बंगाल विभाजन – Partition of Bengal

बंगाल विभाजन – Partition of Bengal

  • विभाजन का निर्णय – 20 जुलाई 1905
  • विरोध में आंदोलन प्रारंभ – 7 अगस्त 1905
  • विभाजन प्रभावी – 16 अक्टूबर
  • कारण – प्रशासनिक असुविधा
  • विभाजन रद्द – 1911 (लार्ड हार्डिंग द्वितीय)

बंगाल विभाजन –

यह विभाजन भारतीय इतिहास की महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक है। यह लार्ड कर्जन का सबसे घृणित कार्य था। विभाजन के वक्त बंगाल की जनसंख्या 7 करोड़ 85 लाख थी। उस समय का बंगाल आधुनिक बंगाल से कहीं विस्तृत था। तब बंगाल के अंतर्गत प. बंगाल, बिहार, ओडिशा व बांग्लादेश भी शामिल थे। इतने बड़े प्रांत को एक लेफ्टिनेंट गवर्नर प्रशासन देने में असमर्थ था। तात्कालिक गवर्नर जनरल ने बंगाल विभान का प्रमुख कारण ‘प्रशासनिक असुविधा’ को बताया। परंतु वास्तविक कारण प्रशासनिक न होकर राजनीतिक था। इसकी जानकारी तात्कालिक राज्य सचिव रिजले के 1904 ई. में कर्जन को लिखे गए उस खत से मिलती है, जिसमें उसने लिखा था ‘संयुक्त बंगाल एक शक्ति है, विभाजित बंगाल की दिशाएं अलग-अलग होंगी’। उस वक्त का बंगाल राष्ट्रीय चेतना का केंद्र बिन्दु था। अतः कर्जन ने बंगालियों की राजनीतिक चेतना को छिन्न-भिन्न करने का यह तरीका अपनाया।

बंगाल को हिन्दू व मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र में विभाजित कर उन्हें आपस में लड़ाने की नीति अपनाई। दिसंबर 1903 में बंगाल विभाजन की खबर फैलने पर चारो ओर विरोधस्वरूप अनेक बैठकें हुईं। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, कृष्णकुमार मित्र, पृथ्वीशचन्द्र राय आदि नेताओं ने अखबारों के माध्यम से विभाजन के प्रस्ताव की आलोचना की। भारी विरोध के बावजूद कर्जन ने 20 जुलाई 1905 को कलकत्ता में बंगाल विभाजन की घोषणा की। परिणामस्वरूप 7 अगस्त 1905 ई. को कलकत्ता के टाउन हॉल में स्वदेशी आंदोलन की घोषणा की गई। इसी बैठक में ऐतिहासिक बहिष्कार प्रस्ताव पारित हुआ।

स्वदेशी आन्दोलन –

16 अक्टूबर 1905 को बंगाल विभाजन प्रभावी हो गया। संपूर्ण भारत में इस दिन को शोक दिवस के रूप में मनाया गया। विभाजन के बाद बंगाल प्रेसिडेंसी को पूर्वी बंगाल व पश्चिमी बंगाल के रूप में विभाजित कर दिया गया। रवींद्र नाथ टौगोर के सुझाव पर संपूर्ण बंगाल में इस दिन राखी दिवस के रूप में मनाया गया। इसका उद्देश्य यह प्रदर्शित करना था कि विभाजन के बाद भी अंग्रेज इसकी एकता में दरार नहीं डाल पाए। अगले ही दिन सुरेन्द्रनाथ बनर्जी और आनन्द मोहन बोस ने दो विशाल जनसभाओं को संबोधित किया। देखते ही देखते कुछ ही घंटों में आन्दोलन के लिए 50 हजार रुपये इकट्ठे हो गए। स्वदेशी व बहिष्कार आंदोलन का संदेश पूरे देश में फैल गया।

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इस आंदोलन को सर्वाधिक सफलता विदेशी माल के बहिष्कार आंदोलन से मिली। इसके तहत औरतों ने विदेशी चूडियां पहनना व विदेशी वर्तनों का प्रयोग करना बंद कर दिया। धोबियों ने विदेशी कपड़े धोना बंद कर दिया। यहाँ तक कि महंतों ने विदशी चीनी से बने प्रसाद तक को लेने से मना कर दिया। इस आंदोलन ने आत्मनिर्भर और आत्मशक्ति का नारा दिया। स्वदेशी माल की आपूर्ति के लिए स्वदेशी स्टोर खोले गए। आचार्य प्रफुल्ल चंद्र राय ने बंगाल केमिकल स्वदेशी स्टोर्स खोला। बंगाल के छात्रों की इस आंदोलन में मुख्य भूमिका रही।

पूर्वी बंगाल –

तब पूर्वी बंगाल का क्षेत्रफल 1,06,540 वर्ग किलोमीटर था। पूर्वी बंगाल की जनसंख्या 3 करोड़ 10 लाख थी, जिनमें 1 करोड़ 80 लाख मुसलमान और 1 करोड़ 20 लाख हिन्दू थे। ढाका को पूर्वी बंगाल का मुख्यालय बनाया गया।

