, विश-171 बार, सोम-144, विदथ-122 बार, विष्णु-100 बार। गंगा, राजा, पृथ्वी, वैश्य, सूर्य का जिक्र सिर्फ 1-1 बार हुआ है।

उत्तर वैदिक काल (1000-600ई.पू.)

इस काल में सभ्यता का केंद्र सप्तसैंधव प्रदेश से हटकर ‘मध्य देश’ हो गया। ये सरस्वती से गंगा के दोआब क्षेत्र तक विस्तृत था। पूर्व की ओर आर्यों के प्रसार का स्त्रोत शतपथ ब्राह्मण है। शतपथ में बताया गया है कि सरस्वती नदी के तट पर विदेह माधव अपने पुरोहित गौतम राहुगण के साथ रहते थे। माधव ने विश्वानर अग्नि को अपने मुख में धारण किया। पूर्व की ओर आर्यों की सीमा का निर्धारण सदानीरा (गण्डक) करती है। उत्तर वैदिक काल में लोहे का सर्वाधिक प्रयोग युद्ध उपकरण बनाने में हुआ। अथर्ववेद में स्याम(कृष्ण) अयस का उल्लेख लोहे के संदर्भ में हुआ। लोहे के साक्ष्य अंतरंजीखेड़ा, आलमगीरपुर, श्रावस्ती, हस्तिनापुर, नोह, बटेसर, नरनौल, माण्डी, जखेड़ा से मिले हैं। पहली बार लौह उपकरण अतरंजीखेड़ा (एटा, उत्तरप्रदेश) से मिले हैं।

विश्व में सबसे पहले लोहे के प्रचलन का श्रेय 1200 ई.पू. में एशिया माइनर (तुर्की) में स्थापित हित्ती साम्राज्य को दिया जाता था। परंतु झूंसी(इलाहाबाद), राजा नल का टीला(सोनभद्र), मल्हार(चन्दौली) से प्राप्त साक्ष्यों के आधार पर लोहे की प्राचीनता 1500 ई.पू. सिद्ध हुई है। परंतु लोहा इस काल में कोई क्रांतिकारी भूमिका नहीं निभा सका। समाज अब स्पष्ट रूप से वर्णव्यवस्था पर आधारित हो गया। वैश्व व शूद्र उत्पादक की भूमिका में आ गए।

उत्तर वैदिक काल में युद्ध गायों के लिए ही नहीं, अपितु क्षेत्र के लिए होने लगा। ऐतरेय ब्राह्मण में पूर्व के शासक को सम्राट, पश्चिम के शासक को स्वराट, उत्तर के विराट और दक्षिण के शासक को भोज कहा गया। इस काल में ‘विदथ’ लुप्त हो गई और सभा में स्त्री प्रवेश निषिद्ध हो गया। सभी व समिति के अधिकारों में कमी आयी। सत्ता जनजातीय से प्रादेशिक हो गई। भरत व पुरु जन मिलकर ‘कुरु राज्य’ के रूप में सामने आए, इनकी पहली राजधानी आसंदीवत बनी। जब कुरुओं ने दिल्ली के दोआब क्षेत्र को जीता तो हस्तिनापुर को राजधानी बनाया। कुरु वंशीय शासक जन्मेजय ने तक्षशिला में सर्प यज्ञ किया। अंतिम कुरु राजा निचक्षु था, ये राजधानी कौशांबी लाया।

