आडम्बर और सत्यता

आडम्बर और सत्यता (Adambar aur Satyata) – इस लेख में हम भारतीय समाज में प्रचलित मिथ, तर्क और सत्यता पर आधारित तथ्यों को साझा कर रहे हैं। पुराने समय से चली आ रही हर प्रथा के बारे में जानने से पहले उस समय के परिवेश को अवश्य ध्यान में रखें।

बिल्ली का रास्ता काटना अशुभ क्यों माना जाता है ?

उत्तर – आपने राह चलते अक्सर देखा देखा होगा कि रात में बिल्ली की आँखें चमकती हैं। पहले के समय में सैनिक और व्यापारी घोड़ागाड़ी और बैलगाड़ी का प्रयोग किया करते थे। रात में बिल्ली के अचानक सामने आ जाने पर उसकी चमकती आँखें देखकर ये जानवर बिदक जाते थे। ये जानवर हड़बड़ी में इधर-उधर भागने लगते थे, जिससे हादसे हो जाते थे। पहाड़ी क्षेत्र, नदी-नाले इत्यादि के आस पास ऐसा होने से लोगों की जान तक चली जाती थी। जब लोग पूँछते थे कि ये हादसा कैसे हुआ तब लोग जवाब देते थे कि ‘बिल्ली रास्ता काट गई थी’ इसलिए हादसा हो गया। तो लोगों ने यह सोंच बना ली कि बिल्ली के रास्ता काटने से उनकी जान चली गई। अतः बिल्ली का रास्ता काटना अशुभ है। परंतु आज के परिवेश में मोटरबाइक या कार से जाते समय बिल्ली के लिए रुकने का कोई मतलब नहीं।

शनिवार को दाढ़ी या बाल क्यों नहीं कटवाते ?

वर्तमान समय की भांति पहले न तो बार्बर, हेयर ड्रेसर या सैलून हुआ करते थे और न ही ब्लेड व रेजर।  बल्कि गाँव के ही नाई लोग सभी के बाल व दाढ़ी बनाया करते थे। वह भी अपने उस्तरे से, जिसमें आज की तरह ब्लेड नहीं लगता था। बल्कि धार कराई जाती थी। इनके बाल काटने व दाढ़ी बनाने के काम के लिए लोग इन्हें नकद पैसे भी नहीं देते थे। बल्कि फसल पकने पर उसमें से थोड़ा हिस्सा इनको दे दिया करते थे। तब फसल भी इतनी अच्छी नहीं हुआ करती थी। साल में एक या दो ही फसल भी हुआ करती थी। इसके अतिरिक्त शादी, नामकरण इत्यादि संस्कारों में भी इनको कुछ न कुछ यजमानी से मिल जाता था। जिनको यह बात अधिक पुरानी लगती हो। वे ग्रामीण क्षेत्रों में जाकर देख सकते हैं। आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में यह प्रथा चल रही है।

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तब इन लोगों ने सोचा होगा कि जब साल भर सप्ताह के 7 दिन काम करने पर भी एकमुश्त राशि ही मिलनी है, तो क्यों ने छुट्टी की भी व्यवस्था की जाए। ये वो दौर था जब लोग अधिक अंधविश्वासी थे। तार्किकता से अधिक आडम्बर पर ध्यान दिया जाता था। तब इन लोगों ने इस तरह की बात को प्रचलित किया कि बृहस्पतिवार और शनिवार को दाढ़ी या बाल बनाना अशुभ होता है। फिर क्या था, धीरे-धीरे ये चलन में आ गया और किसी ने इसकी सत्यता की खोज करना मुनासिब न समझा। आप आज किसी नाई की दुकान पर गुरुवार और शनिवार को जा के देखें। क्या वो आपके बाल काटने या दाढ़ी बनाने से मना करेगा ?

साबुन का पानी लैट्रिन में क्यों नहीं डालना चाहिए ?

क्या आप जानते हैं मानवों को होने वाली सभी बीमारियों में से अधिकतर का कारण दूषित जल होता है ? साधारण शब्दों में कहें तो लैट्रिन के टैंक में मल से कीड़े बनते हैं जो इसे खाकर पानी में बदलने रहते हैं। जिससे वह मद दूषित नही रहता और नाली में बहकर बीमारियां नहीं फैलाता। परंतु जब हम डिटर्जेंट या साबुन का पानी लैट्रिन में डालते हैं। तो ये कीड़े उससे मर जाते हैं। और मल को पानी में बदलने की प्रक्रिया रुक जाती है। जिससे यह दूषित होकर नाली में बहता हो और बीमारियां फैलाता है। इसलिए कृपया कभी भी साबुन या सर्फ का पानी लैट्रिन में न डालें।

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झाडू को खड़ा करके क्यों नहीं रखते ?