पश्चिम बंगाल

बंगाल विभाजन के बाद तात्कालिक पश्चिम बंगाल में वर्तमान बिहार व ओडिशा राज्य भी सम्मिलित थे। इसकी जनसंख्या 5 करोड़ 40 लाख थी। जिनमें 4 करोड़ 50 लाख हिन्दू और 90 लाख मुसलमान थे। तब पश्चिम बंगाल का क्षेत्रफल 1,41,580 वर्ग किलोमीटर था।

बंगाल विभाजन के विरोध में हुए आंदोलन का प्रचार व नेतृत्व –

  • दिल्ली – सैयद हैदर खाँ
  • महाराष्ट्र – तिलक व उनकी पुत्री केतकर
  • पंजाब व उत्तर प्रदेश – लाला लाजपत राय, स्वामी श्रद्धानंद, अजीत सिंह, जयपाल, गंगाराम
  • मद्रास – चिदम्बरम पिल्लई, सुब्रमण्यम अय्यर, आनन्द चारलू, टी. एम. नायक

स्वदेश बान्धव समिति –

यह बंगाल विभाजन के विरोध में गठित सबसे महत्वपूर्ण संगठन था। इसका गठन वारिसाल के एक अध्यापक अश्विनी कुमार दत्त ने किया था। इस संगठन की देश भर में 159 शाखाएं फैली हुई थीं।

कार्लाइल सर्कुलर –

इस आंदोलन में छात्रों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। जिसके चलते सरकार ने कार्लाइल सर्कुलर जारी किया। इसके तहत बंगाल सरकार ने कार्यवाहक मुख्य सचिव कार्लाइल ने कलेक्टरों के पास पत्र भेजा कि वे कॉलेजों से कहें कि वे छात्रों को आंदोलन में भाग न लेने दें, अन्यथा उनकी सरकारी सहायता रोक दी जाएगी। विश्वविद्यालयों से कहा गया कि वे ऐसी संस्थाओं की मान्यता बापस लें। अन्यथा उसकी सरकारी सहायता बापस ले  जी जाएगी। कार्लाइल के इसी पत्र को कार्लाइल सर्कुलर के नाम से जाना गया। सरकार के इस प्रकार के दमन का मुकाबला करने के लिए एण्टी सर्कुलर सोसाइटी की स्थापना की गई। छात्र नेता सचीन्द्र प्रसाद बसु को चुना गया। बंगाल में शिक्षा फैलाने में सबसे बड़ा कार्य डान सोसाइटी का था। यह विद्यार्थियों का संगठन था जिसके सचिव सतीश चन्द्र मुखर्जी थे।

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राष्ट्रीय शिक्षा की ओर कदम –

राष्ट्रीय शिक्षा के क्षेत्र में सर्वप्रथम 8 नवंबर 1905 ई. को रंगपुर नेशनल स्कूल की स्थापना की गई। 16 नवंबर 1905 को कलकत्ता में एक सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस सम्मेलन में राष्ट्रीय नियंत्रण में राष्ट्रीय साहित्यिक, वैज्ञानिक और तकनीकी शिक्षा देने के लिए राष्ट्रीय शिक्षा परिषद स्थापित करने का फैसला लिया गया। टैगोर के शांति निकेतन की तर्ज पर 14 अगस्त 1906 ई. को ‘बंगाल नेशनल कॉलेज और स्कूल’ की स्थापना की गई। इसका प्रधानाचार्य ‘अरविंद घोष’ को नियुक्त किया गया। इसके बाद 15 अगस्त 1906 ई. को ‘सदगुरु दास बनर्जी’ ने राष्ट्रीय शिक्षा परिषद की स्थापना की।

स्वदेशी आंदोलन का सांस्कृतिक क्षेत्र पर प्रभाव –

इस आंदोलन का सबसे अधिक प्रभाव सांस्कृतिक क्षेत्र पर पड़ा। बंगाल साहित्य के लिए यह स्वर्णकाल था। बंगाली कवियों के गीत आंदोलनकारियों के लिए प्रेरणा स्त्रोत बने। आंदोलन को तेज करने के लिए रवींद्रनाथ टैगोर ने प्रेरणा स्त्रोत ‘आमार सोनार बंगला’ की रचना की। इसे 1971 ई. में बांग्लादेश ने अपना राष्ट्रगीत बनाया।

स्वदेशी आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी –

इस आंदोलन की यह भी एक विशेषता थी कि स्वदेशी आंदोलन में महिलाओं ने सक्रिय रूप से भाग लिया। पहली बार औरतों ने घर की दहलीज को लांघकर प्रदर्शन में भाग लिया और धरने पर बैठीं।

स्वदेशी आंदोलन में किसानों की भूमिका –

लेकिन यह आंदोलन बंगाल के किसानों को प्रभावित नहीं कर सिका। केवल वारिसाल ही इसका अपवाद था।