महत्वपूर्ण तथ्य –

  • कुछ राजाओं के जनता द्वारा निर्वाचित होने का उल्लेख अथर्वेवेद में मिलता है।
  • बाजपेय यज्ञ में रथदौड़ का आयोजन होता था।
  • राजसूय यज्ञ करने वाला ‘राजा’ की, बायपेय यज्ञ करने वाला सम्राट की, अस्वमेद्य यज्ञ करने वाला स्वराज की, पुरुषमेद्य यज्ञ करने वाला विराट की, सर्वमेद्य यज्ञ करने वाला सर्वराट की उपाधि धारण करता था।
  • तैत्तरीय संहिता में प्रथम श्रेणी के अधिकारियों की कुल संख्या 12 बताई गई है।
  • क्रीवी और तुर्वस मिलकर पांचाल राज्य बने, इसकी राजधानी कम्पिल्य थी। उत्तरी पांचाल की मुख्य शाखा का संस्थापक तुर्वसु था।
  • पांचाल अपने दार्शनिक राजाओं व तत्तवज्ञानी ब्राह्मणों के लिए प्रसिद्ध था।
  • उत्तर वैदिक काल में कुरु व पांचाल सर्वश्रेष्ठ राज्य माने गए।
  • छांदोग्य उपनिषद में वर्णित है कि महर्षि बालाकि गार्ग्य ने अजातशत्रु से शिक्षा प्राप्त की।
  • कैकेय देश का दार्शनिक राजा अश्वपति था। इसने दावा किया ‘मेरे राज्य में न चोर, न मद्यप, न अविद्वान और न व्यभिचारी हैं।
  • विधेय के राजा जनक का मूल नाम सीरध्वज था। शतपथ ब्राह्मण के अनुसार जनक ने ब्राह्मणों को शास्त्रार्थ में हराया और राजन्य बन्धु की उपाधि प्राप्त की। उपनिषद काल में पांचाल का स्थान विदेह ने ले लिया।
  • अतिवृष्टि और अनावृष्टि को रोकने के लिए मंत्र अथर्ववेद में दिया है।
  • अन्न ही ब्रह्म है तैत्तिरीय ब्राह्मण में वर्णित है।
  • चावल उत्तर वैदिक कालीन फसल है।
  • अन्नों के पकने व बोने की कालावधि वाजसनेही संहिता में वर्णित है।
  • कठोपनिषद में 24 बैलों(वृक) द्वारा खेती किये जाने का उल्लेख है।
  • 100 डंडों वाले जलपोत का उल्लेख बाजसनेही संहिता में मिलता है।
  • तैत्तिरीय आरण्यक में नगर शब्द आया है। परंतु इस काल के अंतिम दौर में हम केवल नगरों का मंद आभास ही पाते हैं। इन्हें भी गर्भावस्था वाले नगर या आद्यनगरीय स्थल की संज्ञी दी गई है।
  • ऐतरेय ब्राह्मण में पुत्री को सभी दुखों का मूल बताया गया है।
  • अथर्ववेद में कन्या के जन्म की निन्दा की गई है।
  • उत्तर वैदिक काल में बाल विवाह होने लगे। इसका पहला उल्लेख छांदोग्य उपनिषद में मिलता है। अथर्ववेद में विवाह विच्छेद का उल्लेख है।
  • पर्दा व सती प्रथा प्रचलित नहीं थी। हालांकि सती प्रथा अज्ञात नहीं थी क्योंकि ऋग्वेद के 10वें मण्डल और अथर्ववेद में इसका उल्लेख मिलता है।