पहले के समय झाडू लगाने वाले को मेहतर कहा जाता था। सार्वजनिक स्थलों पर झाड़ू लगाने का कार्य ये लोग ही किया करते थे। उनकी झाड़ू में मोटी लाठी ठुकी हुआ करती थी। पहले वे काम खतम करके इसे किसी कोने में टिका दिया करते थे। गली मोहल्ले के बच्चे जब इधर उधर भागते खेलते और कोनों में छिपते थे। तब ये भारी लाठी वाली झाड़ू अक्सर उनपर गिर जाया करती थी।

रात को झाड़ू क्यों नहीं लगाते ?

पहले के समय लोगों के घर व उनके फर्श कच्चे हुआ करते थे। पहले घर घास-फूस एवं मिट्टी के बने होते थे। कच्चे फर्श में चूहों के बिल भी हुआ करते थे। घरों में दरवाजे भी ऐसे नहीं हुआ करते थे जिन्हें ठीक से बंद किया जा सके। ऐसे में चूहा, बिल्ली, कुत्ता, मेढ़क, साँप इत्यादि अक्सर घरों में आ जाया करते थे। जैसा कि हस जानते हैं ये सभी जीव घरों की दरारों व कोनों इत्यादि में आकर बैठ जाते हैं। उस समय सूर्यास्त के बाद उजाले की भी कुछ खास व्यवस्था नहीं थी। सूर्यास्त के बाद घरों तक में इतना उजाला नहीं होता था कि छोटी-मोटी चीजों दिखें।

ऐसे में यदि रात को बहू या बच्ची झाड़ू लगाती तो सांप, बिच्छू एवं अन्य जलहीरे कीट इन्हें काट लेते थे। उस वक्त न तो आज की तरह फोन थे, न मोटरगाड़ी, न ही हर जगह अस्पताल और न ही ठीक सड़कें। उस वक्त रास्ते भी कच्चे हुआ करते थे जिनमें अक्सर पानी या दलदल रहती थी। रात्रि के अंधेरे में कहीं भी मरीज को ले जाना बेहद मुश्किल था। इसलिए सूर्यास्त के बाद झाड़ू न लगाने की सलाह दी जाती थी।

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सावन में शिवलिंग पर दूध क्यों चढ़ाते हैं ?

उत्तर – पहले कृषि में रसायनों का प्रयोग नहीं होता था। जिस कारण सावन के बरसात के मौसम में तमाम तरह की जहरीली घास व झाड़ियां उग आती थीं। दुधारू जानवरों द्वारा इनके सेवन से दुग्ध संक्रमित हो जाता था। जिसका सेवन करने से तमाम तरह की बीमारियां उत्पन्न होती थीं। शिव को काल का शत्रु विष का नाशक कहा जाता है। इसी कारण यह मान्यता प्रचलित हुई कि शिवलिंग पर चढ़ाने से इसका सदुपयोग होगा और समस्या का भी समाधान।

घर के बड़े लोग सूर्यास्त के बाद सफर करने को क्यों मना करते हैं ?

उत्तर – किसी दुर्घटना की स्थित में दिन में मदद के लिए कोई भी आ सकता है। परंतु रात में शहर से बाहर न तो अधिक राहगीर होते हैं और न ही कोई अपना तुरंत पहुँच पायेगा।

धन तेरस पर वर्तन क्यों खरीदते हैं ?

धन तेरस पर लक्ष्मी गणेश की पूजा करने से धन की वर्षा होती है। ऐसी मान्यता है, जो कि सत्य भी है। परंतु यह धन की वर्षा किस पर होती है ये समझने की आवश्यकता है। परंतु इसका वर्तन बाजार से क्या नकेक्शन है ? भारतीय सनातन संस्कृति में धनतेरस तो तब से मनाई जा रही है जब ये स्टील के वर्तन बाजार शुरु भी नहीं हुए थे। बाजार में 10 गुने दाम पर बर्तन बेचने वाले बनियों पर होती है यह धन वर्षा। वे धन तेरस वाले दिन अपना माल बेहद मोटी कीमत पर बेचकर अंधी कमाई करते हैं। गरीब आदमी उनसे लुटकर पूजा पाठ करता है। बनिये उस दिन सुबह से रात तक अँधी कमाई करने में लगे होते हैं।

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