यह आंदोलन मुख्य रूप से शहरों के उच्च व मध्यम वर्ग तक ही सीमित था। बहुसंख्यक मुसलमानों, विशेषकर खेतिहर मुसलमानों ने इसमें भाग नहीं लिया। उस वक्त बंगाल के अधिकतर भूस्वामी हिन्दू थे और मुसलमान खेतिहर मजदूर थे। अंग्रेजों ने ढाका के नवाब सलीमुल्ला का इस्तेमाल स्वदेशी आन्दोलन के विरोधी के रूप में किया।

बनारस अधिवेशन (1905) –

1905 ई. के कांग्रेस के बनारस अधिवेशन की अध्यक्षता ‘गोपाल कृष्ण गोखले’ ने की। इन्होंने स्वदेशी एवं बहिष्कार आंदोलन का समर्थन किया। इस अधिवेशन में पहला मतभेद ‘प्रिंस ऑफ वेल्स’ के स्वागत प्रस्ताव पर हुआ। नरमपंथी प्रिंस ऑफ वेल्स का स्वागत करना चाहते थे, वहीं राष्ट्रवादियों ने इसका विरोध किया। फिर भी यह प्रस्ताव पारित हो गया। लाला लाजपत राय ने अपने भाषण में सत्याग्रह को अपनाने का सुझाव दिया। इस प्रकार का सुझाव कांग्रेस के मंच से पहली बार दिया गया।

कलकत्ता अधिवेशन 1906 –

1906 ई. में हुए कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन की अध्यक्षता दादाभाई नौरोजी ने की। यहीं पर पहली बार दादाभाई नौरोजी द्वारा स्वदेश की मांग प्रस्तुत की गई। अब तक कांग्रेस में उग्रवादी नेताओं की पकड़ मजबूत हो चुकी थी। जहाँ एक ओर उग्रवादी नेता हिंसा का समर्थन करते थे, वहीं दूसरी ओर उदारवादी नेता हिंसा के विरोध में थे। तिलक ने लाला लाजपत राय को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाने का सुझाव दिया। परंतु राष्ट्रवादियों को कांग्रेस के अध्यक्ष पद से दूर रखने के लिए नरमपंथियों ने वयोवृद्ध नेता दादाभाई नौरोजी को अध्यक्ष बना दिया। तो राष्ट्रवादियों ने इसका विरोध करना उचित नहीं समझा। इसी अधिवेशन के दौरान दोनों विचारधाराओं के नेताओं में मतभेद सामने आया। परंतु दादाभाई नौरोजी के प्रयास से यह मतभेद दबा दिया गया।

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उदारवादी और उग्रवादी विचारधारा के नेताओं के बीच यह विवाद स्वदेशी आंदोलन के चलाने के तरीके को लेकर था। परिणामस्वरूप सूरत अधिवेशन में उग्रवादी नेता कांग्रेस से अलग हो गए।

सूरत अधिवेशन (1907) –

यह अधिवेशन पहले नागपुर में होने को था। इसमें कांग्रेस गरम दल और नरम दल में बंट गई। गर्म दल में बालगंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और बिपिन चंद्रपाल जैसे नेता थे।

स्वदेशी आंदोलन का परिणाम –

बंगाल विभाजन के विरोध में शुरु हुआ स्वदेशी आंदोलन अपने तत्कालीन लक्ष्य की प्राप्ति में असफल रहा। क्योंकि इस अवसर पर बंगाल के विभाजन को रद्द नहीं किया गया। परंतु आंदोलन के दूरगामी लाभ अवश्य मिले। इस आंदोलन के परिणामस्वरूप विदेश वस्तुओं के आयात में कमी आयी। भारतीय उद्योगों को प्रोत्साहन मिला। 1907 व 1908 के बीच आंदोलन के सभी बड़े नेता गिरफ्तार या निर्वासित कर दिये गए। इस प्रकार यह आंदोलन नेतृत्वविहीन हो गया। जब सरकार ने इस आंदोलन का दमन करने का प्रयत्न किया, तब उसके परिणामस्वरूप उग्र राष्ट्रीयता का उदय हुआ।

अरुण्डेल कमेटी –

तत्कालीन वायसराय लॉर्ड मिण्टो द्वितीय ने राजनीतिक सुधारों के विषय में सलाह देने हेतु अगस्त 1906 ई. में अरुण्डेल कमेटी का गठन किया। इस कमेटी ने विभाजित बंगाल को पुनः संयुक्त करने की आवश्यकता पर बल दिया। इसके फलस्वरूप बंगाल सरकार ने विवश होकर 1911 ई. में बंगाल विभाजन को रद्द कर दिया।

बंगाल विभाजन रद्द –

दिसंबर 1911 ई. में ब्रिटिश सम्राट जॉर्ज पंचम का दिल्ली में आगमन हुआ। 12 दिसंबर 1911 को दिल्ली दरबार का आयोजन किया गया। यहाँ पर वायसराय लॉर्ड हार्डिंग द्वितीय ने सम्राट की ओर से बंगाल विभाजन को रद्द किये जाने की घोषणा की। साथ ही भारत की राजधानी कलकत्ता के स्थान पर दिल्ली बनाने की भी घोषणा की गई।

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