  • महिलाओं का उपनयन संस्कार रुक गया। फिर भी मैत्रेयी, गार्गी, कात्यायिनी जैसी कुछ विदुषियों का उल्लेख मिलता है।
  • विधवा विवाह, बहुविवाह, नियोग प्रथा पूर्व की भांति प्रचलित रही।
  • समाज में विभेदीकरण था, तीन वर्णों का ही उपनयन संस्कार होता था। चारो वर्णों की अंत्येष्टि के लिए चार प्रकार के टीलो का उल्लेख है।
  • अभी भी वर्णभेद उतना प्रखर नहीं था, जितना सूत्रकाल में देखने को मिलता है। समाज में अभी अस्पृश्यता की भावना का उदय नहीं हुआ था। अस्पृश्यता का उदय सूत्रकाल में हुआ।
  • मैत्रायणि संहिता में धनी शूत्रों का उल्लेख मिलता है।
  • शतपथ ब्राह्मण शूद्रों को सोमयज्ञ करने का अधिकार देता है।
  • वैदिक काल के समाज में अनुलोम प्रतिलोम विवाह का प्रचलन हुआ, फलस्वरूप जातियों का उदय हुआ।
  • जाति का निर्धारण सर्वप्रथम बौधायन ने किया।
  • जाति का सबसे पहला उल्लेख पाणिनी की अष्टध्यायी औऱ यास्क के निरुक्त में मिलता है।
  • पुनर्जन्म के सिद्धांत की प्रणालीगत व्याख्या छांदोग्य उपनिषद में की गई है।
  • ब्रह्मावर्त पंजाब का वह भाग था जो सरस्वती व दृश्यवती नदियों के मध्य था।
  • धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति हेतु चार आश्रमों का उल्लेख सर्वप्रथम जाबालोपनिषद में मिलता है।
    1. ब्रह्मचर्य (25 वर्ष तक) – इसकी शुरुवात उपनयन संस्कार से होती है। इस संस्कार से विद्या अध्ययन की शुरुवात होती है।
    2. गृहस्थ आश्रम (25 से 50 वर्ष तक) – इसे सभी आश्रमों का मूल व सर्वश्रेष्ठ बताया गया है। इसमें तीन पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम) की पूर्ति की जाती है। इसी आश्रम में मनुष्य तीन श्रणों (देव ऋण, ऋषि ऋण, पितृ ऋण) से मुक्ति होता है।
    3. वानप्रस्थ आश्रण (50 से 75 वर्ष तक) – इसमें दो पुरुषार्थ धर्म व मोक्ष की प्राप्ति वन में जाकर रहने से होती है।
    4. संन्यास आश्रम (75 से 100 वर्ष तक) – इसमें व्यक्ति संन्यासी जीवन जीता है। इस आश्रम का एकमात्र लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति है। विज्ञानेश्वर व कुल्लुक भट्ट ने यह व्यवस्था दी कि व्यक्ति गृहस्थ आश्रम से सीधा संन्यास आश्रम में जा सकता है।
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उत्तर वैदिक काल में केवल तीन ही आश्रम प्रचलित थे। छांदोग्य उपनिषद में केवल तीन ही आश्रमों का उल्लेख किया गया है। हालांकि संन्यास से अनजान नहीं थे, परंतु यह प्रचलन में नहीं था।

गोत्र –

‘गोत्र’ शब्द का पहला उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है।

यह गोष्ठ शब्द से निकला है। गोष्ठ ऐसा स्थान था जहाँ आर्य गायों को पालते थे।

ऋग्वैदिक काल में गोत्र शब्द का यही अर्थ था।

उत्तर वैदिक काल में इसका अर्थ एक ही मूल व्यक्ति से उत्पन्न लोगों के समुदाय से हा गया।

अतः गोत्र व्यवस्था उत्तर वैदिक काल में ही स्थापित हुई, जिसका पहला उल्लेख अथर्ववेद में मिलता है।

सगोत्रीय विवाह निषेध था।

महत्वपूर्ण तथ्य –

  • वैदिक काल में कपास को कोई साक्ष्य नहीं मिला है। कपास का पहला उल्लेख पाणिनी की अष्टध्यायी में मिलता है।
  • तैत्तिरीय ब्राह्मण के अनुसार अपत्नीक पुरुष यज्ञ का अधिकारी नहीं है, इसलिए पत्नी सहधर्मिणी है।
  • पुनर्विवाहित स्त्री के लिए पुनर्भू शब्द का उल्लेख सर्वप्रथम अथर्ववेद में हुआ है।
  • महिलाएं पति के साथ या स्वतंत्र रूप से भी यज्ञ करती थीं।
  • अथर्ववेद में ब्राह्मणों को भूदेव कहा गया।
  • ब्राह्मण को दक्षिणा में गायें व दासियां दी जाती थीं, भूमिदान नहीं।
  • उत्तर वैदिक काल में इन्द्र ने अपनी सर्वोच्चता खो दी। पूषन अब शूद्रों के देवता बन गए।
  • वेदों में वर्णित अश्विनी कुमार एक श्रेष्ठ चिकित्सक थे। इन्होंने विशपला को कृत्रिम पैर लगाया था।
  • रक्त प्रवाह रोकने के लिए बालू की पोटली का प्रयोग होता था।
  • अध्ययन के विषयों की सूची छांदोग्य उपनिषद में दी गई है। इसमें गणित, ज्योतिष, इतिहास, पूराण आदि दिए हैं।
  • विश्व का प्राचीनतम चिकित्सा ग्रंथ अथर्ववेद है। इसमें विभिन्न प्रकार की औषधियों का भी उल्लेख है। इसमें आयुर्वेद का सिद्धांत दिया है। इसमें वर्णित है विषस्य विषमौषधम् (विष की दवा विष ही होती है)।
  • वैदिक आर्यों को शरीर रचना (एनोटामी) का पूरा ज्ञान था।
  • शुल्वसूत्र वैदिक गणित व भारतीय ज्यामितीय के आधार स्त्रोत माने जाते हैं।
  • मैत्रायणी संहिता में मनु की 10 पत्नियों का उल्लेख मिलता है।
  • वेदांगों की संख्या 6 है – शिक्षा, कल्प, ज्योतिष, व्याकरण, छंद, निरुक्त।
  • सर्वप्रथम विलियम जोंस ने 1786 ई. में अपने एक व्याख्यान में बताया कि संस्कृत भी लैटन व ग्रीक भाषा परिवार से साम्य रखती है।

यज्ञ करने वाले चार प्रकार के ब्राह्मण –

    1. होता या होतृ – यह ऋग्वेद का ज्ञाता था।
    2. उद्गाता – यह सामवेद का ज्ञाता था। यह यज्ञ में सोम का गायन करता था।
    3. उध्वर्यु या याज्ञिक – यह यजुर्वेद का ज्ञाता था। जो याज्ञिक कर्मकाण्ड की विधियों को सम्पादित करता था।
    4. ब्रह्मा – ये चारो वेदों का ज्ञाता था। यज्ञ में इसकी भूमिका निरीक्षक की थी।

उत्तर वैदिक काल का धार्मिक जीवन –

इसमें याज्ञिक कर्मकाण्ड की प्रधानता के साथ उपनिषदों में इनके विरुद्ध आवाजें उठना प्रारंभ हो गई। यज्ञ दो प्रकार के थे हर्वियज्ञ (अग्निहोत्र, सौत्रामणि, दर्शपूर्णमास, आग्रहायण), और सोमयज्ञ (अश्वमेद्य, राजसूय, बायपेय, अग्निष्टोम)। हर्वियज्ञ में उद्गाता को नहीं बुलाया जाता था। दर्श यज्ञ अमावस्या को सम्पन्न किया जाता था। सोमयज्ञ ऋग्वैदिक आर्यों का सबसे प्रमुख यज्ञ था। यह 1 दिन से 1000 वर्ष तक होता था। सूलगव यज्ञ रुद्र(शिव) को प्रसन्न करने के लिए किया जाता था, इसमें नन्दी की बलि दी जाती थी। यह यज्ञ सबसे पहले अश्वत्थामा ने किया था। बाजपेय यज्ञ में रथदौड़ होती थी। बाजपेय यज्ञ का संबंधि शक्तिवर्धक पेय से है। राजसूय यज्ञ राज्याभिषेक से संबंधित था। द्यूत क्रीड़ा (जुँआ) राजसूय यज्ञ का ही अंग था। रत्नहबिसी संस्कार राजसूय यज्ञ से जुड़ा था। अश्वमेद्य यज्ञ शासक की सार्वभौम सत्ता का प्रतीक थी। इसमें करीब 600 पशुओं की हत्या की जाती थी।

इसमें पुरुष आख्यान कथाओं के सस्वर पाठ का गीत (परिप्लव-आख्यान) गाते थे। यज्ञ के पश्चात यज्ञकर्ता अपना सब कुछ दान कर देता था। स्नान के बाद वस्त्र भी दूसरों के मांग कर पहनता था, जो कि पुलकेशिन द्वितीय ने किया था। अग्निष्टोम यज्ञ में 11 पशुओं की बलि दी जाती थी। पृथ्वी को उर्वर बनाने के लिए गोमेध यज्ञ किया जाता था। मामा-मौसी की लड़की से विवाह हो गया हो तो उस पाप से बचने हेतु चन्द्रायण यज्ञ किया जाता था।

सौत्रामणि यज्ञ में सुरा की आहुति दी जाती थी। पण्यसिद्धि यज्ञ का उल्लेख ग्रहसूत्रों में मिलता है। यह व्यापार में सफलता प्राप्ति हेतु किया जाता था। अनार्यों को आर्यों में परिवर्तित करने के लिए व्रात्यस्टोम यज्ञ का उल्लेख पंचविश ब्राह्मण में मिलता है। राड्ययज्ञ संस्कार के द्वारा पदच्युत राजा पुनः राज्य प्राप्त करता था। राजेंद्रलाल मित्र ने अपनी पुस्तक ‘Indo-Aryans’ में बताया कि प्राचीन काल में भी लोग गोमाँस खाते थे।

वैदिक काल के पंचमहायज्ञ –

  1. ब्रह्मा यज्ञ या ऋषि यज्ञ – प्राचीन विद्वान ऋषियों व गुरुओं हेतु यह यज्ञ किया जाता था।
  2. पितृ यज्ञ – मृत पितरों के तर्पण (शांति) हेतु यह यज्ञ किया जाता था।
  3. देव यज्ञ (अग्निहोत्र यज्ञ) – देवताओं को प्रसन्न करने हेतु यह यज्ञ किया जाता था।
  4. भूत यज्ञ – यह भूत प्रेतों को संतुष्ट करने हेतु किया जाता था। इसे बलिवैश्व देव यज्ञ भी कहते थे।
  5. मनुष्य या नृ या अतिथि यज्ञ – अथर्ववेद के अनुसार अतिथि जिनके यहाँ भोजन करता था वह भोजन के साथ उसके पापों का भी भक्षण करता था।

तीन ऋण –

  1. देव ऋण – देवताओं की कृपा से मानव शरीर मिला, यह यज्ञ करने से देवताओं का ऋण चुकाया जाता है।
  2. पितृ ऋण – धर्मानुसार विवाह द्वारा सन्तानोत्पत्ति कर यह ऋण चुकाया जाता है।
  3. ऋषि ऋण – गुरु से जो ज्ञान मिला उसे वेदों के अध्ययन व अध्यापन द्वारा चुकाना।

उपनिषद –

कर्मकाण्ड व ब्राह्मणों के प्रभुत्व के विरोध में तीव्र प्रतिक्रिया हुई।

600 ई.पू. उपनिषदों की संकल्पना सामने आयी। यह प्रतिक्रिया विशेषतः पांचाल व विदेह राज्य में हुई।

उपनिषद ज्ञानमार्गी हैं। पहली बार मोक्ष की कल्पना श्वेताश्वर उपनिषद में आयी।

छांदोग्य उपनिषद में तत त्वम असि (तुम वही ब्रह्म हो) का उल्लेख हुआ है।

वृहदकारण्यक उपनिषद में अहं ब्रह्मास्मि (मैं ही ब्रह्म हूँ) का उल्लेख हुआ है।

उपनिषदों में ब्रह्म को सत्य और जगत को माया कहा गया है।

वेद और उनके ब्राह्मण ग्रंथ –

ऋग्वेद – कौशीतकी ब्राह्मण

सामवेद – पंचविश ब्राह्मण या ताण्ड्य ब्राह्मण

यजुर्वेद – तैत्तिरीय ब्राह्मण, शतपथ ब्राह्मण

अथर्ववेद – गोपथ ब्राह्मण

वैदिक काल की नदियों के वर्तमान नाम –

सिंधु – इण्डस

पुरुष्णी – रावी

सदानीरा – गण्डक

गोमती – गोमल

शतुद्रि – सतलज

अस्किनी – चेनाब

वितस्ता – झेलम

विपासा – व्यास

कुंभा – काबुल

कुमु – कुर्रम

स्वात – सुवस्तु

घग्घर – दृशद्वती

वैदिक शब्दावली

शब्द अर्थ
क्षेत्र या उर्वराकृषि योग्य भूमि
क्षेत्रजनियोग प्रथा से उत्पन्न पुत्र
गाविष्टियुद्ध
गोमतधनी व्यक्ति
गोधूलिसमय की माप
गवेषणागायों की खोज
गवयतुदूरी की माप
लांगर एवं सीरलकड़ी के हल का फाल
सीता या कुण्डजुती हुई भूमि में हल की फाल से बनी नालियां।
उर्दरअनाज मापक
स्थिवीअन्नागार
मृणन्त एवं वपन्तिमड़ाई से संबंधित शब्द
यवऋग्वेद में वर्णित एकमात्र फलस ‘जौ’
कुल्या, कूप, अस्मचक्र, अवटसिंचाई के साधन
करीषगोबर की खाद
कीवांसकिसान
तक्षाबढ़ई
कर्माधातु कार्य करने वााल
चर्मकारचमड़े का कार्य करने वाला
वायजुलाहा
रमूसगोनफधातुओं का देवता
सुवर्ण, अयसधातु
अयस ताँभा या कांसा
क्षौमसन
कुलालमिट्टी के वर्तन बनाने वाले लोग
अरित्रपतवार
अरितृनाविक
ध्याता या द्रविताधातु गलाने वाला
वेनकाटसूदखोर
पृथ्वैन्युकृषि का देवता
श्याम अयसलोहा
रत्नीप्रथम श्रेणी के अधिकारी
सूतरथ सेना का प्रमुख अधिकारी एवं राजकीय कवि
संग्रहिताकोषाध्यक्ष
भागदुधकर संग्रह करने वाला (वित्तमंत्री)
क्षत्ताद्वारपाल
वावाताप्रिय रानी
परिवृत्तिउपेक्षित रानी
महिषीपटरानी
अक्षवापआय व्यय का लेख करने वाला, यही राजा के साक्ष जुँआ खेलता था।
पालागतदूत
स्थपतिस्थानीय शासन हेतु अधिकारी
शतपतिसौ गाँवों का प्रमुख
सीरी, प्रवीर, प्रवीरवन्तहल
तंदुल, ब्रीहिचावल
शालिधान
गोधूमगेहुँ
इच्छु या इक्षुगन्ना
श्रेष्ठिनव्यापारियों का प्रधान
वणिजव्यापारियों का संगठन
कुसीदिनउधार देने वाला
गोवणिजगाय के व्यापारी
कृष्णलबाट की मूलभूत इकाई
अन्यस्य बलिकृतवैश्यों द्वारा लिया जाने वाला कर
अन्यस्य प्रेष्यशूद्र
देधिषव्यविधवा से उत्पन्न पुत्र
पुनर्भूदूसरा विवाह कर लेने वाली स्त्री
पौनर्भवदूसरे विवाह से उत्पन्न पुत्र
नैष्ठिक या अन्तेवासीअविवाहित रहकर आजीवन गुरु के पास रहने वाली
ब्रह्मवादिनीजीवन भर ब्रह्मचारी रहने वाली स्त्री
अमाजुआजीवन विवाह न करने वाली स्त्री
पायसदूध
नवनीतमक्खन
गोध्नअतिथि
पाण्ड्यऊनी वस्त्र था
ऊष्णीवपगड़ी
कौशेयरेशम वस्त्र
कुरीरमांग टीका
खदिअंगूठी
कुम्बसर पे धारण किया जाने वाला आभूषण
वृकबैल
अवलकूप (कुआँ)
कीवाशहलवाहा
अर्दरअनाज मापने वाला पात्र
भिषजवैद्य
शैलुभअभिनेता
नृतनर्तक
नृतुनृत्यांगना
कंकारिवीणा
नटवासुरी
तज्जलानजिससे संसार की उत्पत्ति हो
नियुतएक लाख
प्रयुतदस लाख
श्रुतिसुना हुआ
शुल्वमापना
आमाकच्ची ईंटों से निर्मित
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